‘ट्रांस अधिकार अब मृतप्राय हो गए हैं’: सुप्रीम कोर्ट ने नौकरी और शिक्षा नीति बनाने के लिए पैनल नियुक्त किया
नई दिल्ली: 11 साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर लोगों को ‘तीसरे लिंग’ के रूप में मान्यता दी थी और समानता व सम्मान के उनके मौलिक अधिकार को बरकरार रखा था।
जस्टिस न्यूज
हालांकि, यह देखते हुए कि भेदभाव अभी भी जारी है, अदालत ने शुक्रवार को दिल्ली उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की, जो रोज़गार और शिक्षा के क्षेत्र में समुदाय के लिए एक व्यापक समान अवसर नीति तैयार करेगी। इसने एक ट्रांसजेंडर सुरक्षा प्रकोष्ठ और एक समर्पित राष्ट्रव्यापी टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर स्थापित करने का भी निर्देश दिया।
न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने समुदाय के अधिकारों की रक्षा के लिए केंद्र और राज्यों के “सुस्त” रवैये पर अपनी पीड़ा व्यक्त की। इसने कहा कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 – जिसका उद्देश्य ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के सामाजिक बहिष्कार, भेदभाव, बेरोजगारी और शैक्षिक व चिकित्सा सुविधाओं की कमी को रोकना था – कानून की किताबों तक ही सीमित रहा और इसे कभी भी सही मायने में लागू नहीं किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इस कानून को “क्रूरतापूर्वक निष्क्रिय कर दिया गया”, जिसके लिए केंद्र और राज्य दोनों दोषी हैं।
“हमें यह देखकर दुख हो रहा है कि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों, सार्वजनिक और निजी, दोनों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के विरुद्ध भेदभाव की रोकथाम सुनिश्चित करने के उपायों के कार्यान्वयन का या तो सतही और छिटपुट, या पूर्ण अभाव रहा है… ट्रांसजेंडर और लिंग-विविध व्यक्तियों के विरुद्ध भेदभाव के विरुद्ध अधिकार को इस न्यायालय द्वारा नालसा (सुप्रा) के फैसले के बाद से ही मान्यता दी गई है, जिसमें यह माना गया था कि संविधान के अनुच्छेद 15 के तहत ‘लिंग’ के आधार में लिंग पहचान का समान आधार भी शामिल है,” सर्वोच्च न्यायालय ने कहा।
न्यायालय ने कहा कि सभी संबंधित हितधारकों ने न केवल “कार्रवाई में गंभीर और चिरस्थायी कमी” दिखाई है, बल्कि एक वैधानिक ढांचे के अस्तित्व के बावजूद समुदाय के प्रति भेदभाव को भी बढ़ावा दिया है। इसने कहा कि सरकारी अधिकारियों को जन भागीदारी में निहित संवैधानिक मूल्य का उचित सम्मान और विचार करना चाहिए।
इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत सरकार और राज्यों को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों को वास्तविकता में बदलने के लिए तंत्र बनाने हेतु बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। संबंधित सरकारों की ओर से दिखाई गई सुस्ती के कारण गैर-राज्यीय प्रतिष्ठानों ने भी 2019 अधिनियम और ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) नियम, 2020 के अनुपालन को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। अधिकारों का यह हनन गंभीर चिंता का विषय है,” इसमें कहा गया है।









