कुम्हेर के अगले दिन 3 दलितों को जिंदा जलाया था:हाथ-पैर काटे; न्यायिक आयोग की टिप्पणी- पुलिस ने दंगाइयों के लिए कारपेट बिछाया…पार्ट 3
भास्कर की स्पेशल सीरीज ‘कुम्हेर हत्याकांड’ के पार्ट 1 में आपने पढ़ा कि कुम्हेर में किस तरह छोटे-छोटे विवादों से शुरू हुए झगड़े का बदला लेने के लिए 16 दलितों की ह्त्या कर दी गई।
पार्ट 2 में पढ़ा कि किस तरह पीड़ितों को न्याय के लिए 31 साल तक लड़ाई लड़नी पड़ी। सुनवाई के दौरान 20 जज बदल गए।आज पार्ट 3 में जानिए कुम्हेर कांड के अगले दिन सेंथरी में किस तरह 3 दलितों को जिंदा जला दिया। वहीं सरकार द्वारा गठित जस्टिस के एस लोढ़ा न्यायिक आयोग ने कुम्हेर में हुए दलित नरसंहार के लिए किन्हें जिम्मेदार माना ? 6 जून को भरतपुर के कुम्हेर में जो हत्याओं का सिलसिला शुरू हुआ, वो रात होते-होते थम गया। प्रशासन ने भी बिगड़े हालातों को संभालने के लिए कर्फ्यू लगा दिया।
दलित बस्तियों में सिवाय काले धुएं और मातम की चीत्कारों के न कुछ सुनाई दिखा रहा था और न कुछ सुनाई दे रहा था। जैसे-तैसे रात निकल गई। अगले दिन 7 जून को सुबह होने के साथ ही दंगाई भीड़ एक बार फिर अलग-अलग गांवों से जुटना शुरू हो गई । इस बार भीड़ के निशाने पर कुम्हेर के पास स्थित सेंथरी गांव के दलित थे।
सेंथरी के रहने वाले भगवान् सिंह जाटव ने बताया कि- तब लगातार विवाद हो रहे थे। हम इस भ्रम में थे कि हमारा विवाद से कोई लेना-देना नहीं है तो हमें क्यों कोई कुछ कहेगा ?
7 जून को सुबह-सुबह कुछ लोग गांव में आए थे। उन्होंने भी तो यहीं कहा कि आप लोगों का कोई लेना-देना नहीं है, कहीं भागो मत और डरो मत। आपको कोई कुछ नहीं करेगा।कई लोग उनके विशवास में आ गए। वहीं कई लोग उनकी बातों में नहीं आये। जो उनके झांसे में नहीं आये वो संभल गए थे।
दोपहर में गांव में घुसी हजारों की भीड़
दोपहर करीब 12 बजे अचानक गांव में नहर की तरफ से हजारों की भीड़ घुस गई। भीड़ हर तरह आग लगा रही थी। सभी इधर-उधर जान बचाते हुए भाग रहे थे।
भीड़ ने भागते हुए गांव के फूल सिंह के पांव में गोली मारी। वो गिरा और दुबारा से उठकर लंगड़ाते हुए भागने लगा। दंगाई भीड़ ने उसे घेर लिया गया और फरसे से उसके हाथ-पांव काट दिए गए। इसके बाद उसे आग लगाकर ज़िंदा ही जला दिया गया।
इसके बाद भीड़ के हत्थे दो भाई नाहरसिंह और थानसिंह चढ़ गए। भीड़ ने नाहरसिंह को भी ज़िंदा जलाकर मार डाला। वहीं थानसिंह 80 फीसदी तक जल गया था, जिसे बाद में हॉस्पिटल में बचा लिया गया।
भीड़ ने खेतों की तरफ से कुम्हेर की तरफ भाग रहे गोपाल को भी घेर लिया। फरसे से मारपीट करते हुए घायल कर पटक दिया। इसके बाद सरसों की तुड़ी में फेंककर आग लगा दी। गोपाल ज़िंदा जल गया। भीड़ ने गांव के कई घरों में आग लगा दी।
मामले में 27 लोगों को आरोपी बनाया गया था। सुनवाई के दौरान इनमें से एक आरोपी मोहन सिंह पुत्र जौहरी की मौत हो गई।साल 2013 में न्यायालय ने 7 आरोपियों नेकराम, राजाराम, बाबूलाल, महेश, कुंजबिहारी, राधेश्याम और विपती राम को विभिन्न धाराओं में दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी और 50-50 हजार रुपए का अर्थदंड भी लगाया था।
7 जून को ही सरकार ने मामले की जांच के लिए बनाया न्यायिक आयोग
भरतपुर जिले में हुए हत्याकांड के बाद प्रदेश की राजनीति में भी भूचाल आ गया था। राज्य सरकार ने 7 जून को ही इन दंगों की जांच के लिए जस्टिस के एस लोढ़ा न्यायिक आयोग का गठन कर दिया।
आयोग को न सिर्फ हत्याकांड के कारण तलाशने थे, बल्कि अपनी रिपोर्ट में दोबारा ऐसी घटनाओ से बचने के लिए उठाये जाने वाले कदमों के लिए राज्य सरकार को सिफारिशें भी करनी थी।
लोढ़ा आयोग की रिपोर्ट 2005 तक सार्वजनिक नहीं की गई थी। दलित उत्थान के लिए काम करने वाले एडवोकेट स्वर्गीय मिमरोथ ने इसे लेकर याचिका लगाईं। याचिका को ये कह कर खारिज कर दिया गया कि वो सरकार को इसके लिए बाध्य नहीं कर सकते है। सिर्फ विधायक या विधानसभा के सदस्य ही आयोग की रिपोर्ट के लिए सरकार से सदन में मांग कर सकते है।
इसके बाद एडवोकेट मिमरोथ ने विधानसभा में पिछले कुछ सालों में पटल पर रखी गई न्यायिक आयोग की रिपोर्ट्स मांगी, तब जाकर उन्हें लोढ़ा आयोग की रिपोर्ट भी मिल गई।
के एस लोढ़ा न्यायिक आयोग ने हत्याकांड के लिए इन्हे जिम्मेदार ठहराया
1)सामाजिक और आर्थिक प्रतिद्वंद्विता
के एस लोढ़ा न्यायिक आयोग ने माना कि भरतपुर के कुम्हेर और दूसरे इलाकों में जो हुआ उसके जड़ में दोनों जातियों की सामाजिक और आर्थिक प्रतिद्वंद्विता थी।
आयोग ने सुझाया कि सामाजिक और आर्थिक प्रतिद्वंद्विता के चलते होने वाले टकरावों से बचने के लिए सरकार को चाहिए कि वो दलित समाज को प्रोटेक्ट करे और उन्हें उनके हक़ दिलाए। वहीं समाज के अन्य वर्गों में सामाजिक समानता को लेकर उन्हें एजुकेट करने का प्रयास करें।
2 )SC/ST एक्ट का बेजा उपयोग, जिसे एडमिनिस्ट्रेशन चेक ही नहीं करता
लोढ़ा न्यायिक आयोग ने माना कि दलित संरक्षण व उन्हें प्रोटेक्ट करने के लिए बनाए गए SC/ST एक्ट का बेजा और अविवेकपूर्ण उपयोग और इसके बाद लोकल एडमिनिस्ट्रेशन का रोल भी कुम्हेर कांड का कारण बना और बनता है।
उन्होंने माना कि कई मामले ऐसे थे जिसमे महज हैरेसमेंट करने के लिए ही इस एक्ट का यूज किया गया था और लोकल एडमिनिस्ट्रेशन ने बिना कोई फेक्ट और एविडेंस चेक किये ही कार्रवाई कर दी थी। इससे आक्रोश बढ़ा।
3 )सिनेमाघर में हुए विवाद के बाद जो चेन रिएक्शन हुए, उन्हें नहीं तोड़ा गया
लोढ़ा न्यायिक आयोग ने माना कि सिनेमाघर में हुए विवाद के बाद जो छोटे-छोटे विवाद हुए, उन सब से चेन बनती जा रही थी। लोकल एडमिनिस्ट्रेशन इसे लेकर लापरवाह रहा और कोई गंभीरता नहीं दिखाई गई। नतीजतन ये चेन टूटी ही नहीं और बड़ी बन गई।
6 जून की सुबह तक पुलिस ने सिनेमा घर में हुए विवाद से लेकर बस में हुई छेड़छाड़ और मारपीट के दूर आरोपियों तक की कोई गिरफ्तारी नहीं की और न ही कोई मेजर कार्रवाई की।इतना सब कुछ कुम्हेर में हो रहा था पर पुलिस के कोई बड़े अधिकारी पिक्चर में नहीं आये। उन्होंने मौके पर आना तक ठीक नहीं समझा।
अगर इन विवादों की शुरुआत में ही इस चेन को तोड़ दिया जाता और बड़े अधिकारी मामले को हैंडल कर रहे होते तो चामुंडा माता मंदिर पर हुई महापंचायत को टाला जा सकता था।पुलिस की लापरवाहियों ने दंगाइयों को नरसंहार के लिए वहां कारपेट बिछा कर दे दिया था।
4 )कुम्हेर में महिला बस यात्री को नंगा करने की अफवाह को नहीं रोक पाए
लोढ़ा न्यायिक आयोग ने माना कि कुम्हेर कांड में अफवाहों का भी बड़ा रोल रहा और एडमिनिस्ट्रेशन इन अफवाहों और झूठी सूचनाओं के प्रसारण को रोकने में विफल रहा। आयोग ने माना कि कुम्हेर में बस में सवार एक महिला के कपडे़ उतारने और उसके साथ अश्लीलता करने की अफवाह कुछ ही देर में पूरे इलाके में फ़ैल गई थी।
हालांकि 5 जून को तत्कालीन भरतपुर एसपी कपिल गर्ग ने पर्सनली तोर पर चामुंडा माता मंदिर पहुंचकर समाज के लोगों व उनके नेताओं को ये बताया था कि ऐसी कोई घटना नहीं हुई थी और ये पूरी तरह से फेक स्टोरी है, जिसे लोग भड़काने के लिए फैला रहे हैं। न्यायिक आयोग ने माना कि एडमिनिस्ट्रेशन का ये प्रयास नाकाफी था। उन्हें महज चामुंडा माता मंदिर के बजाय प्रॉपर पब्लिकसिटी के जरिये इस अफवाह का खंडन करना चाहिए था। समाज के अफसरों को इस काम में लगना चाहिए था, जो नहीं हुआ।
5 )शरारती तत्वों को न तो आइडेंटिफाई किया और न ही पकड़ा
लोढ़ा न्यायिक आयोग ने माना कि एडमिनिस्ट्रेशन को ऐसे मामलों की आशंका से पहले ही इलाके के शरारती तत्वों को आइडेंटिफाई करना होता है और उन्हें अलग-अलग तरीके से डिटेन कर कंट्रोल करना होता है।कुम्हेर कांड में इस मामले में एडमिनिस्ट्रेशन का पूरी तरह से फेलियर रहा। वो न तो एक भी शरारती तव को आइडेंटिफाई किया गया और न ही उसे पकड़ा गया।
६ )महापंचायत को समझने में एडमिनिस्ट्रेशन की गलती
लोढ़ा न्यायिक आयोग ने माना कि लोकल एडमिनिस्ट्रेशन ने महापंचायत को समझने में भारी गलती कर दी। एडमिनिस्ट्रेशन को कहा गया कि ये उनकी नॉर्मल प्रेक्टिस है, इसके चलते ही इसे होने दिया गया था। वहीं इसके उलट जब किसी समुदाय, जाति और इंसान की कीमत से बड़ी कोई प्रेक्टिस नहीं हो सकती थी।
ऐसे में प्रशासन को महापंचायत को होने ही नहीं देना चाहिए था। इसके अलावा ये भी देखा जाना चाहिए था कि इससे पहले की जाट पंचायतों में एडमिनिस्ट्रेशन के साथ हुई वार्ता में उन्हें दिए आश्वासन और सहमति से वो पलट चुके थे।
7 )कर्फ्यू और प्रतिबंध जैसे आदेश देने में देरी
लोढ़ा न्यायिक आयोग ने माना कि लोकल एडमिनिस्ट्रेशन ने दंगों की स्थिति भांपने में भी बहुत देर कर दी थी। समय रहते न तो कर्फ्यू लगाया गया और न ही इससे पहले जरूरी आदेश दिए गए।
अगर ऐसा पहले ही हो जाता और इसके तहत कुछ कार्रवाई हो जाती तो नरसंहार से बचा जा सकता था। जबकि ये सब तीन चार दिन से चल रहा था। लोकल एडमिनिस्ट्रेशन की एप्रोच और बिहेवियर पूरी तरह से गलत था।
8 )एकतरफा कार्रवाई से दंगाइयों को मिला हौंसला
लोढ़ा न्यायिक आयोग ने माना कि जातिगत दंगों में कानून व्यवस्था की स्थापना के लिए हमेशा दोनों पक्षों के एंटी सोसियल एलिमेंट्स पर कार्रवाई जरुरी होती है। एकतरफा कार्रवाई हमेशा उल्टा असर करती है। इन कार्रवाई से दंगाइयों को हौंसला मिलता गया। क्योंकि इससे पहले जब दंगाइयों ने कुम्हेर की वाटर सप्लाई रोकी तब उनपर कोई कार्रवाई नहीं की गई थी।
9 )अधिकारियों में दिखा कम्युनिकेशन गेप
लोढ़ा न्यायिक आयोग ने माना कि कुम्हेर दंगों से पहले लोकल एडमिनिस्ट्रेशन और उच्च अधिकारियों में बड़ा कम्युनिकेशन गेप नजर आया। एक दूसरे को मामले की गंभीरता को लेकर ब्रीफ ही नहीं दिया जा रहा था। न हीं बड़े अधिकारी छोटे अधिकारियों को कोई गाइडेंस दे रहे थे। ये सब सिस्टम के कमजोर होने का कारण बन गया।
महापंचायत में इलाके के बड़े लीडर्स नहीं थे। इसे युवाओं और और छोटे-मोटे नेता ऑर्गेनाइज और मैनेज कर रहे थे। इसलिए ये कंट्रोल नहीं हो पा रहा था।
ऐसे में एडमिनिस्ट्रेशन को सबसे पहले क्षेत्र के प्रोमिनेन्ट और समाज के बड़े लीडर्स को कॉन्फिडेंस में लेकर महा पंचायत में भेजा जाना चाहिए था और उनसे इसे हेंडल कर सही तरीके से खत्म करवाया जाना चाहिए था। ये सब एडमिनिस्ट्रेशन नहीं कर पाया।
10 इंटेलिजेंस नहीं कर पाई ढंग से काम
लोढ़ा न्यायिक आयोग ने माना कि कुम्हेर दंगों में इंटेलिजेंस का काम भी ढंग से नहीं रहा। CID ने पहले तो इस पर समय रहते सूचनाएं कलेक्ट नहीं की और बाद में दो कॉन्स्टेबल को इसके लिए डेप्यूट किया। वो जब तक वहां पहुंचे तब तक तो महा पंचायत खत्म हो गई थी और दंगे भड़क चुके थे।
11 )दलित मौहल्ले में रेड और कार्रवाई की जानकारी नहीं दी
लोढ़ा न्यायिक आयोग ने माना कि कुम्हेर कांड से पहले तो कार्रवाई को डिले किया गया। इसके बाद 6 जून की सुबह अचानक से दलितों के मौहल्ले में रेड मारी गई। कथित तोर पर विस्फोटक जब्त किया गया और 46 जनों को गिरफ्तार किया गया। इस कार्रवाई की तत्काल बाद ही महापंचायत में एडमिनिस्ट्रेशन को जानकारी देते हुए उन्हें संतुष्ट किया जाना था। मगर ये नहीं हुआ।
तत्कालीन एसपी कपिल गर्ग ने बताया था कि उनके पास महापंचायत 2 बजे होने की जानकारी थी। वहीं इसमें नेता इसके बाद ही आने वाले थे। जब तक वो वहां कार्रवाई की जानकारी देने के लिए जाते उससे पहले ही भीड़ वहां से निकल गई थी। इसके अलावा हालात देखते हुए पुलिस ने जाब्ते में भी कमी रख दी थी।
सौजन्य :मनी भास्कर
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