हरियाणा भूमि सौदा मामले में ईडी ने वाड्रा से की पूछताछ
गुड़गांव: प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने मंगलवार को कांग्रेस महासचिव और लोकसभा सांसद प्रियंका गांधी के व्यवसायी पति रॉबर्ट वाड्रा से अपने मुख्यालय में छह घंटे तक एक विवादास्पद भूमि सौदे के संबंध में पूछताछ की, जो उनकी कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी ने 2008 में 7.5 करोड़ रुपये में किया था।
वाड्रा, जो 8 अप्रैल को अपने पहले समन में शामिल नहीं हो पाए थे, सुबह 11 बजे ईडी कार्यालय पहुंचे और उनसे लंच ब्रेक के दौरान दो सत्रों में भूमि सौदे से उनके जुड़ाव के बारे में पूछताछ की गई, जिससे उन्हें कुछ ही महीनों में 50 करोड़ रुपये का अच्छा रिटर्न मिला। उनसे पूछताछ बुधवार को भी जारी रहेगी।
वाड्रा के खिलाफ यह एक नया मामला है, जिसकी जांच हरियाणा और राजस्थान में अन्य भूमि सौदों से संबंधित दो अन्य मनी लॉन्ड्रिंग जांचों के साथ चल रही है। मौजूदा मामले में वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी ने 2008 में ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज से शिकोहपुर (हरियाणा) में 7.5 करोड़ रुपये में 3.5 एकड़ जमीन खरीदी थी। इसके तुरंत बाद तत्कालीन सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में राज्य की कांग्रेस सरकार ने 2.7 एकड़ के लिए वाणिज्यिक लाइसेंस प्रदान किए।
चार महीने बाद, जमीन को लगभग आठ गुना कीमत – 58 करोड़ रुपये – पर डीएलएफ को बेच दिया गया, जिससे 50 करोड़ रुपये से अधिक का लाभ हुआ। वाड्रा ने ईडी के कदम की आलोचना करते हुए इसे ‘राजनीति में उनके प्रवेश को विफल करने और लोगों के मुद्दों को उठाने से रोकने का प्रयास’ बताया। वाड्रा के खिलाफ कार्रवाई ईडी द्वारा नेशनल हेराल्ड मनी लॉन्ड्रिंग मामले में यंग इंडियन नियंत्रित एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड की 750 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की जमीन और इमारतों को कब्जे में लेने के नोटिस जारी करने के तुरंत बाद हुई। अदालत ने आरोपपत्र पर संज्ञान लेने के लिए अगली सुनवाई की तारीख 25 अप्रैल तय की है।
ईडी कार्यालय जाते समय वाड्रा ने कहा कि उनके खिलाफ कार्रवाई “राजनीति से प्रेरित” है। उन्होंने कहा, “मैं इससे डरने वाला नहीं हूं। वे मुझसे जितने सवाल पूछ सकते हैं, पूछ सकते हैं। मैं उन सभी का जवाब दूंगा। मेरे पास छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है।” उन्होंने आगे कहा, “जब भी मैं लोगों की आवाज उठाने या राजनीति में प्रवेश करने की बात करता हूं, तो यह सरकार मुझे दबाने के लिए इन एजेंसियों का इस्तेमाल करती है। मैं पहले 20 से अधिक बार पेश हो चुका हूं, 23,000 दस्तावेज जमा कर चुका हूं और 15 घंटे के सत्रों में बैठ चुका हूं। फिर भी, वे और अधिक मांग करते रहते हैं।”
शिकोहपुर में वाड्रा के भूमि सौदे ने 2012 में राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया था, जब आईएएस अधिकारी अशोक खेमका, जो हरियाणा में भूमि पंजीकरण के तत्कालीन निदेशक थे, ने प्रक्रियागत अनियमितताओं का हवाला देते हुए भूमि म्यूटेशन को रद्द कर दिया था। राज्य ने कुछ ही घंटों में खेमका का तबादला कर दिया, जिससे लोगों की भौहें तन गईं। लेकिन पदभार छोड़ने से पहले खेमका ने एक रिपोर्ट पेश की, जिसमें म्यूटेशन को खारिज कर दिया गया और इसे मंजूरी देने वाले अधिकारी के अधिकार पर सवाल उठाया गया। 2013 में, तत्कालीन हुड्डा सरकार द्वारा गठित तीन सदस्यीय आईएएस पैनल ने वाड्रा और डीएलएफ दोनों को क्लीन चिट दे दी।
इसके बाद 2014 में सत्ता संभालने वाली भाजपा सरकार ने जस्टिस ढींगरा आयोग का गठन किया, जिसने एक गोपनीय रिपोर्ट पेश की। हुड्डा ने 2016 में आयोग के गठन के खिलाफ हाईकोर्ट का रुख किया। दो साल बाद, हरियाणा पुलिस ने वाड्रा, हुड्डा, डीएलएफ और ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज के खिलाफ धोखाधड़ी, आपराधिक साजिश और जालसाजी के आरोप में एफआईआर दर्ज की। ईडी ने पीएमएलए के तहत जांच शुरू की।
साभार : टाइम्स ऑफ़ इंडिया
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