SC में संशोधित ‘ट्रांसजेंडर व्यक्तियों’ के कानून को चुनौती देने वाली याचिका दायर
नई दिल्ली: 2019 के कानून में संशोधन करने वाला यह बिल 24 मार्च को लोकसभा और 25 मार्च को राज्यसभा में ध्वनि मत से पारित किया गया था। विपक्ष ने इसका कड़ा विरोध किया था और मांग की थी कि बिल को व्यापक विचार-विमर्श के लिए एक स्थायी समिति के पास भेजा जाए। 30 मार्च को भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंज़ूरी मिलने के बाद यह बिल कानून बन गया।
जस्टिस न्यूज
ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की परिभाषा से जुड़े विवादास्पद संशोधनों, जिला मजिस्ट्रेट से TG सर्टिफिकेट पाने की मंज़ूरी के आधार के तौर पर “स्वयं-अनुभूत पहचान” को हटाने, और मेडिकल बोर्ड शुरू करने जैसी बातों को कानून के तौर पर अधिसूचित किए जाने के एक हफ़्ते से भी कम समय में, सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की गई है। इस याचिका में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।
इस कानून को चुनौती देने वाली याचिका जाने-माने ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ताओं लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और ज़ैनब पटेल ने दायर की है। इस याचिका का मुख्य मुद्दा यह है कि क्या राज्य किसी व्यक्ति की पहचान को इस तरह से फिर से परिभाषित कर सकता है कि उस व्यक्ति का अपनी पहचान खुद तय करने का अधिकार ही छिन जाए। गौरतलब है कि त्रिपाठी और पटेल ऐतिहासिक NALSA बनाम भारत संघ (2014) मामले में मुख्य याचिकाकर्ता थे, जिसमें संविधान के तहत ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों को मान्यता दी गई थी।
अपनी मौजूदा याचिका में कार्यकर्ताओं ने यह तर्क दिया है कि 2026 का संशोधन इस बात की बुनियाद ही बदल देता है कि कानून की नज़र में ट्रांसजेंडर पहचान को कैसे समझा जाता है। कार्यकर्ताओं ने इस बात पर ज़ोर दिया है, “यह स्वयं-पहचान के सिद्धांत से हटकर, तय श्रेणियों और मेडिकल स्थितियों पर आधारित एक संकीर्ण, राज्य-निर्धारित परिभाषा को अपनाता है। ऐसा करके, यह उस बात से भटक जाता है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने NALSA मामले में पहले ही पुष्ट कर दिया था कि लैंगिक पहचान व्यक्तिगत गरिमा और पसंद का विषय है।”
याचिका में उठाई गई मुख्य चिंताओं में से एक यह है कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति की पुरानी परिभाषा को हटाकर उसकी जगह एक सीमित ढांचा अपना लिया गया है। याचिका में यह बताया गया है कि कई ऐसे ट्रांसजेंडर व्यक्ति जो इन श्रेणियों के दायरे में नहीं आते, वे कानूनी मान्यता से वंचित रह सकते हैं।
यह याचिका स्वयं-अनुभूत लैंगिक पहचान के स्पष्ट अधिकार को हटाए जाने को चुनौती देती है, और उन प्रावधानों पर सवाल उठाती है जो ट्रांसजेंडर पहचान और ज़बरदस्ती या मानव तस्करी जैसी स्थितियों के बीच की सीमा को धुंधला कर देते हैं। याचिका में इस बात पर चिंता जताई गई है कि मौजूदा अधिकार—जिनमें पुराने ढांचे के तहत जारी किए गए पहचान पत्र भी शामिल हैं—खतरे में पड़ सकते हैं। यह चुनौती संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के तहत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर आधारित है, साथ ही इसमें अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के स्थापित सिद्धांतों को भी शामिल किया गया है।
“यह कानून हमें पीछे ले जाता है। NALSA मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने यह माना था कि हमारी पहचान हमारे भीतर से आती है, न कि राज्य द्वारा बनाई गई किसी चेकलिस्ट से। आज, उस मूल सिद्धांत को ही खत्म किया जा रहा है। उसी मामले में याचिकाकर्ता के तौर पर, हम फिर से कोर्ट आए हैं, क्योंकि यह संशोधन सिर्फ़ परिभाषाएँ नहीं बदलता, बल्कि यह लोगों की ज़िंदगी बदल देता है। इससे कई ट्रांसजेंडर लोगों के कानून की सुरक्षा से ही बाहर हो जाने का खतरा पैदा हो गया है,” त्रिपाठी और पटेल ने एक संयुक्त बयान में कहा।
“यह कोई तकनीकी सुधार नहीं है। यह गरिमा, स्वायत्तता और इस बात से जुड़ा एक संवैधानिक सवाल है कि क्या राज्य यह तय कर सकता है कि हम कौन हैं,” उन्होंने कहा।
त्रिपाठी और पटेल, दोनों ही पहले ‘नेशनल काउंसिल फॉर ट्रांसजेंडर पर्सन्स’ – जो कि कानून के तहत एक वैधानिक संस्था है – के सदस्य के तौर पर भी काम कर चुके हैं। त्रिपाठी ‘अस्तित्व ट्रस्ट’ और ‘नेशनल नेटवर्क फॉर ट्रांसजेंडर पर्सन्स’ के संस्थापक हैं, जबकि पटेल ‘डाइवर्सिटी, इक्विटी एंड इंक्लूजन’ (विविधता, समानता और समावेशन) के रणनीतिकार हैं और साथ ही ‘प्राइड बिज़नेस नेटवर्क फाउंडेशन’ के संस्थापक भी हैं।









