‘सीवर और सेप्टिक टैंक में मौतें
SKA ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया, जंतर-मंतर पर जुटे सैकड़ों सफाई कर्मचारियों और उनके परिवारों ने एकजुट होकर न्याय और जवाबदेही की मांग की।
जस्टिस न्यूज
नई दिल्ली- देश की संसद से बस कुछ ही दूरी पर, सैकड़ों सफ़ाई कर्मचारी एक बार फिर जंतर-मंतर पर जमा हुए, और ऐसे नारे लगाए जिनमें उनका दर्द झलक रहा था – “हमें मारना बंद करो,” “सीवर और सेप्टिक टैंक में मौतें बंद करो,” और “PM देश से माफ़ी मांगें।” सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन (SKA) के बुलावे पर, 25 मार्च को लगभग 10 राज्यों से प्रदर्शनकारी आए थे, ताकि वे अपना दर्द बयां कर सकें और सीवर तथा सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफ़ाई में लगे सफ़ाई कर्मचारियों की लगातार हो रही मौतों के लिए न्याय की मांग कर सकें।
SKA के नेताओं ने साफ कर दिया कि यह आंदोलन तब तक जारी रहेगा, जब तक सरकार इस मुद्दे को सुलझाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाती और यह सुनिश्चित नहीं करती कि इस खतरनाक और अमानवीय प्रथा के कारण अब और किसी की जान न जाए।
यह प्रदर्शन सीवर और सेप्टिक टैंक में भारतीय नागरिकों की हत्याओं को तुरंत रोकने की मांग करने के लिए आयोजित किया गया था, साथ ही सरकार से इस मुद्दे को हल करने के लिए एक समय-सीमा वाला कार्ययोजना बनाने की भी मांग की गई थी।
सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता बेज़वाड़ा विल्सन ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि इस साल अब तक सीवर और सेप्टिक टैंक में 41 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। उन्होंने सरकार की आलोचना करते हुए इसे “खामोशी” कहा, मानो इन जिंदगियों की कोई अहमियत ही न हो।
विल्सन ने कहा, “समाज में फैली जातिवादी मानसिकता लोगों को मौत के गटर में उतरने पर मजबूर करती है।” “इन हत्याओं के लिए किसी को भी जवाबदेह नहीं ठहराया जाता और न ही किसी को सज़ा दी जाती है, जबकि कानून के मुताबिक यह पूरी तरह से गैर-कानूनी है।”
SKA की नेता दीप्ति सुकुमार ने सीवर और सेप्टिक टैंक में होने वाली मौतों की असली संख्या को छिपाने की सरकार की कोशिशों पर सवाल उठाए। SKA के अपने दस्तावेज़ों का हवाला देते हुए, उन्होंने संगठन द्वारा दर्ज की गई मौतों और सरकार द्वारा बताई गई मौतों के आंकड़ों में एक बड़ा अंतर उजागर किया।
सुकुमार ने कहा, “2025 में, SKA के आंकड़ों के मुताबिक सीवर और सेप्टिक टैंक की सफ़ाई करते समय कुल 121 लोगों की मौत हुई, लेकिन सरकार ने सिर्फ़ 46 मौतों को ही दर्ज किया।” “इसी तरह, 2024 में मरने वालों की संख्या 116 थी, लेकिन सरकार ने सिर्फ़ 55 मौतों का ही रिकॉर्ड रखा। बाकी लोग कहाँ गए, जिनकी जान गई थी? सरकार को संसद में असली आँकड़े पेश करने चाहिए।”
सीवर साफ़ करते हुए जिन लोगों की जान गई, उनके कई परिवार वाले भी इस विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए और उन्होंने अपने दर्दनाक अनुभव बताए। उन्होंने सरकार से गुज़ारिश की कि ऐसी मौतों को तुरंत रोका जाए।
SKA के अलग-अलग राज्यों के नेता, जिनमें लवजिंदर कौर, सीमा खैरवाल, नीलम, पूनम, आँचल, पूजा, उषा सागर, राज वाल्मीकि, राजकुमार, सुभाष, अमर सिंह, प्रकाश और मयंक शामिल थे, उन्होंने भी वहाँ जमा लोगों को संबोधित किया। उन्होंने ऐसे मामलों से निपटने में स्थानीय प्रशासन की जातिवादी और पितृसत्तात्मक सोच के बारे में बात की, और आरोप लगाया कि पीड़ितों के परिवारों को न तो सही मुआवज़ा मिलता है और न ही इंसाफ़।
विरोध करने वालों ने प्रधानमंत्री के नाम एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें उन्होंने अपनी माँगें बताईं और इस संकट से निपटने में सरकार की व्यवस्थागत नाकामी को उजागर किया। ज्ञापन की शुरुआत में प्रधानमंत्री को याद दिलाया गया कि ठीक एक साल पहले, 25 मार्च 2025 को, सैकड़ों सफ़ाई कर्मचारी ‘गरिमा के साथ जीने के अधिकार’ जैसी ही माँगों को लेकर जंतर-मंतर पर जमा हुए थे। इसमें कहा गया था कि बार-बार ज्ञापन देने के बावजूद, “न कोई भरोसा मिला, न कोई सुरक्षा और न ही कोई बदलाव।”
ज्ञापन में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की 19 मार्च को दिए गए बयान के लिए कड़ी आलोचना की गई, जिसमें दावा किया गया था कि “हाथ से मैला ढोने की वजह से कोई मौत नहीं हुई है।” SKA ने इसे एक “चौंकाने वाला और संवेदनहीन दावा” और दलितों की ज़िंदगी को “जान-बूझकर मिटाने की कोशिश” बताया।
‘दलितों की ज़िंदगी को व्यवस्थित तरीके से मिटाना’
ज्ञापन में आँकड़ों की एक साफ़ तुलना पेश की गई, ताकि SKA के शब्दों में “दलितों की ज़िंदगी को व्यवस्थित तरीके से मिटाने की कोशिश” को बेनकाब किया जा सके:
2023 में, SKA ने 102 मौतों का रिकॉर्ड रखा, जबकि मंत्री ने संसद में सिर्फ़ 65 मौतों की जानकारी दी। 2024 में, SKA ने 116 मौतों का रिकॉर्ड दर्ज किया, लेकिन सरकारी आँकड़ा घटाकर 54 कर दिया गया।
2025 में, SKA ने 121 मौतों का रिकॉर्ड दर्ज किया, जबकि मंत्रालय ने सिर्फ़ 46 मौतें बताईं।
2026 के पहले तीन महीनों में ही, सीवर और सेप्टिक टैंक के अंदर 41 लोगों की जान जा चुकी है।
ज्ञापन में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि इस क्रूर और अमानवीय काम में मारे जाने वाले लोग दलित हैं। इसमें मंत्री के उस बयान की कड़ी निंदा की गई कि यह “पेशा-आधारित” है, न कि “जाति-आधारित”; इसे एक ऐसे समुदाय को सामाजिक न्याय से वंचित करने की जान-बूझकर की गई कोशिश बताया गया, जो ऐतिहासिक रूप से दमित और हाशिए पर रहा है।
“ये मौतें कोई दुर्घटना नहीं हैं,” ज्ञापन में कहा गया। “ये जाति-आधारित हिंसा का सीधा नतीजा हैं, जिसे उपेक्षा, इनकार और निष्क्रियता के ज़रिए बढ़ावा दिया गया है। फिर भी, सरकार ने न तो कोई पछतावा दिखाया है और न ही कोई तत्परता। इसके बजाय, हमारी मौतों को महज़ आँकड़ों तक सीमित कर दिया गया है—उनमें हेर-फेर किया गया है और उन्हें कम करके दिखाया गया है—ताकि हमें हमारे सबसे बुनियादी अधिकार—जीवन के अधिकार—से वंचित किया जा सके।”
माफ़ी और समय-सीमा के भीतर कार्रवाई की योजना की माँग
ज्ञापन में मांग की गई कि प्रधानमंत्री उस चीज़ के लिए राष्ट्र से माफ़ी मांगें जिसे SKA ने “सदियों पुराना जातिगत उत्पीड़न” कहा है। इसमें यह भी मांग की गई कि सरकार एक समय-सीमा वाला कार्य-योजना घोषित करे ताकि:
- सीवर और सेप्टिक टैंकों में होने वाली मौतों को रोका जा सके।
- मैला ढोने की प्रथा को पूरी तरह से खत्म किया जा सके।
- इस काम में लगे लोगों के पुनर्वास की व्यवस्था की जा सके।
ज्ञापन में आगे कहा गया कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड और जम्मू-कश्मीर के कई ज़िलों में आज भी सूखे शौचालय मौजूद हैं, जहाँ दलित महिलाओं को आज भी मैला ढोने के लिए मजबूर किया जाता है। इसमें कहा गया कि सरकार द्वारा मशीनीकरण और आधुनिकीकरण के लिए घोषित योजनाएँ उन जातिगत ढाँचों को तोड़ने में नाकाम रही हैं, जो दलितों को इस काम से बाँधे रखते हैं।
ज्ञापन के अंत में कहा गया, “हमारे युवा बिना किसी सुरक्षा, सम्मान या जवाबदेही के, सीवर और सेप्टिक टैंकों के अंदर मरते जा रहे हैं।”









