‘मज़दूरी के लिए मौत के मुँह में धकेला गया’: दिल्ली में बिना सुरक्षा उपकरणों के नाला साफ़ करते हुए दलित सफ़ाई कर्मचारी की मौत
राहुल (32), वाल्मीकि समुदाय का एक ठेका-आधारित सफ़ाई कर्मचारी, 30 मार्च को दिलशाद गार्डन के ताहिरपुर में 8 से 10 फ़ीट गहरे नाले की हाथ से सफ़ाई करते समय मर गया। आरोप है कि उस समय उसके पास कोई सुरक्षा उपकरण, कोई निगरानी करने वाला या कोई मशीनरी सहायता नहीं थी।
जस्टिस न्यूज
यह घटना, जो लोक निर्माण विभाग (PWD) के अधिकार क्षेत्र में हुई, ने गैर-कानूनी तौर पर हाथ से मैला ढोने की प्रथाओं, जाति-आधारित श्रम शोषण और संस्थागत जवाबदेही के बारे में गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
दलित आदिवासी शक्ति अधिकार मंच (DASAM) की एक तथ्य-खोज टीम की जाँच के अनुसार, राहुल घटना की सुबह अपने दो महीने की बकाया मज़दूरी लेने गया था, लेकिन आरोप है कि उसे ज़बरदस्ती उस ख़तरनाक नाले को साफ़ करने के लिए मजबूर किया गया, और कहा गया कि काम पूरा करने पर ही उसे पैसे मिलेंगे।
गवाहों और परिवार के सदस्यों का दावा है कि उसे बिना किसी सुरक्षा उपकरण के उस ज़हरीले माहौल में घुसने के लिए मजबूर किया गया, जिससे वह मीथेन और हाइड्रोजन सल्फ़ाइड जैसी जानलेवा गैसों के संपर्क में आ गया।
राहुल और उसका एक साथी कर्मचारी सुबह 8 बजे काम पर लगे और दोपहर 2 बजे तक राहुल नाले के अंदर बेसुध पाया गया।
खबरों के मुताबिक़, बचाव अभियान में लगभग दो घंटे लगे, और गुरु तेग बहादुर अस्पताल पहुँचने पर उसे मृत घोषित कर दिया गया।
उसके परिवार को घटना के कई घंटों बाद, शाम लगभग 5 बजे, किसी अनजान व्यक्ति ने सूचना दी; जिससे अधिकारियों की ओर से हुई देरी और संवेदनहीनता को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं।
पुलिस ने शुरू में सीमापुरी पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया, लेकिन उसमें ‘हाथ से मैला ढोने वालों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम’ और ‘SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम’ के मुख्य प्रावधानों को शामिल नहीं किया।
खबरों के मुताबिक़, परिवार और नागरिक समाज समूहों के दबाव के बाद इन धाराओं को बाद में जोड़ा गया।
अधिकारियों ने तब से ‘भारतीय न्याय संहिता’ के तहत प्रावधान लागू किए हैं, जिसमें धारा 106 (लापरवाही से मौत का कारण बनना) शामिल है, लेकिन रिपोर्ट लिखे जाने तक इस मामले में कोई गिरफ़्तारी नहीं हुई थी।
परिवार के सदस्यों ने आरोप लगाया है कि राहुल की मौत कोई दुर्घटना नहीं थी, बल्कि यह ज़हरीली गैस के संपर्क में आने और काम करने की असुरक्षित परिस्थितियों का नतीजा थी।
उन्होंने सबूतों के साथ छेड़छाड़ की आशंका भी जताई है, और कहा है कि राहुल का शव साफ़-सुथरे कपड़ों में मिला था, जो कि सीवर के काम की सामान्य परिस्थितियों के बिल्कुल विपरीत है। “हमने राहुल को सुबह 8 बजे उसकी बकाया सैलरी लेने भेजा था, लेकिन ठेकेदार ने उसे पैसे देने के बजाय कहा कि पहले नाली साफ़ करो, उसके बाद ही उसे दो महीने की मज़दूरी मिलेगी,” राहुल की बहन ने DASAM से बातचीत में कहा।
“हमने कभी सोचा भी नहीं था कि इसका नतीजा उसकी मौत होगी। यह दुखद घटना ज़हरीली गैसों, खतरनाक हालात और ठेकेदार तथा PWD की लापरवाही की वजह से हुई,” उसने आगे कहा।
“तीन दिन बीत चुके हैं, और कोई भी हमसे मिलने नहीं आया—न तो विभाग से कोई, न कोई अधिकारी, और न ही ठेकेदार। हमें 31 मार्च को उसका शव मिला,” उसने आगे कहा।
“वह दोपहर करीब 2 बजे नाले में मृत पाया गया था। पुलिस को उसे बाहर निकालने और गुरु तेग बहादुर अस्पताल ले जाने में लगभग दो घंटे लग गए, जहाँ उसे मृत घोषित कर दिया गया। हमें किसी ने भी इस बारे में जानकारी नहीं दी—न तो ठेकेदार ने और न ही उसके साथ काम करने वालों ने। शाम करीब 5 बजे किसी और ने हमें बताया और हमसे तुरंत अस्पताल पहुँचने के लिए कहा।”
राहुल के भाई विजय ने कहा, “जब लोग नाले साफ करते हैं, तो वे आमतौर पर सिर्फ़ अंडरवियर पहने होते हैं, लेकिन राहुल पूरे कपड़ों में मिला, और उसके कपड़े भी साफ थे। उसे मज़दूरी के लिए जान गँवानी पड़ी। हमें शक है कि ठेकेदार ने सबूत मिटाने की कोशिश की,” विजय ने कहा।
एक सीवर कर्मचारी, जयवीर ने कहा, “मज़दूरों को सुरक्षा के लिए कोई भी सामान (सेफ़्टी इक्विपमेंट) नहीं दिया गया था,” और उसने यह भी बताया कि राहुल दिन के सिर्फ़ 350 रुपये कमाता था।
“वह हमारे परिवार में सबसे छोटा था; उसके पाँच भाई और एक बहन थी, और वह अविवाहित था। कुछ लोगों ने तो हमें ठेकेदार का नाम हटाने की धमकी भी दी, लेकिन एक वरिष्ठ अधिकारी ने हमें भरोसा दिलाया है कि हमें ज़रूर इंसाफ़ मिलेगा।” “पुलिस अंतिम संस्कार के लिए ज़ोर देती रही, लेकिन हमने तब तक मना कर दिया जब तक हमें 30 लाख रुपये के मुआवज़े का भरोसा नहीं मिल गया,” विजय ने कहा।
इस मामले ने इस बात की ओर ध्यान खींचा है कि कानूनी रोक और बार-बार न्यायिक दखल के बावजूद, मैला ढोने की प्रथा अभी भी जारी है।
अपने 2023 के फ़ैसले में, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने सीवर में होने वाली मौतों के लिए मुआवज़ा बढ़ाकर 30 लाख रुपये कर दिया और इस प्रथा को खत्म करने की राज्य की ज़िम्मेदारी को फिर से दोहराया।
कार्यकर्ताओं का तर्क है कि राहुल की मौत कानूनी सुरक्षा उपायों और उनके अमल के बीच की लगातार बनी हुई खाई को उजागर करती है।
DASAM की तथ्य-खोज रिपोर्ट भी ठेकेदारों और उप-ठेकेदारों की एक बहु-स्तरीय व्यवस्था की ओर इशारा करती है, जिससे सरकारी एजेंसियों को अपनी ज़िम्मेदारी से बचने का मौका मिल जाता है।
“हालांकि यह काम PWD के तहत आता था, लेकिन अधिकारियों ने कथित तौर पर काम का नियंत्रण निजी ठेकेदारों को सौंपकर खुद को इससे अलग कर लिया है; आलोचकों का कहना है कि इस प्रथा से जवाबदेही से बचने का एक व्यवस्थित तरीका बन जाता है,” संगठन की राष्ट्रीय समन्वयक मोहसिना मलिक ने मकतूब को बताया।
उन्होंने आगे कहा, “हमने परिवार के साथ मिलकर मुआवज़े, जवाबदेही और ठेकेदार की तत्काल गिरफ़्तारी की मांग की, लेकिन अधिकारी लगातार मना करते रहे। SDM, विधायक कुलदीप और DASAM जैसे संगठनों के लगातार दबाव के बाद ही प्रशासन ने इस पर ध्यान देना शुरू किया और FIR में उचित धाराएँ शामिल कीं।”
मलिक ने कहा, “अब तक मुआवज़े का वादा तो किया गया है, लेकिन उसे दिया नहीं गया है। कोई गिरफ़्तारी भी नहीं हुई है। जाँच अभी भी जारी है।” तथ्य-खोज टीम ने सभी ज़िम्मेदार ठेकेदारों और अधिकारियों की तत्काल गिरफ़्तारी की सिफ़ारिश की, साथ ही भारत के सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए दिशानिर्देशों के अनुसार ₹30 लाख का मुआवज़ा देने की भी सिफ़ारिश की।
इसने परिवार के लिए अंतरिम वित्तीय राहत और पुनर्वास सहायता, ‘हाथ से मैला ढोने वालों के रोज़गार पर रोक और पुनर्वास अधिनियम’ का सख़्ती से पालन करने, और सभी सीवर और नाली सफ़ाई के कामों का मशीनीकरण अनिवार्य करने की भी मांग की।
सिफ़ारिशों में अनौपचारिक उप-ठेकेदारी की श्रृंखलाओं को खत्म करने और मुख्य नियोक्ता की जवाबदेही को स्पष्ट रूप से तय करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया, साथ ही सुरक्षा उपकरण, उचित प्रशिक्षण और निगरानी सुनिश्चित करने की बात भी कही गई।
इसके अलावा, इसने लिखित अनुबंधों के माध्यम से रोज़गार को औपचारिक बनाने, समय पर मज़दूरी का भुगतान करने, और श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा और बीमा तक पहुंच सुनिश्चित करने का आग्रह किया।
रिपोर्ट में उन अधिकारियों के लिए आपराधिक जवाबदेही की भी मांग की गई जिन्होंने अवैध रूप से हाथ से मैला ढोने की अनुमति दी, सफ़ाई कार्यों का नियमित स्वतंत्र ऑडिट करने, और ठेकेदारों के विवरण तथा काम करने की स्थितियों को सार्वजनिक करने की भी मांग की गई।
इसके अतिरिक्त, इसने हाथ से मैला ढोने पर रोक के बारे में जागरूकता अभियान चलाने, पुलिस और नगर निगम के अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण देने, और सुरक्षित सफ़ाई प्रथाओं को बढ़ावा देने के लिए सामुदायिक स्तर पर पहल करने का भी आह्वान किया।
राहुल, जो छह भाई-बहनों में सबसे छोटा था, काम की अनिश्चित परिस्थितियों में प्रतिदिन 300 से 400 रुपये कमाता था।
उसके परिवार ने तब तक उसका अंतिम संस्कार नहीं किया, जब तक उन्हें मुआवज़े का आश्वासन नहीं मिल गया।
अंतिम संस्कार 1 अप्रैल को किया गया था, लेकिन रिपोर्ट लिखे जाने तक मुआवज़े का पूरा भुगतान नहीं किया गया था।
कार्यकर्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों ने तत्काल गिरफ़्तारी, सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनिवार्य किए गए पूर्ण मुआवज़े, और हाथ से मैला ढोने पर रोक लगाने वाले कानूनों को सख़्ती से लागू करने की मांग की है।
उन्होंने अनौपचारिक ठेकेदारी प्रणालियों को खत्म करने और सभी सफ़ाई कार्यों का मशीनीकरण अनिवार्य करने की भी मांग की।









