ट्रांसजेंडर समुदाय का विरोध प्रदर्शन: जमशेदपुर के ट्रांसजेंडर कार्यकर्ताओं ने नए संशोधन कानून का विरोध किया; दावा – यह स्व-पहचान के अधिकारों को कमज़ोर करता है
जमशेदपुर: ट्रांसजेंडर समुदाय ने सोमवार को डिप्टी कलेक्टर के कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम 2026 के प्रति उनके चल रहे विरोध का एक हिस्सा था।
जस्टिस न्यूज
यह दावा करते हुए कि इस नए अधिनियम ने ट्रांसजेंडरों की परिभाषा ही बदल दी है, उन्होंने कहा कि इस कानून ने लिंग के स्व-निर्धारण के उनके मौलिक अधिकार को छीन लिया है।
“यह अधिनियम राज्य द्वारा नियुक्त चिकित्सा विशेषज्ञों को यह तय करने का अधिकार देता है कि किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति की पहचान कानूनी रूप से वैध है या नहीं। यह भारत में दशकों से चल रहे ट्रांसजेंडर आंदोलन की मांगों के बिल्कुल विपरीत है,” NGO ‘उत्थान कम्युनिटी बेस्ड ऑर्गनाइज़ेशन’ (CBO) के संस्थापक अमरजीत सिंह ने कहा। यह NGO ट्रांसजेंडरों के हितों के लिए काम करता है।
यह कहते हुए कि संशोधित कानून सर्वोच्च न्यायालय के 2014 के NALSA फैसले का उल्लंघन करता है, सिंह ने कहा कि पहचान को शर्तों के अधीन बनाना कोई प्रक्रियागत बदलाव नहीं है, बल्कि यह व्यवहार में एक प्रकार का बहिष्कार है।
संगठन के सदस्य अर्पित ने कहा कि इस नए कानून के लागू होने से देश के ट्रांसजेंडर लोगों द्वारा बड़ी मुश्किल से हासिल किए गए अधिकारों को एक बड़ा झटका लगा है।
“यह कानून अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के विरुद्ध है, जो यह प्रावधान करते हैं कि सामाजिक सुरक्षा उपायों, लाभों और हकों तक पहुँच के लिए स्व-घोषित पहचान ही आधार होनी चाहिए,” अर्पित ने कहा।
उन्होंने बताया कि 2011 की जनगणना में 4,87,803 व्यक्तियों को ‘तीसरे लिंग’ (थर्ड जेंडर) के रूप में मान्यता दी गई थी, और अब तक केवल 32,500 लोगों के पास ही पहचान पत्र हैं, जो सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए अनिवार्य हैं।
“संशोधित कानून तीसरे लिंग की पहचान करने में नई बाधाएँ खड़ी करेगा, क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपनी ट्रांसजेंडर पहचान निर्धारित करवाने के लिए चिकित्सा परीक्षण (मेडिकल जाँच) नहीं करवाना चाहेगा,” प्रियंका ने कहा।









