‘ट्रांस अधिकारों को एक दशक पीछे धकेला जा रहा है’: समुदाय के सदस्यों ने प्रस्तावित ट्रांसजेंडर कानून में बदलाव का विरोध किया
कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में प्रस्तावित संशोधन भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों को लगभग एक दशक पीछे धकेल सकते हैं।
जस्टिस न्यूज
ऐसा इसलिए होगा क्योंकि ये संशोधन ‘जेंडर सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन’ (खुद की पहचान खुद तय करने) के उस सिद्धांत को कमज़ोर करते हैं, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फ़ैसले ‘नेशनल लीगल सर्विसेज़ अथॉरिटी बनाम भारत संघ’ में मान्यता दी थी।
संसद में हाल ही में पेश किए गए इस संशोधन में इस बात में बदलाव का प्रस्ताव है कि कानून के तहत ट्रांसजेंडर पहचान को कैसे परिभाषित और मान्यता दी जाएगी। प्रस्ताव के अनुसार, ट्रांसजेंडर पहचान की मान्यता के लिए आधिकारिक प्रक्रियाओं के माध्यम से सत्यापन की आवश्यकता हो सकती है – जिसमें संभावित चिकित्सा जांच भी शामिल है – इससे पहले कि अधिकारी पहचान प्रमाण पत्र जारी करें। कार्यकर्ताओं का तर्क है कि चिकित्सा या प्रशासनिक सत्यापन की ओर यह बदलाव, NALSA फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित ‘स्व-निर्धारण’ के सिद्धांत को कमज़ोर करता है।
‘क्वीर निलयम’ के संस्थापक जयंत ने कहा कि कई समूहों ने प्रस्तावित बदलावों पर अपनी प्रतिक्रियाओं को समन्वित करना शुरू कर दिया है: “ऐसा लगता है जैसे हमें एक दशक पीछे धकेला जा रहा है। ये लोग अपनी पहचान की खोज करते समय पहले से ही बहुत अधिक मानसिक आघात (trauma) से गुज़र रहे हैं। जब इस तरह की कोई बात सामने आती है, तो बहुत से लोग यह सवाल पूछते हैं: वे कहाँ जाएँगे?”
हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्रों ने 14 मार्च को प्रस्तावित बदलावों की निंदा करते हुए एक विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि लिंग पहचान निर्धारित करने के लिए सरकार द्वारा नियुक्त एक चिकित्सा बोर्ड का गठन करना निजता का हनन होगा और इससे ट्रांसजेंडर लोगों के शरीर पर पुलिस की निगरानी बढ़ सकती है।
हैदराबाद स्थित कार्यकर्ता पत्रुनी शास्त्री, जो खुद को ‘नॉन-बाइनरी’ के रूप में पहचानते हैं, ने कहा कि इस प्रस्ताव ने समुदाय के भीतर चिंता पैदा कर दी है। “हम कभी भी किसी ‘सिसजेंडर’ (जन्म से ही अपने लिंग को मानने वाले) पुरुष या महिला से यह साबित करने के लिए चिकित्सा प्रमाण पत्र नहीं मांगते कि वे कौन हैं। ट्रांसजेंडर पहचान केवल शारीरिक नहीं होती। यह मनोवैज्ञानिक होती है और जीवन के अनुभवों तथा समुदाय की स्वीकृति पर आधारित होती है।” शास्त्री ने ऐसी सत्यापन प्रक्रियाओं को संभालने के लिए चिकित्सा प्रणाली की तैयारियों के बारे में भी चिंताएँ उठाईं। उन्होंने पूछा, “भारत में कितने ‘ट्रांस-फ्रेंडली’ (ट्रांस लोगों के अनुकूल) क्लिनिक हैं?” एक्टिविस्ट्स ने ट्रांसजेंडर लोगों की परिभाषा को संकरा किए जाने पर भी चिंता जताई है। हैदराबाद की एक कम्युनिटी मेंबर गायत्री ने कहा कि प्रस्तावित बदलाव पहले से ही सीमित कानूनी ढांचे को और भी ज़्यादा एक्सक्लूसिव बना सकते हैं।
देश की पहली ट्रांसजेंडर डॉक्टरों में से एक, प्राची राठौर, जिन्होंने हैदराबाद के उस्मानिया जनरल हॉस्पिटल में मेडिकल ऑफिसर के तौर पर काम किया है, कहती हैं कि ऐसी प्रक्रिया न तो वैज्ञानिक रूप से सही है और न ही नैतिक रूप से उचित। उन्होंने आगे कहा, “एक डॉक्टर के तौर पर, मैं कह सकती हूँ कि मेडिकल तौर पर यह साबित करना मुमकिन नहीं है कि कोई व्यक्ति ट्रांसजेंडर है या नहीं। ट्रांसजेंडर लोग मरीज़ नहीं होते और वे किसी ऐसी बीमारी से पीड़ित नहीं होते जिसका पता टेस्ट के ज़रिए लगाया जा सके।”









