सरकार ने ट्रांसजेंडर की ज़्यादा सटीक परिभाषा वाला बिल पेश किया, ‘खुद की मानी हुई जेंडर पहचान’ वाला क्लॉज़ हटाया
नई दिल्ली: मौजूदा कानून से एक बड़े बदलाव के तौर पर, शुक्रवार को लोकसभा में पेश किए गए ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन बिल 2026’ में उस क्लॉज़ को हटाने का प्रस्ताव रखा गया है, जो ट्रांसजेंडर सर्टिफिकेट की मंज़ूरी के लिए ज़िला मजिस्ट्रेट के सामने खुद की पहचान और निर्धारण का आधार ‘खुद की मानी हुई जेंडर पहचान’ को मानने की इजाज़त देता था।
जस्टिस न्यूज
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार द्वारा पेश किए गए बिल के उद्देश्यों और कारणों के बयान में बताया गया है, “ट्रांसजेंडर व्यक्ति’ शब्द की मौजूदा अस्पष्ट परिभाषा न केवल उन असली पीड़ित व्यक्तियों की पहचान करना नामुमकिन बना देती है, जिन तक इस कानून के फायदे पहुँचाने का मकसद है।”
इसमें इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति में “अलग-अलग यौन रुझान और खुद की मानी हुई यौन पहचान वाले व्यक्ति शामिल नहीं होंगे, और न ही कभी शामिल रहे हैं।”
इसमें आगे कहा गया है, “इस कानून के तहत दिए जाने वाले संरक्षण और फायदे बहुत बड़े पैमाने पर हैं, और इसलिए, इस बात का ध्यान रखना ज़रूरी है कि ऐसी पहचान किसी भी हासिल की जा सकने वाली खासियत, निजी पसंद, या किसी व्यक्ति की खुद की मानी हुई पहचान के आधार पर न दी जाए।”
सरकार ने इन प्रस्तावित बदलावों को सही ठहराया है। बिल के उद्देश्यों के बयान में कहा गया है, “इस कानून का मकसद व्यक्तियों के एक खास वर्ग को सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से ट्रांसजेंडर लोगों के तौर पर पहचाने जाने वाले लोगों को सुरक्षा देना था, जिन्हें समाज में बहुत ज़्यादा और दमनकारी भेदभाव का सामना करना पड़ता है।” इसमें आगे कहा गया है, “इसका मकसद अलग-अलग जेंडर पहचान, खुद की मानी हुई यौन पहचान, या जेंडर में बदलाव वाले हर व्यक्ति को सुरक्षा देना नहीं था, और न ही अब है।”
यह बिल कुछ खास अपराधों के लिए अलग-अलग सज़ाएँ तय करने का प्रस्ताव भी रखता है, जो नुकसान की गंभीरता, चोट के ठीक न हो पाने की स्थिति, और पीड़ित बच्चों की खास कमज़ोरी को ध्यान में रखते हैं।
इस बिल में मुख्य चिकित्सा अधिकारी की अध्यक्षता में एक मेडिकल बोर्ड बनाने का प्रस्ताव रखा गया है। अगर यह बिल अपने मौजूदा रूप में पास हो जाता है, तो भविष्य में ज़िला मजिस्ट्रेट, केंद्र या राज्य सरकारों द्वारा गठित किए जाने वाले मेडिकल बोर्ड की सिफारिशों की जाँच करने के बाद ही ट्रांसजेंडर पहचान का सर्टिफिकेट जारी करेंगे।
अभी तक, कोई भी व्यक्ति मंत्रालय के पोर्टल पर ट्रांसजेंडर सर्टिफिकेट के लिए आवेदन करता है। इस आवेदन में ट्रांसजेंडर व्यक्ति अपनी खुद की मानी हुई पहचान के बारे में एक हलफनामा देता है, जिसके बाद ज़िला मजिस्ट्रेट दस्तावेज़ों की जाँच और सर्टिफिकेट की मंज़ूरी के लिए इस आवेदन पर आगे की कार्रवाई करते हैं। 2019 में कानून बनने और सितंबर में नियम आने के बाद 2020 में इसे लागू किया गया। ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए राष्ट्रीय पोर्टल पर उपलब्ध ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, अब तक लगभग 32,448 सर्टिफिकेट जारी किए गए हैं।
यह बिल एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित करता है, जिसकी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान ‘किन्नर’, ‘हिजड़ा’, ‘अरवानी’ और ‘जोगता’ या ‘नपुंसक’ के रूप में हो; या ऐसा व्यक्ति जिसमें इंटरसेक्स (दो लिंगों के बीच की स्थिति) विविधताएं हों; या ऐसा व्यक्ति जिसमें जन्म के समय, पुरुष या महिला के विकास की तुलना में एक या एक से अधिक यौन विशेषताओं में जन्मजात विविधता हो – जैसे: प्राथमिक यौन विशेषताएं, बाहरी जननांग, क्रोमोसोमल पैटर्न, गोनाडल विकास, आंतरिक हार्मोन उत्पादन या प्रतिक्रिया।
“इसके अलावा, कोई भी व्यक्ति या बच्चा जिसे ज़बरदस्ती, लालच, प्रलोभन, धोखे या अनुचित प्रभाव से – चाहे उसकी सहमति हो या न हो – ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने, धारण करने या बाहरी तौर पर दिखाने के लिए मजबूर किया गया हो; और जिसके लिए उसके शरीर को विकृत किया गया हो, उसे नपुंसक बनाया गया हो, उसके अंग काटे गए हों, या उस पर कोई सर्जिकल, रासायनिक या हार्मोनल प्रक्रिया की गई हो, या किसी अन्य तरीके से ऐसा किया गया हो – तो ऐसे व्यक्ति या बच्चे को भी इस परिभाषा में शामिल किया जाएगा।”
बिल में कहा गया है कि मौजूदा कानून भी ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ भेदभाव और दुर्व्यवहार को प्रतिबंधित करता है, लेकिन इसके दंडात्मक प्रावधान केवल सामान्य गलतियों और आपराधिक अपराधों से निपटते हैं, और अधिकतम दो साल की कैद का प्रावधान करते हैं। प्रस्तावित संशोधन अधिक कठोर दंड और सज़ाओं के लिए गुंजाइश बनाते हैं।
उदाहरण के लिए, छह महीने से लेकर दो साल तक की कैद की सज़ा उन अपराधों के लिए तय की गई है, जिनमें किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति को ज़बरदस्ती या बंधुआ मज़दूरी में शामिल होने के लिए मजबूर करना; किसी सार्वजनिक स्थान पर जाने के अधिकार से वंचित करना; या किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति को घर या गांव छोड़ने के लिए मजबूर करना शामिल है। किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति के साथ शारीरिक, यौन, मौखिक, भावनात्मक और आर्थिक दुर्व्यवहार के मामलों में भी इसी तरह की सज़ा का प्रावधान है।
यदि किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति का अपहरण किया जाता है और उसे शारीरिक विकृति, नपुंसक बनाने की प्रक्रिया, या किसी सर्जिकल, रासायनिक या हार्मोनल प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है; या उसे स्थायी या गंभीर चोट पहुंचाई जाती है – और यह सब उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने या बाहरी तौर पर दिखाने के लिए मजबूर करने के इरादे से किया जाता है – तो इस अपराध के लिए 10 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा हो सकती है। इसके अतिरिक्त, कम से कम 2 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया जाएगा। यदि यही अपराध किसी बच्चे के साथ किया जाता है, तो इसके लिए आजीवन कारावास और 5 लाख रुपये के जुर्माने की सज़ा होगी।
यदि कोई व्यक्ति ज़बरदस्ती या धमकी देकर किसी अन्य व्यक्ति को—चाहे वह व्यक्ति ट्रांसजेंडर हो या न हो—उसकी मर्ज़ी के खिलाफ़, ट्रांसजेंडर व्यक्ति की तरह कपड़े पहनने, खुद को वैसे ही पेश करने या वैसा ही व्यवहार करने के लिए मजबूर करता है, और उसे भीख मांगने या ज़बरदस्ती मज़दूरी करने में लगाता है, तो इसके लिए 5 से 10 साल तक की सज़ा होगी। यदि पीड़ित कोई बच्चा हो, तो यह सज़ा 10 से 14 साल तक हो सकती है।









