लखनऊ: कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के दोहरी नागरिकता मामले में पैदा हुई अप्रिय स्थिति
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने सोमवार को खुद को इस मामले की सुनवाई से अलग कर लिया और चीफ जस्टिस से एक दूसरी बेंच बनाने का अनुरोध किया।
जस्टिस न्यूज
सोमवार को, जस्टिस विद्यार्थी याचिकाकर्ता एस. शिशिर विग्नेश के पिछले आदेश के बाद सोशल मीडिया पर किए गए पोस्ट से खास तौर पर नाराज़ थे।
हालांकि, जस्टिस विद्यार्थी ने यह माना कि 17 अप्रैल, 2026 को खुली अदालत में FIR दर्ज करने का आदेश देने से पहले, उन्हें इस मामले में राहुल गांधी को नोटिस जारी करना चाहिए था। उन्होंने सभी पक्षों के वकीलों को भी फटकार लगाई कि उन्होंने उनके सामने सही कानूनी स्थिति नहीं रखी कि क्या आरोपी बनाए जाने वाले व्यक्ति की बात सुनना ज़रूरी था।
कर्नाटक के एक BJP कार्यकर्ता की याचिका पर सुनवाई करते हुए, जस्टिस विद्यार्थी ने 17 अप्रैल, 2026 को खुली अदालत में एक आदेश दिया था, जिसमें उत्तर प्रदेश पुलिस को कथित दोहरी नागरिकता विवाद के मामले में राहुल के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश दिया गया था।
हालांकि, जब 18 अप्रैल, 2026 को हाई कोर्ट की वेबसाइट पर यह आदेश अपलोड किया गया, तो उसमें कहा गया था कि आदेश टाइप और साइन होने से पहले, जज को पता चला कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक अहम फैसले के अनुसार, इस मुद्दे पर कोई भी फैसला सुनाने से पहले, आरोपी बनाए जाने वाले व्यक्ति—इस मामले में गांधी—को नोटिस जारी करना अनिवार्य है।
इसके बाद, जज ने आदेश पर साइन करने के बजाय, गांधी को नोटिस जारी करने के सवाल पर मामले की अगली सुनवाई 20 अप्रैल के लिए तय कर दी। सोमवार को दिए गए अपने आदेश में, जज ने साफ किया कि इस मामले में कोई भी आदेश देने से पहले गांधी को नोटिस जारी करना अनिवार्य था।
जज याचिकाकर्ता, एस. शिशिर विग्नेश द्वारा सोशल मीडिया पर किए गए पोस्ट से खास तौर पर नाराज़ थे। जस्टिस विद्यार्थी ने कहा, “17 अप्रैल को आदेश दिए जाने के बाद याचिकाकर्ता द्वारा सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए संदेश इस अदालत पर लांछन लगाने के बराबर हैं, और इन बातों को ध्यान में रखते हुए, मुझे इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लेना ही उचित लगता है।” इस बात पर नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए कि उन्हें उचित कानूनी सहायता नहीं दी गई—यह बताकर कि प्रस्तावित आरोपी को नोटिस जारी करना ज़रूरी था—जस्टिस विद्यार्थी ने टिप्पणी की, “मुझे यह देखकर दुख हुआ कि इस मामले में पेश हुए वकील, अदालत को निष्पक्ष तरीके से सहायता देने के अपने कर्तव्य को निभाने में विफल रहे हैं।”









