संशोधन ट्रांसजेंडरों के लिए एक गंभीर झटका
ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 2019 में प्रस्तावित नए संशोधन, जो 12 मार्च को अचानक सामने आए, ट्रांस समुदाय के दिल में छुरा घोंपने जैसा है।
जस्टिस न्यूज
ट्रांसजेंडर अधिकारों का मुख्य दावा हमेशा से ‘जेंडर स्व-निर्धारण’ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में ‘नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी बनाम भारत संघ’ (NALSA) मामले में अपने ऐतिहासिक फैसले में यह माना था कि सभी व्यक्तियों को अपनी जेंडर पहचान (लिंग पहचान) को पुरुष, महिला या ट्रांसजेंडर के रूप में स्वयं निर्धारित करने का मौलिक अधिकार और स्वायत्तता प्राप्त है।
कोर्ट ने यह माना कि किसी व्यक्ति का जेंडर उसके जैविक लक्षणों या किसी जेंडर-पुष्टि सर्जरी के आधार पर नहीं, बल्कि उसके अपने स्व-निर्धारण के आधार पर तय किया जाएगा। इसने ट्रांस व्यक्तियों को समानता की गारंटी भी दी और यह माना कि जेंडर पहचान के आधार पर किया गया कोई भी भेदभाव, लिंग के आधार पर किए गए भेदभाव के बराबर माना जाएगा। इसके साथ ही, भारत दुनिया के उन अग्रणी देशों में से एक बन गया जिसने जेंडर पहचान के अधिकार को मान्यता दी।
NALSA के फैसले के बाद ‘ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 2019’ आया, जिसने जेंडर पहचान के स्व-निर्धारण के अधिकार को भी मान्यता दी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस अधिनियम ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की परिभाषा का विस्तार करते हुए यह कहा: “एक ऐसा व्यक्ति जिसका जेंडर, जन्म के समय उसे दिए गए जेंडर से मेल नहीं खाता है; इसमें ट्रांस-पुरुष या ट्रांस-महिला (चाहे उस व्यक्ति ने ‘सेक्स रीअसाइनमेंट सर्जरी’, हार्मोन थेरेपी, लेज़र थेरेपी या ऐसी कोई अन्य थेरेपी करवाई हो या नहीं), ‘इंटरसेक्स’ विभिन्नताओं वाले व्यक्ति, ‘जेंडरक्वीर’ और ऐसे सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान वाले व्यक्ति जैसे कि किन्नर, हिजड़ा, अरावनी और जोगता शामिल हैं।”
हाल ही में, वर्ष 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक ‘जेन कौशिक’ मामले में यह स्वीकार किया कि ‘ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का अधिनियम’ प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जा रहा है; इसलिए कोर्ट ने इसके कामकाज की समीक्षा करने और सुधारों की सिफारिश करने के लिए एक सलाहकार समिति का गठन किया।
जहां एक ओर हमारे संवैधानिक न्यायालय ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों को मान्यता दे रहे हैं और उनका विस्तार कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर हालिया विधेयक इस कानून की मूल आत्मा को ही नष्ट करने का प्रयास कर रहा है। ‘ट्रांसजेंडर’ व्यक्तियों की प्रस्तावित परिभाषा संकीर्ण, बहिष्कारी और आपत्तिजनक है, क्योंकि इसमें ‘नपुंसक’ जैसे कलंक लगाने वाले शब्दों का प्रयोग किया गया है। यह एक पूरे वर्ग को भी हटा देता है जो खुद को ट्रांसजेंडर व्यक्ति, ट्रांस-पुरुष, ट्रांस-महिला या जेंडर-क्वीर के रूप में पहचानता है, और उसकी जगह एक संकीर्ण परिभाषा ले आता है जो पूरी तरह से मेडिकल या बायोलॉजिकल मॉडल पर आधारित है।
उद्देश्यों और कारणों के विवरण में इन संशोधनों के पीछे के कारणों में कहा गया है कि “कानूनी नीति का उद्देश्य पहले भी और अब भी केवल उन लोगों की रक्षा करना था, और है, जिन्हें बायोलॉजिकल कारणों से गंभीर सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है, जिसमें उनकी अपनी कोई गलती या अपनी कोई पसंद नहीं होती… इसका उद्देश्य पहले भी और अब भी विभिन्न जेंडर पहचान वाले, खुद को किसी खास लिंग/जेंडर के रूप में पहचानने वाले, या जेंडर-फ्लूइडिटी वाले हर व्यक्ति की रक्षा करना नहीं था…”
इस बयान के साथ, प्रस्तावित बिल जेंडर पहचान के आत्म-निर्धारण के संवैधानिक अधिकार से जुड़े एक दशक से भी ज़्यादा पुराने स्थापित कानूनी सिद्धांतों को खत्म कर देता है। डॉक्टरों और वेलफेयर बोर्ड के सामने नग्न होकर यह साबित करने से लेकर कि वे सचमुच ट्रांसजेंडर हैं—ताकि वे मामूली पेंशन का दावा कर सकें—तक, ट्रांसजेंडर समुदाय ने अपनी जेंडर पहचान खुद तय करने के अधिकार को मान्यता दिलाने के लिए अदालतों का दरवाज़ा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने इसे सबसे ज़्यादा निजी और व्यक्तिगत विकल्पों में से एक माना, जिसका हर व्यक्ति हकदार है।
जब इसकी जगह एक ऐसा कानून ले लेता है जो केवल कुछ खास सामाजिक-सांस्कृतिक समुदायों के ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को ही शामिल करता है, और उन सभी को बाहर कर देता है जो खुद को ट्रांस या जेंडर-क्वीर के रूप में पहचानते हैं, तो हम एक पूरे समुदाय को अनदेखा कर रहे होते हैं और यह कह रहे होते हैं कि कानून के तहत उन्हें कोई मान्यता प्राप्त नहीं है।
उनकी जेंडर पहचान को कानूनी मान्यता मिलने के बाद ही ट्रांस व्यक्तियों को कई नागरिक अधिकार मिल पाते हैं—जैसे पासपोर्ट या आधार के ज़रिए कानूनी पहचान का दावा करने का अधिकार, राशन कार्ड के ज़रिए भोजन पाने का अधिकार, ड्राइविंग लाइसेंस, शिक्षा का अधिकार और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का अधिकार। हमारे कानूनों की शुरुआत लाभार्थियों द्वारा किए जाने वाले संभावित दुरुपयोग और धोखाधड़ी पर ध्यान केंद्रित करने से नहीं होनी चाहिए; बल्कि उन्हें सभी जेंडर के लोगों को उनके कानूनी अधिकार समान रूप से उपलब्ध कराने में सक्षम बनाना चाहिए।
पिछले कुछ वर्षों में, लगभग 30,000 लोगों ने ट्रांसजेंडर पहचान पत्र प्राप्त किए हैं। अब उनका और उनकी कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त जेंडर पहचान का क्या होगा? क्या एक बार दी गई कानूनी मान्यता को वापस लिया जा सकता है? कानून का मूल सिद्धांत जेंडर पहचान के आत्म-निर्धारण का सिद्धांत है—यानी हर व्यक्ति को वह बनने की आज़ादी हो जो वह बनना चाहता है, और उसके साथ समान व्यवहार किया जाए। किसी संशोधन के ज़रिए इस अधिकार को छीना नहीं जा सकता।









