बिहार में 19 प्रतिशत दलित वोट, सबकी है इसपर नजर, सवाल- कौन बनेगा इनका खेवनहार
बिहार में जमीनी स्तर पर दलित किस ‘दलदल’ में अपना जीवन बसर करते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है. पर नेता दल’गत’ राजनीति करते.
पटना : ”पहले हमारे गांव बैरीगाछी में पगडंडी थी. मीडिया में खबर आने के बाद जाने का रास्ता बना है. राजनेता सिर्फ आरक्षण की बात करते हैं आरक्षण कोई वैक्सीन नहीं है, जिससे कि सभी समस्या का समाधान हो जाएगा. जो सबसे निचले तबके के दलित हैं उन्हें आज भी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता है.”- बुच्चो पासवान, भोला पासवान शास्त्री के ग्रामीण
”भोला पासवान शास्त्री जी के बाद जो भी दलित मुख्यमंत्री रहे वह दलितों के विकास को लेकर गंभीर नहीं रहे. बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने जो आरक्षण की व्यवस्था की थी उसे अगर ईमानदारी पूर्वक लागू किया गया होता तो दलित आज हासिये पर नहीं होते.”- मुकेश पासवान, भोला पासवान शास्त्री के ग्रामीण
बिहार में बात दलित दंगल की : बिहार में जाति की राजनीति हावी है. ऐसे में जब विधानसभा चुनाव सामने है तो हर कोई अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने में जुट चुका है. भला दलित के रहनुमा कहलाने वाले इससे कैसे पीछे रह सकते हैं. जैसा नजारा आज पटना में देखने को मिला. उसपर हम बात करेंगे, लेकिन सबसे पहले बात दलित दंगल की कर लेते हैं.
बिहार में तीन दलित मुख्यमंत्री रहे : बिहार में हमेशा ही दलितों को वोटबैंक की तरह इस्तेमाल किया गया. तभी तो बिहार में तीन दलित मुख्यमंत्री हुए, जिससे दलित समुदाय के लोगों को उम्मीदें थी. पर हुआ वही ठाक के तीन पात. मतलब वोट लिए भूल गए.
भोला पासवान देश के पहले दलित मुख्यमंत्री थे. उन्होंने तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में काम किया. पहली बार भोला पासवान शास्त्री फरवरी 1968 से जून 1968 तक मुख्यमंत्री रहे. उसके बाद जून 1969 से जुलाई 1969 तक मुख्यमंत्री रहे. जून 1971 से लेकर जनवरी 1972 तक तीसरी बार भोला पासवान शास्त्री मुख्यमंत्री रहे.
गांव के लोग ठगा महसूस कर रहे : भोला पासवान शास्त्री ने दलितों के उत्थान के लिए काम किया. दलित उत्पीड़न को रोकने के लिए उन्होंने आवाज उठाई. भोला पासवान शास्त्री ने बिहार के दलितों के अंदर दलित चेतना जगाने का भी काम किया. हालांकि पूर्णिया जिला स्थित दलित आबादी वाले गांव बैरगाछी के रहने वाले बुच्चो पासवान आज भी खुद को उपेक्षित महसूस करते हैं. उनके गांव तक विकास के रोशनी नहीं पहुंची है.
अहम पदों पर रहे भोला पासवान : बता दें कि बैरीगाछी में बिहार के तीन बार के मुख्यमंत्री रहे भोला पासवान शास्त्री का जन्म हुआ था. वही भोला पासवान शास्त्री जो बिहार के पहले दलित मुख्यमंत्री थे. भोला पासवान शास्त्री जो राज्यसभा सांसद, इंदिरा गांधी सरकार में केंद्रीय मंत्री और देश में जब पहली पहली बार अनुसूचित और अनुसूचित जनजाति आयोग बना तो उसके पहले चेयरमैन भी बने थे.
रामसुंदर दास बिहार के दूसरे दलित मुख्यमंत्री हुए. उन्होंने 21 अप्रैल 1979 से लेकर 17 फरवरी 1980 तक मुख्यमंत्री के रूप में काम किया. कई मौकों पर रामसुंदर दास ने दलितों के पक्ष में आवाज बुलंद किया.
जीतन राम मांझी तीसरे दलित मुख्यमंत्री हुए उन्होंने 20 मई 2014 से 20 फरवरी 2015 तक मुख्यमंत्री के रूप में काम किया. जीतन राम मांझी ने असमानता को लेकर आवाज उठाई दलितों के खिलाफ हो रहे भेदभाव को भी जीतन राम मांझी ने मजबूती से उठाया. इसके अलावा ठेकेदारी में दलितों की भागीदारी को सुनिश्चित करने का प्रयास किया.
मांझी ने दलित समागम कर ताकत दिखाई : अब एक बार फिर से गांधी मैदान में दलित समागम कर जीतन राम मांझी ने बता दिया है कि वह किसी से कम नहीं है. मांझी की ताकत के पीछे की कहानी 19 प्रतिशत दलित आबादी है. जिसको ढाल बनाकर आगे की रणनीति तैयार की जा रही है.
इन सबके पीछे 19 प्रतिशत वोट बैंक : वैसे अगर गौर से देखें तो हर कोई इस 19 प्रतिशत के पीछे भाग रहा है. एनडीए में चिराग पासवान और मांझी ताल ठोक रहे हैं. महागठबंधन में वाम और आरजेडी. इन सबमें सेंधमारी के लिए जन सुराज के प्रशांत किशोर भी अपनी चाल चल चुके हैं.
दलितों को प्रतिनिधित्व देने की बात : भाजपा और जदयू खुद को दलितों का स्वभाविक हिमायती बताने में जुटी है. दरअसल राजनीतिक दलों की नजर 38 सुरक्षित सीटों पर है. सभी दल ज्यादा से ज्यादा आरक्षित सीटों को अपने पक्ष में करने के लिए रणनीति बना रहे हैं. हर दल दलितों को अधिक से अधिक प्रतिनिधित्व देने की बात कह रहा है.
बिहार में अनुसूचित जाति के लिए 38 सीट है आरक्षित : बिहार में दलितों की आबादी 1 करोड़ 65 लाख के आसपास है. दलितों के लिए 38 विधानसभा सीट सुरक्षित है. जब बिहार झारखंड एक था तब सुरक्षित सीटें 48 हुआ करती थी. परिसीमन से पहले 40 सुरक्षित सीट हुआ करती थीं, लेकिन इसके बाद यह घटकर 38 हो गई. मौजूदा वक्त में दलित नेता तो हैं, लेकिन उन्होंने राजनीति को जातियों में बांट दिया है. आलम ये है कि दलित राजनीति संकट के दौर से गुजर रही है.
साल 2015 के विधानसभा चुनाव में राजद के टिकट पर सबसे ज्यादा 14 दलित विधायक चुनाव जीतकर आये थे. जबकि जदयू के 10, कांग्रेस के 5, भाजपा के 5 विधायक चुने गए थे. इनमें सबसे ज्यादा 13 सीटें रविदास समुदाय के खाते में गईं थी, जबकि 11 पर पासवान समुदाय का कब्जा रहा है.
2020 में 38 दलित विधायक जीते चुनाव : 2020 के विधानसभा चुनाव में कुल 38 दलित विधायक चुनाव जीतकर आए. जिसमें पासवान जाति से 13, रविदास जाति से 13, मुसहर समाज से 7, पासी जाति के 3 और एक विधायक मेहतर जाति के शामिल हैं. दलगत आधार पर अगर ये बातें की जाए तो बीजेपी और आरजेडी के 9-9 विधायक दलित हैं. वहीं, जेडीयू के 8, कांग्रेस के 4, हम पार्टी के 3, सीपीआई (एमएल) के 3 और वीआईपी-सीपीआई के एक-एक दलित विधायक हैं.
जातियों की कैटेगरी : ये बताना जरूरी है कि पहले बिहार के दलित समुदाय में 22 जातियां आती थीं. लेकिन साल 2005 में जब नीतीश कुमार सरकार में आए तो उन्होंने दलित वोट बैंक साधने के लिए दलितों को दो भागों में बांट दिया. 22 में से 21 जातियों को महादलित कैटेगरी में शामिल कर दिया. सिर्फ पासवान जाति को दलित कैटेगरी में रखा गया.
‘राजनीतिक दल या नेता दलितों के विकास को लेकर गंभीर नहीं’ : दलित चिंतक प्रेम कुमार मणि कहते हैं कि दलितों का विकास बिहार में राजनीतिक मुद्दा भर रहा है. कोई भी राजनीतिक दल या नेता दलितों के विकास को लेकर गंभीर नहीं रहे हैं. तीन दलित मुख्यमंत्री बिहार में हुए, लेकिन तीनों मुख्यमंत्री किसी न किसी दबाव में काम करते रहे. इस वजह से वह दलितों के लिए कुछ खास नहीं कर पाए.
”बिहार में कोई दलितों के लिए बड़ा आंदोलन नहीं हुआ जिस तरीके का आंदोलन दक्षिण भारत में हुआ. जीतन राम मांझी और चिराग पासवान फिलहाल दो बड़े दलित नेता हैं लेकिन दोनों परिवार के दायरे से बाहर नहीं निकाल पाए हैं.”- प्रेम कुमार मणि, दलित चिंतक
‘चुनावी मौसम में उठती है हक की बात’ : राजनीतिक विश्लेषक डॉक्टर संजय कुमार कहते हैं कि चुनावी मौसम में राजनीतिक दल और नेता दलितों के हक की बात करते हैं, लेकिन कुर्सी और सत्ता मिलने के बाद परिवार हित में काम करने लगते हैं. दलित समुदाय और समाज की चिंता उन्हें नहीं होती है.
”आरक्षण का लाभ दलित समुदाय में चार-पांच जातियों तक सिमट कर रह गया है. सुप्रीम कोर्ट ने पहल जरूर की थी लेकिन दबाव में सरकार आ गई और उस पर विमर्श नहीं हो सका. विधानसभा चुनाव है और रैली के जरिए राजनीतिक दल शक्ति प्रदर्शन करने की कोशिश में है. जीतन राम मांझी कितने कामयाब होते हैं यह देखने वाली बात होगी.”- संजय कुमार, राजनीतिक विश्लेषक
दलित समागम में CM नीतीश का 17 सेकेंड का संबोधन : अब एक बार फिर से बात दलित समागम की करते हैं. जिसके माध्यम से जीतनराम मांझी ने NDA की एकजुटता का प्रदर्शन किया. हम(से) के कार्यक्रम में जीतनराम मांझी ने बिहार के CM नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को भी आमंत्रित किया था. गांधी मैदान के कार्यक्रम ने जदयू और बीजेपी के तरफ से नीतीश कुमार और सम्राट चौधरी पहुंचे. मंच से सीएम नीतीश ने 17 सेकेंड का संबोधन भी दिया.
हम का दलित मसमागम
‘संख्या के आधार पर दलितों को आरक्षण’ : जीतन राम मांझी ने दलितों को मिलने वाले आरक्षण की प्रक्रिया में बदलाव की आवश्यकता बताई. उन्होंने कहा कि आज यह जरूरी हो गया है कि अनुसूचित जाति में आने वाले अलग-अलग जातियों को शिक्षा के आधार पर वर्गीकरण कर उन्हें आरक्षण दिया जाए. साक्षरता का जो प्रतिशत जिस अनुसूचित जाति की उपजातियों में हो उसी के आधार पर आरक्षण लागू किया जाए.
”देश में आज अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग से आने वाले लोगों की तादाद 30 फीसदी से ज्यादा है. इसके बावजूद सत्ता किसके हाथों में है यह सभी को मालूम है. बाबा साहब ने हमें यह मंत्र दिया था कि एकजुकता के साथ हम शासन में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित कर सकते हैं. शासन में हिस्सेदारी हासिल किए बगैर विकास को पाना मुमकिन नहीं है. ऐसा लगता है कि मौजूदा वक्त में हम अलग-अलग जातियों में विभाजित हो गए हैं. इसी कारण कटोरा लेकर घूम रहे हैं लेकिन हमें वाजिब हक नहीं मिल रहा.”- जीतन राम मांझी, केन्द्रीय मंत्री
साभार : ईटीवी भारत
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