दूसरे चरण में निर्णायक साबित होगी दलित आबादी,पश्चिमी में नहीं चला मोदी योगी का जादू
मेरठ। दूसरे चरण का मतदान कल यानी 14 फरवरी को होगा। जिसमें करीब 2 करोड मतदाता अपने मत का उपयोग करेंगे। दूसरे चरण के मतदान में दलित आबादी निर्णायक साबित होगी। हालांकि मुस्लिमों की आबादी भी कम नहीं आंकी जा सकती। लेकिन सहारनपुर,बिजनौर,मुरादाबाद की बेल्ट में दलित मतदाता निर्णायक भूमिका में है। पिछले चुनाव में भी इन सीटों पर दलित मतदाता उलटफेर करता रहा है। खासकर सहारनपुर और मुरादाबाद वाली बेल्ट में। बता दें कि दूसरे चरण में पश्चिमी उप्र के बिजनौर,सहारनपुर, अमरोहा,मुरादाबाद, संभल,बरेली,रामपुर, शाहजहांपुर और बदायूं की 55 सीटों पर मतदान हो रहे हैं। इससे पहले पश्चिमी उप्र के 11 जिलों की 58 सीटों पर पहले चरण में मतदान हो चुके हैं।
पहले चरण के बाद दूसरे चरण को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि अभी तक मतदाताओं ने न अपने पत्ते खोले हैं और न चुप्पी तोड़ी है। इन 55 विधानसभा सीटों पर दलित और मुस्लिम आबादी की बहुलता को देखते हुए पहले चरण की तुलना में यह चरण दलों के लिए काफी महत्वपूर्ण है। इन 55 सीटों में 20 सीटों से अधिक पर दलित मतदाता निर्णायक भूमिका में है। जबकि 25 से अधिक सीटों पर मुसलमान मतदाता है। इस लिहाज से दलित और मुस्लिम मतदाताओं की संख्या इस दूसरे चरण के मतदान में काफी निर्णायक साबित होगी। इस बार यहां पर गठबंधन यानी सपा और रालोद की स्थिति मजबूत मानी जा रही है। ये 9 जिले किसान बाहुल्य भी हैं। इन जिलों में किसान भाजपा से नाराज दिखाई दे रहा है। जिसका परिणाम भाजपा को नुकसान के रूप में झेलना पड़ सकता है।
बात वर्ष 2017 में हुए चुनाव की करें तो उस दोरान इन 55 विधानसभा सीटों से 11 मुस्लिम प्रत्याशी विधायक बने थे। ये सभी सपा के प्रत्याशी थे और उसके टिकट पर चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। भाजपा लहर में भी 2017 में मुरादाबाद जैसे जिले की छह सीटों में चार सपा के खाते में गई थी। जबकि भाजपा दो पर जीती थी। भाजपा और मोदी लहर के बावजूद भी सपा का यह गढ नहीं ढह पाया था और इन 55 सीटों में से सपा के खाते में 27 सीटें गई थी। जबकि भाजपा को 13 और बसपा को 11 सीटों पर संतोष करना पड़ा था। उससे पहले 2012 के विधानसभा चुनाव में यहां पर सपा को बंपर सफलता मिली थी। सपा ने इन 55 में से 27 सीटों पर जीत हासिल की थी। जबकि भाजपा के खाते में मात्र 8 सीटेमं ही आई थी।
2017 में पश्चिमी उप्र में मोदी लहर चली थी। जिसका नतीजा हुआ था कि भाजपा की आंधी में सभी दल उड़ गए थे। भाजपा ने 2017 में कैराना पलायन और मुज्जफरनगर दंगे को मुद्दे के रूप में सामने लाकर साप्रदायिक ध्रुवीकरण कर दिया था। जिससे हिन्दू वोट भाजपा की ओर चले गए थे। लेकिन इस चुनाव में स्थिति बिल्कुल अलग है। इस बार न तो मोदी का जादू है न योगी सरकार के काम का कोई असर दिख रहा। चुनाव में फसल की खरीद न होने और गन्ना बकाया भुगतान में जैसा मुददा काफी छाया हुआ है। जिससे किसान भाजपा सरकर से नाराज है। थाना स्तर पर फैले भ्रष्टाचार से लोग परेशान हो चुके हैं। युवक को नौकरी नहीं मिल रही। जिससे बेरोजगारी अहम मुददा बन गया है। किसान आंदोलन का असर इस 55 सीटों पर देखा जा रहा है।
सौजन्य : Hindi buziness bytes
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