अपने लेख ‘मनुस्मृति स्त्री-पुरुष दोनों के लिए सख्त है, इसे जलाने से पहले पढ़ तो लीजिए’ में रोहिणी बख्शी इसमें दर्ज कुछ विशेष शर्तों का हवाला देती हैं जबकि इस पूरे ग्रंथ के वास्तविक परिणामों की अनदेखी कर जाती हैं| […]
अपने लेख ‘मनुस्मृति स्त्री-पुरुष दोनों के लिए सख्त है, इसे जलाने से पहले पढ़ तो लीजिए’ में रोहिणी बख्शी इसमें दर्ज कुछ विशेष शर्तों का हवाला देती हैं जबकि इस पूरे ग्रंथ के वास्तविक परिणामों की अनदेखी कर जाती हैं| […]
बाबूराव बागुल महाराष्ट्र के एक जाने-माने मराठी लेखक थे। वे मराठी में दलित लिटरेचर में एक आगे रहने वाले इंसान थे और बीसवीं सदी के आखिर में भारतीय शॉर्ट फिक्शन में उनका बहुत बड़ा रोल था। यह वह दौर था […]
सूरज मिलिंद येंगड़े ने अपनी नई पुस्तक, ‘जाति: एक वैश्विक कहानी’ में जाति-विरोधी संघर्ष के वैश्विक प्रभाव और जाति एवं जाति-आधारित भेदभाव के वैश्विक परिघटना बनने का चित्रण किया है। जस्टिस न्यूज हाल ही में सिस्को जैसी शीर्ष कंपनियों और […]
लखनऊ, अमृत विचार। बलरामपुर गार्डन में चल रहे राष्ट्रीय पुस्तक मेले में 5वें दिन दलित और बौद्ध साहित्य के स्टालों पर भीड़ उमड़ी। मेले में सम्यक प्रकाशन के स्टाल पर आदिवासी पत्र पत्रिकाएं, मैं बौद्ध नगरी मथुरा हूं, दलित दमन […]
‘धड़क 2’ में दलित युवक की भूमिका निभाने वाले सिद्धांत चतुर्वेदी ने कहा— किरदार ने मुझे मानसिक रूप से पूरी तरह घेर लिया था, डबिंग के दौरान फिर से सब कुछ सामने आ गया। जातिवाद जैसे संवेदनशील विषय को प्रेम […]
प्रो. नंदू राम महज एक विद्वान नहीं थे, वे विचारों के योद्धा थे। उन्होंने दलित अनुभव को अकादमिक विमर्श का विषय बनाया, जिससे समाजशास्त्र की परंपरागत धारा में एक आवश्यक विचलन आया। भारतीय समाजशास्त्रीय अध्ययन को उन्होंने वंचितों की नज़र […]
पुस्तक समीक्षा: गहन शोध पर आधारित कमल नयन चौबे की ‘आदिवासी और वनवासी’ एक ऐसी पुस्तक है, जिससे आधुनिक भारत के इतिहास, राजनीति तथा भारतीय समाज के बदलते हुए स्वरूप को समझने में मदद मिलती है. इसके साथ ही हिंदुत्ववादी […]
वर्ण-व्यवस्था रहेगी तो जाति को मिटाया नहीं जा सकता है। संतराम बीए का यह तर्क बिलकुल डॉ. आंबेडकर के तर्क से मेल खाता है। उनका भी दो टूक कहना था कि जो व्यक्ति या संगठन वर्ण-व्यवस्था के साथ खड़ा है, […]
बाबासाहेब आंबेडकर की 1935 में सरकारी लॉ कॉलेज, मुंबई के प्राचार्य बनने की ऐतिहासिक घटना पर 90 साल बाद विशेष कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा, जो दलित सशक्तिकरण के सफर में एक अहम मील का पत्थर था। मुंबई के चर्चगेट स्थित […]
उच्च जाति के हिंदुओं का विरोध 1932 तक तीव्र हो गया क्योंकि उन्हें अछूतों की आबादी को स्वीकार करने से अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी में कमी का डर था। यह स्वतंत्र भारत में जाति-आधारित नीतियों पर बहस का आधार बना। भारत […]
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