ट्रांस बिल से ‘खुद की पहचान’ वाला क्लॉज़ हटा, ‘बिल का मकसद लोगों के एक खास वर्ग को सुरक्षा देना है’
नई दिल्ली: ट्रांसजेंडर्स (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन बिल में उस क्लॉज़ को हटाने का प्रस्ताव दिया गया है, जिसके तहत “खुद की पहचान” को ही ट्रांसजेंडर सर्टिफिकेट पाने और पहचान तय करने का आधार माना जाता था। यह रिपोर्ट अंबिका पंडित ने दी है।
जस्टिस न्यूज
शुक्रवार को लोकसभा में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार द्वारा पेश किए गए इस बिल में बताया गया है कि, “ट्रांसजेंडर व्यक्ति” शब्द की मौजूदा अस्पष्ट परिभाषा के कारण, उन असली पीड़ित लोगों की पहचान करना नामुमकिन हो जाता है, जिन तक इस कानून के फायदे पहुंचाना मकसद है।
इसमें साफ तौर पर कहा गया है कि एक ट्रांस व्यक्ति में “अलग-अलग सेक्शुअल ओरिएंटेशन (यौन रुझान) और खुद की पहचान वाले लोग शामिल नहीं होंगे, और न ही कभी शामिल किए गए थे।” इसमें आगे कहा गया है, “इस कानून के तहत दी जाने वाली सुरक्षा और फायदे बहुत बड़े दायरे में आते हैं। इसलिए, इस बात का खास ध्यान रखना होगा कि यह पहचान किसी भी ऐसी खासियत, निजी पसंद या किसी व्यक्ति की खुद की पहचान के आधार पर न दी जाए, जिसे बाद में हासिल किया गया हो।” बिल के उद्देश्यों वाले बयान में कहा गया है, “इस कानून का मकसद लोगों के एक ऐसे खास वर्ग को सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से सुरक्षा देना था, जिन्हें ट्रांसजेंडर के तौर पर जाना जाता है। ये लोग समाज में बहुत ज़्यादा और दमनकारी भेदभाव का सामना करते हैं।”
इसमें आगे कहा गया है, “इस कानून का मकसद कभी भी उन सभी लोगों को सुरक्षा देना नहीं था, जिनकी अलग-अलग जेंडर पहचान, खुद की पहचान या जेंडर फ्लुइडिटी (बदलती पहचान) है।” इस बिल में कुछ खास अपराधों के लिए अलग-अलग सज़ाओं का प्रस्ताव भी दिया गया है। ये सज़ाएं अपराध की गंभीरता, चोट के ठीक न हो पाने की स्थिति और पीड़ित बच्चों की खास तौर पर कमज़ोर स्थिति को ध्यान में रखकर तय की गई हैं। इस बिल में चीफ मेडिकल ऑफिसर की अध्यक्षता में एक मेडिकल बोर्ड बनाने का प्रस्ताव भी है। अगर यह बिल अपने मौजूदा रूप में पास हो जाता है, तो आगे चलकर डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ही ट्रांसजेंडर पहचान का सर्टिफिकेट जारी करेंगे। ऐसा करने से पहले वे उस मेडिकल बोर्ड की सिफारिशों की जांच करेंगे, जिसे केंद्र या राज्य सरकार द्वारा गठित “अथॉरिटी” के तौर पर मान्यता दी जाएगी। यह बिल एक ट्रांस व्यक्ति को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित करता है, जिसकी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान ‘किन्नर’, ‘हिजड़ा’, ‘अरवानी’ और ‘जोगता’ जैसी हो, या जो नपुंसक हो, या जिसमें इंटरसेक्स विविधताएँ हों, या ऐसा व्यक्ति जिसमें जन्म के समय, पुरुष या महिला के विकास की तुलना में एक या अधिक यौन विशेषताओं में जन्मजात विविधता हो: जैसे प्राथमिक यौन विशेषताएँ; बाहरी जननांग, क्रोमोसोमल पैटर्न, गोनाडल विकास, आंतरिक हार्मोन उत्पादन या प्रतिक्रिया। बिल में कहा गया है कि मौजूदा कानून भी ट्रांस व्यक्तियों के खिलाफ भेदभाव और दुर्व्यवहार को प्रतिबंधित करता है, लेकिन इसके दंडात्मक प्रावधान केवल सामान्य गलतियों और आपराधिक अपराधों से निपटते हैं, और इसमें अधिकतम दो साल की कैद का प्रावधान है।
प्रस्तावित संशोधन अधिक कठोर दंड और सज़ाओं के लिए गुंजाइश बनाते हैं। “इसके अलावा, कोई भी व्यक्ति या बच्चा जिसे ज़बरदस्ती, प्रलोभन, बहकावे, धोखे या अनुचित प्रभाव से—चाहे उसकी सहमति हो या न हो—एक ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने, धारण करने या बाहरी रूप से प्रदर्शित करने के लिए मजबूर किया गया हो; चाहे वह अंग-भंग, नपुंसक बनाने, अंडकोष निकालने, अंग काटने, या किसी भी सर्जिकल, रासायनिक, या हार्मोनल प्रक्रिया या किसी अन्य तरीके से किया गया हो, उसे इस परिभाषा में शामिल किया जाएगा।” यदि किसी ट्रांस व्यक्ति का अपहरण किया जाता है और उसे अंग-भंग, नपुंसक बनाने, या किसी सर्जिकल, रासायनिक, या हार्मोनल प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है; या उसे स्थायी या गंभीर चोट पहुँचाई जाती है—इस इरादे से कि उस व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध एक ट्रांस व्यक्ति की पहचान अपनाने या बाहरी रूप से प्रदर्शित करने के लिए मजबूर किया जा सके—तो इस अपराध के लिए 10 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा दी जाएगी।
इसके अतिरिक्त, 2 लाख रुपये से कम का जुर्माना भी नहीं लगाया जाएगा। यदि यही अपराध किसी बच्चे के साथ किया जाता है, तो सज़ा आजीवन कारावास और 5 लाख रुपये का जुर्माना होगी।









