हैदराबाद: कार्यकर्ताओं ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति संशोधन विधेयक 2026 की निंदा की
उन्होंने विधेयक की धारा 18 के तहत एक “चिंताजनक” आपराधिक प्रावधान की ओर भी इशारा किया, जिसके तहत किसी को ट्रांसजेंडर बनने के लिए “लुभाने” या “मजबूर करने” पर पाँच साल तक की कैद हो सकती है।
जस्टिस न्यूज
हैदराबाद: हैदराबाद में ट्रांसजेंडर, इंटरसेक्स, जेंडर नॉन-कन्फर्मिंग, क्वीयर व्यक्ति, समूह और उनके समर्थक (allies) एकजुट हुए और उन्होंने औपचारिक रूप से ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026’ का विरोध और निंदा की। यह विधेयक 13 मार्च को लोकसभा में केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार द्वारा पेश किया गया था।
हैदराबाद के कार्यकर्ताओं के समुदाय ने सांसदों से अपील की कि वे ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026’ को तुरंत और “बिना किसी शर्त के” वापस ले लें। उन्होंने कहा, “भविष्य में होने वाले किसी भी संशोधन में ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति’ की उस परिभाषा को बरकरार रखा जाना चाहिए जो 2019 के अधिनियम में स्थापित की गई थी। साथ ही, NALSA (2014) बनाम भारत संघ, और के.एस. पुट्टास्वामी (सेवानिवृत्त) और अन्य बनाम भारत संघ (2017) के निर्णयों द्वारा पुष्ट ‘स्व-पहचान के अधिकार’ को भी बनाए रखा जाना चाहिए। इसके अलावा, कोई भी संशोधन पूरे भारत में ट्रांसजेंडर समुदायों के साथ सार्थक और लोकतांत्रिक परामर्श के माध्यम से ही तैयार किया जाना चाहिए।”
मंगलवार, 17 मार्च को हैदराबाद में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में, समुदाय ने कहा कि यह विधेयक एक दशक से अधिक समय की कड़ी मेहनत से हासिल की गई कानूनी सुरक्षा को खत्म करने का खतरा पैदा करता है। यह कहते हुए कि यह संवैधानिक अधिकारों के मामले में एक ‘पिछड़ा कदम’ है, हैदराबाद के ट्रांसजेंडर, इंटरसेक्स, जेंडर नॉन-कन्फर्मिंग और क्वीयर समुदायों ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह विधेयक पूरी की पूरी पहचानों को मिटा देता है, शरीर में दखल देने वाली (invasive) चिकित्सा प्रक्रियाओं को अनिवार्य बनाता है, सामुदायिक सहायता नेटवर्क को अपराध की श्रेणी में डालता है, और एक ऐसी ‘दो-स्तरीय नागरिकता’ का निर्माण करता है जहाँ किसी व्यक्ति का कानूनी अस्तित्व सर्जरी तक उसकी पहुँच पर निर्भर करता है।
कार्यकर्ताओं के एक बयान में कहा गया, “यह कोई सुधार नहीं है। यह सर्वोच्च न्यायालय के NALSA निर्णय, 2019 के अधिनियम, और दशकों की कड़ी मेहनत से हासिल की गई संवैधानिक सुरक्षाओं का ‘उल्टा कदम’ (reversal) है। यह संशोधन ‘स्व-पहचान’ की जगह सरकार द्वारा नियुक्त ‘जिला चिकित्सा अधिकारी’ से अनिवार्य चिकित्सा प्रमाणन लेने का प्रस्ताव करता है—जिसके लिए न तो कोई परिभाषित मापदंड हैं, न कोई पारदर्शिता है और न ही कोई जवाबदेही है। चिकित्सकीय दृष्टि से, ऐसा कोई जैविक संकेत (biological marker) मौजूद नहीं है जो ट्रांसजेंडर पहचान की पुष्टि या उसका खंडन कर सके।” समुदाय के सदस्यों और कार्यकर्ताओं ने कहा कि मौजूदा बिल में एक ऐसा प्रावधान भी शामिल है जिसके तहत जेंडर-अफ़र्मिंग सर्जरी (लिंग-पुष्टि सर्जरी) करवाने वाले व्यक्ति को इसकी जानकारी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को देनी होगी; यह संविधान द्वारा दिए गए निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। बयान में आगे कहा गया, “शारीरिक जाँच के ज़रिए लोगों को अपना जेंडर ‘साबित’ करने के लिए मजबूर करना न केवल वैज्ञानिक रूप से बेबुनियाद है, बल्कि यह बेहद तकलीफ़देह और असंवैधानिक भी है।”
उन्होंने बताया कि यह बिल “खास तौर पर” इसलिए चिंताजनक है क्योंकि यह लोगों की पहचान को पूरी तरह से मिटा देता है, और “ट्रांसजेंडर व्यक्ति” की परिभाषा को सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानों और इंटरसेक्स विविधताओं के एक सीमित दायरे तक ही सीमित कर देता है। कार्यकर्ताओं ने आगे कहा कि यह बिल उन ट्रांस पुरुषों और ट्रांस महिलाओं को दायरे से बाहर कर देता है जो किसी सामाजिक-सांस्कृतिक समुदाय का हिस्सा नहीं हैं; साथ ही, यह बिल पूरे भारत में नॉन-बाइनरी लोगों, जेंडरक्वीर लोगों और जेंडर-विविध व्यक्तियों को भी शामिल नहीं करता।
प्रेस ब्रीफ़िंग के दौरान, कार्यकर्ताओं ने यह भी कहा कि ट्रांस पुरुष “पूरी तरह से अदृश्य हो जाएँगे, क्योंकि इस बिल में उनके लिए कोई सामाजिक-सांस्कृतिक ढाँचा ही नहीं है।” उनके बयान में आगे कहा गया, “उन्हें पहले से ही गहरे हाशिए पर धकेला जा रहा है, क्योंकि जन्म के समय उन्हें ‘महिला’ के तौर पर पहचाना जाता है और उन पर ज़बरदस्ती एक महिला के रूप में ही रहने का बोझ डाल दिया जाता है; ऐसे में, कई जगहों पर वे सुरक्षित रूप से अपनी असली पहचान ज़ाहिर नहीं कर पाते। यह बिल इन सभी मुश्किलों को और भी बदतर बना देता है।”
कार्यकर्ताओं ने कहा कि यह बिल केवल मेडिकल दखल के ज़रिए ही कानूनी मान्यता देता है; इसका मतलब है कि लोगों को ऐसी सर्जरी करवाने के लिए मजबूर किया जाता है जिन्हें वे शायद करवाना ही न चाहते हों, या जिनकी सुविधा उन तक न पहुँच पाती हो, या फिर जिन्हें करवाने के लिए वे चिकित्सकीय रूप से सक्षम ही न हों।
‘अपराधी ठहराना, सुरक्षा देना नहीं है’
हैदराबाद के कार्यकर्ताओं ने ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति (संशोधन) बिल 2026’ में शामिल एक और चिंताजनक कानूनी प्रावधान की ओर भी ध्यान दिलाया। इस बिल की धारा 18 के तहत, किसी व्यक्ति को ट्रांसजेंडर बनने के लिए “लुभाने” या “मजबूर करने” पर पाँच साल तक की जेल हो सकती है।
“इस बात का कोई भी विश्वसनीय सबूत मौजूद नहीं है कि इस तरह का कोई भी बर्ताव समाज में एक आम चलन के तौर पर मौजूद है।” “जो चीज़ असल में मौजूद है और जिसे यह प्रावधान खतरे में डाल रहा है, वह है ट्रांसजेंडर लोगों का विशाल सामुदायिक सहायता नेटवर्क: फंडरेज़र, अस्थायी आवास, शोषण करने वाले परिवारों से निकलने में मदद, थेरेपी तक पहुँच, और लिंग-पुष्टि करने वाली स्वास्थ्य सेवाएँ,” उन्होंने कहा।
बयान में कहा गया है कि लिंग-पुष्टि करने वाली देखभाल देने वाले, सहायक माता-पिता, और समुदाय के सदस्य, जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से ट्रांसजेंडर लोगों की रक्षा की है और उनका पालन-पोषण किया है, अब अपराधी ठहराए जाने के जोखिम का सामना कर रहे हैं। “यह औपनिवेशिक काल के कानूनों की विरासत को दोहराता है, जैसे कि 1871 का ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम’ और 1919 का ‘तेलंगाना हिजड़ा अधिनियम’—ये ऐसे कानून थे जो लिंग-विविध समुदायों को स्वाभाविक रूप से कपटी और अपराधी मानते थे,” इसमें आगे कहा गया।









