पूना जाने के बाद मान्यवर कांशीराम की जिंदगी में क्या बड़ा बदलाव आया?
त्याग और निष्ठा का उत्कृष्ट उदाहरण रहे मान्यवर कांशीराम के जीवन की यूं तो कई बातें हैं, जो हम सभी को प्रेरित करती हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी किस्से हैं, जो बहुजन मिशन के प्रति उनके विशुद्ध समर्पण को दर्शाते हैं. सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति को अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित कर वह इस पथ पर ऐसे आगे बढ़े कि इसे पाने के लिए उन्होंने अपना सबकुछ समर्पित कर दिया. यहां तक अपना परिवार, सगे-संबंधी सभी.
साहेब कांशीराम की माता बिशन कौर ने अपनी यादों के आधार पर बताया था कि पूना जाने के बाद उनके पुत्र कांशीराम में काफी बदलाव आए. वह कभी घर आते तो गुमसुम बैठे रहते. खेतों में जाकर किताबें पढ़ते रहते थे. वह बताती हैं कि आखिरी बार जब कांशीराम पूना गए तो काफी समय तक उनका कोई पत्र नहीं आया. वह इससे परेशान हो उठीं.
माता बिशन कौर ने उनके फुफुरे भाई को हाल पता करने को वहां भेजा. फुफुरे भाई ने जब कांशीराम से घर आने को कहा तो मान्यवर कांशीराम ने जवाब दिया- घर वालों को बता देना अब मैं घर कभी नहीं आऊंगा. मुझे अपने दबे-कुचले लोगों के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़नी है.
बहुजन मिशन के सच्चे सिपाही कांशीराम ने एक 24 पन्नों का पत्र भेजकर घरवालों को अपने इस फैसले से भी अवगत कराया. इस पत्र में उन्होंने साफ किया था कि वह कभी शादी नहीं करेंगे. कभी घर नहीं आएंगे. कभी कोई सम्पत्ति नहीं बनाएंगे. किसी भी सामाजिक समारोह जैसे विवाहोत्सव, मृत्युभोज आदि में सम्मिलित नहीं होएंगे और आगे से कोई नौकरी नहीं करेंगे. मान्यवर कांशीराम जीवन पर्यन्त अपने उक्त फैसले पर कायम रहे. वे अपने पिता की मृत्यु पर भी अपने घर नहीं गए थे.
सौजन्य : Dalit awaaz
नोट : यह समाचार मूलरूप से dalitawaaz.com में प्रकाशित हुआ है. मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशीलता व जागरूकता के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है !









