घोसी में जीत की चाबी BSP के पास, BJP या सपा किसकी राह में बनेगी रोड़ा?
घोसी विधानसभा सीट पर बीजेपी ने दारा सिंह चौहान तो समाजवादी पार्टी ने सुधाकर सिंह को अपना उम्मीदवार घोषित कर रखा है, लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती की ओर से अभी तक उम्मीदवार का ऐलान नहीं किया गाय है. ऐसे में अगर बीएसपी जातिय समीकरण का साधते हुए बड़ा दांव खेलती है स्थिति कुछ और हो सकती है.
उत्तर प्रदेश की घोसी विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी ने दारा सिंह चौहान को उतारा है तो सपा ने सुधाकर सिंह पर दांव खेला है. बसपा ने अभी तक घोसी सीट को लेकर अपने पत्ते नहीं खोले हैं. बसपा उपचुनाव में उतरती है तो भी और नहीं नहीं लड़ती तब भी दोनों परिस्थितियों में उसका प्रभाव पड़ेगा. इसकी वजह यह है कि बसपा आजमगढ़ में लड़कर सपा का खेल बिगाड़ देती है तो खातौली में न लड़कर आरएलडी के जीत का कारण बन जाती है. इसी तरह मऊ की घोसी सीट पर भी बसपा काफी अहम भूमिका में हैं, जिसे लेकर सभी की निगाहें लगी हुई है. ऐसे में अब देखना है कि मायावती क्या सियासी दांव चलती हैं?
घोसी विधानसभा सीट दारा सिंह चौहान के इस्तीफा से रिक्त हुई है, जो सपा छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिए हैं. बीजेपी ने दारा सिंह चौहान को उपचुनाव मैदान में उतारा है तो सपा से सुधाकर सिंह ताल ठोक रहे हैं. सुधाकर सिंह साल 2012 घोसी सीट से सपा के विधायक चुने गए थे और अब एक बार फिर से चुनावी मैदान में किस्मत आजमाने के लिए उतरे हैं. बीजेपी ने दारा सिंह चौहान को उतारकर अतिपिछड़ी जातियों के बहाने घोसी सीट पर जीत का परचम फहराना चाहती है तो सपा सुधाकर सिंह के जरिए ठाकुर-मुस्लिम-यादव कैंबिनेशन बनाकर अपना दबदबा बनाए रखने की कवायद में है.
बसपा पर लगी सभी की निगाहें
दारा सिंह चौहान और सुधाकर सिंह के बीच भले ही उपचुनाव सिमट रहा हो, लेकिन सभी की नजर बसपा पर लगी है. बसपा घोसी में क्या दांव खेलगी, उस पर बहुत कुछ निर्भर करेगा. इसकी वजह घोसी विधानसभा सीट के सियासी समीकरण हैं, जहां पर दलित और मुस्लिम कैंबिनेशन जीत का फॉर्मूला माना जाता है. बसपा पिछले तीन चुनाव से मुस्लिम समुदाय से घोसी सीट पर कैंडिडेट उतारती रही है. 2017 में बसपा नंबर दो पर रही थी और बहुत मामूली वोटों से चुनाव हार गई थी. 1993 और 2007 में बसपा यहां से जीत दर्ज कर चुकी है. घोसी सीट पर बसपा एवरेज वोट 50 हजार मिले हैं. ऐसे में बसपा की सियासी अहमियत को घोसी सीट पर समझा जा सकता है.
BSP के लड़ने और न लड़ने का फायदा
बसपा घोसी विधानसभा सीट पर जिस तरह से पिछले तीन चुनाव से मुस्लिम कैंडिडेट उतारती रही है, उस लिहाज से अगर उपचुनाव में मुस्लिम उम्मीदवार पर मायावती दांव खेलती हैं तो सपा के सुधाकर सिंह का खेल बिगाड़ना तय है. वहीं, अगर बसपा किसी ओबीसी या सवर्ण समुदाय से कैंडिडेट उतारती हैं तो फिर बीजेपी के दारा सिंह चौहान का खेल गड़बड़ा सकता है. इसके अलावा बसपा अगर उपचुनाव से खुद को बाहर रखती है तो फिर पार्टी के कोर वोटबैंक दलित समुदाय का किसके साथ जाएगा, उसका सियासी प्रभाव पड़ना तय है. घोसी सीट के उपचुनाव के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण और निर्णायक होगी.
घोसी सीट का सियासी समीकरण
घोसी विधानसभा सीट के सियासी समीकरण को देखें तो करीब 4 लाख 30 हजार मतदाता हैं. जातीय के लिहाज से देखें तो सबसे ज्यादा मुस्लिम एक लाख 10 हजार मुस्लिम मतदाता हैं. दलित मतदाता करीब 68 हजार, यादव 60 हजार, राजभर 50 हजार, नोनिया 40 हजार, ठाकुर 15 हजार, 15 हजार निषाद, 4 हजार ब्राह्मण, 28 हजार भूमिहार हैं. इसके अलावा 30 हजार अतिपिछड़ी जातीय के लोगों के भी वोट हैं तो बाकी अन्य जातियां हैं, जिनमें सिंधी से लेकर वैश्य, गैर-जाटव दलित हैं. बीजेपी की नजर अतिपिछड़ी जातियों के वोटों पर है तो सपा का दारोमदार यादव-मुस्लिम पर टिका हुआ है. ऐसे में बसपा क्या दांव खेलगी, उस पर घोसी उपचुनाव निर्भर करेगा.
मुस्लिम और दलित पर किसी ने नहीं लगाया दांव
घोसी विधानसभा में सबसे ज्यादा मुस्लिम हैं और उसके बाद दलित समुदाय के मतदाता हैं, जिनका ज्यादातर झुकाव बसपा और सपा की तरफ रहता है. इसके बाद तीसरी सबसे बड़ी संख्या भूमिहार मतदाताओं की है, जो किसी भी दल को जीतने और हारने में एक बड़ा अंतर रख सकते हैं. सपा और बीजेपी दोनों ही भूमिहार समुदाय को नजर अंदाज किया है. मुस्लिम और दलित पर भी किसी पार्टी ने दांव नहीं खेला है. इस तरह घोसी सीट के तीन प्रमुख जातियों से कोई उम्मीदवार मैदान में नहीं है, जिसके चलते देखना है कि इनकी पसंद कौन बनता है?
सौजन्य : Tv9 hindi
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