आरटीआई अधिनियम को कमज़ोर करने वाले डेटा संरक्षण क़ानून पर कांग्रेस, कार्यकर्ताओं की नाराज़गी
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने डेटा संरक्षण कानून के ज़रिये आरटीआई अधिनियम को कमज़ोर करने पर चिंता जताई है. खरगे ने कहा कि यह पारदर्शिता और जवाबदेही पर हमला है. कार्यकर्ताओं ने इसे रद्द करने की मांग करते हुए हस्ताक्षर अभियान भी शुरू किया है.
नई दिल्ली: कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज व मेधा पाटकर ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (डीपीडीपी) अधिनियम, 2023 के रास्ते सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम में किए गए संशोधन को लेकर अपनी चिंता दोहराई है.
खरगे ने 4 मार्च 2025 (मंगलवार) को कहा कि डीपीडीपी अधिनियम, 2023, सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 को कमजोर कर रहा है. इस कानून के तहत आरटीआई अधिनियम के उस प्रावधना को हटा दिया गया है, जो जनहित में व्यक्तिगत जानकारी के खुलासे को जरूरी बनाती थी.
द हिंदू के मुताबिक, सामाजिक कार्यकर्ता 2023 से ही इस संशोधन का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि यह सरकारी जवाबदेही को कम कर सकता है. उनका कहना है कि इसके कारण राशन वितरण जैसे सोशल ऑडिट को रोकना आसान हो जाएगा, जिससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल सकता है.
यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि डीपीडीपी अधिनियम के तहत किए गए आरटीआई संशोधन को लागू करने के लिए अधिसूचना जारी होनी बाकी है. केंद्र सरकार अभी भी डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन रूल्स, 2025 के मसौदे पर जनता की राय ले रही है, जिसके लागू होते ही यह संशोधन प्रभावी हो जाएगा.
खरगे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, ‘एक तरफ भारत पिछले कुछ वर्षों से गलत और भ्रामक सूचनाओं में शीर्ष पर है, वहीं दूसरी तरफ मोदी सरकार डेटा संरक्षण कानून लाकर कांग्रेस-यूपीए द्वारा लागू किए गए आरटीआई अधिनियम को कमजोर करने पर तुली हुई है.’
खरगे ने कहा कि कांग्रेस के बनाए आरटीआई अधिनियम में ‘निजता के अधिकार’ का भी ध्यान रखा गया था, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि राशन और अन्य सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों की सूची या घोटालेबाजों के नाम छिपाए जाएं.
नेशनल कैंपेन फॉर पीपुल्स राइट टू इनफॉर्मेशन (एनसीपीआरआई) की सह-संयोजक अंजलि भारद्वाज ने सोमवार (3 मार्च) को कहा कि इस संशोधन से महत्वपूर्ण सूचनाओं तक पहुंच बाधित होगी और जवाबदेही की लड़ाई और मुश्किल हो जाएगी. भारद्वाज और उनकी संस्था एनसीपीआरआई ने इस संशोधन को रद्द करने की मांग को लेकर इस हफ्ते एक हस्ताक्षर अभियान भी शुरू किया है.
सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने कहा कि जब देश के लोकतंत्र पर हमला हो रहा है, तब आरटीआई अधिनियम को बचाना बेहद जरूरी है. उन्होंने आरोप लगाया कि ‘डेटा संरक्षण के नाम पर सूचना छिपाने की कोशिश हो रही है.’
उन्होंने उदाहरण दिया कि ‘नर्मदा घाटी के लोगों ने आरटीआई अधिनियम का उपयोग कर 1,600 फर्जी रजिस्ट्रियां उजागर की थीं, लेकिन नए संशोधन के बाद यह संभव नहीं होगा.’
कई मोर्चों पर जूझ रहा है आरटीआई
इस साल शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को फटकार लगाते हुए सूचना आयोगों में सूचना आयुक्तों की नियुक्तियों में लगातार हो रही देरी को लेकर सवाल पूछे थे.
जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ को याचिकाकर्ताओं ने बताया कि केंद्रीय सूचना आयोग में सूचना आयुक्तों के आठ पद खाली हैं और करीब 23,000 अपीलें लंबित हैं. कई राज्य सूचना आयोग 2020 से निष्क्रिय हैं, और कुछ ने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत याचिकाएं स्वीकार करना बंद कर दिया है.
इन आंकड़ों के आधार पर पीठ ने केंद्र सरकार के वकील से पूछा, ‘एक संस्थान बनाया गया है, लेकिन यदि इसके तहत काम करने वाले लोग ही नहीं होंगे, तो इसका क्या उपयोग है?’
लंबित मामलों का बढ़ता जा रहा है बोझ
पिछले साल अक्टूबर में अंजलि भारद्वाज की संस्था ‘सतर्क नागरिक संगठन’ ने रिपोर्ट (भारत में सूचना आयोगों के प्रदर्शन पर रिपोर्ट कार्ड, 2023-24) जारी कर बताया था, सूचना आयोगों में चार लाख से अधिक शिकायतें और अपीलें लंबित हैं. सूचना आयुक्तों के पद रिक्त पड़े हैं. कई आयोग तो निष्क्रिय हो चुके हैं. कई आयोग बिना जवाब दिए आवेदन लौटा दे रहे हैं. प्रत्येक आयोग को अपने कार्यान्वयन की वार्षिक रिपोर्ट तैयार करनी होती है, ज़्यादातर ऐसा नहीं कर रहे हैं.
सतर्क नागरिक संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक़, 30 जून, 2024 तक भारत के सभी 29 सूचना आयोगों में लंबित अपीलों और शिकायतों की संख्या 4,05,509 थी. साल दर साल अपीलों/शिकायतों के बैकलॉग की संख्या बढ़ती जा रही है. 31 मार्च, 2019 तक 26 सूचना आयोगों में कुल 2,18,347 मामले लंबित थे. 30 जून, 2021 तक संख्या बढ़कर 2,86,325 हो गई. जून 2022 में लंबित शिकायतों और अपीलों की संख्या तीन लाख को पार कर गई थी.
पिछले साल, 30 जून, 2023 तक बैकलॉग 3,88,886 था. (इन आंकड़ों से पता चलता है कि गत पांच सालों में लंबित शिकायतों/अपीलों की संख्या 1,87,162 बढ़ गई है.)
क्या आरटीआई को कमजोर किया जा रहा है?
अक्टूबर 2024 में द वायर हिंदी से बातचीत में अंजलि भारद्वाज ने कहा था कि 2005 में क़ानून को मज़बूत बनाया गया था, लेकिन उसका अनुपालन सही से नहीं हो रहा है, उसे ठीक करने की ज़रूरत है.
अंजलि, बैकलॉग को बेहद गंभीर समस्या मानती हैं. उनका कहना था, ‘मामले लंबित होने से लोगों को बहुत समय तक इंतज़ार करना पड़ रहा है. हमारी रिपोर्ट बताती है कि अभी जो हालत है, अगर छत्तीसगढ़ और बिहार में एक नया आरटीआई दायर किया जाए तो उसकी सुनवाई का नंबर आने में चार से पांच साल तक का समय लग जाएगा. …अगर सूचना इतनी देरी से मिलेगा तो उसका क्या मतलब रह जाएगा. लोग सूचना मांगते हैं भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए, अपने अधिकारों को पाने के लिए, ऐसे में सूचना पाने के लिए पांच–पांच साल इंतज़ार करना पड़े तो उस सूचना का क्या महत्व रह जाएगा.’
अंजलि ने कहा था, ‘सरकारें अलग–अलग तरह से कोशिश कर रही हैं कि लोगों को सूचना न मिले क्योंकि जब सूचना सामने आती है तो सरकारों पर बहुत तरह के सवाल उठते हैं. सरकारों के लिए यह सहज नहीं होता है. ऐसे में लोगों के पास विकल्प यही है कि वे सूचना आयोग में जाकर सूचना मांगे. अपील और शिकायत करें. सूचना आयोग बहुत जरूरी है. सूचना आयोग का काम है कि अगर सरकार ग़लत तरीके से सूचना नहीं दे रही है तो सूचना आयुक्तों के पास यह शक्ति है कि वह सरकार को सूचना देने के लिए निर्देश दे सकें. जब सूचना आयोग सही से काम नहीं करेंगे. तब तक लोगों को सूचना नहीं मिलेगी. ख़ासकर ऐसी सूचना नहीं मिलेगी जो सरकार देना नहीं चाहती है. सरकार से सूचना दिलवाई जाई ये काम सूचना आयुक्तों का है.’
अंजलि भारद्वाज से बातचीत में यह बात उभरकर सामने आती है कि सूचना के अधिकार के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए यह बहुत जरूरी है कि सूचना आयुक्त सही से काम करें और ऐसे लोगों पर जुर्माना लगाया जाए जो सूचना नहीं दे रहे हैं.
अंजलि, आरटीआई के लिए चलाए गए राष्ट्रीय अभियान की सह-संयोजक रही हैं. उनका संगठन लंबे समय से सूचना के अधिकार का इस्तेमाल कर वंचित समूहों को उनका अधिकार दिलाने का काम कर रहा है.
सौजन्य: द वायर
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