विशेष कंपोनेंट कॉलेजों में 50% आरक्षण सीमा पर विचार करेगा सुप्रीम कोर्ट, यूपी सरकार से जवाब तलब
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है, जिसमें कहा गया था कि निर्दिष्ट ‘विशेष घटक योजना महाविद्यालयों’ में भी कोटा लाभ 50 प्रतिशत की सीमा से अधिक नहीं हो सकता|
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है, जिसमें कहा गया था कि निर्दिष्ट ‘विशेष घटक योजना महाविद्यालयों’ (special component plan colleges) में भी कोटा लाभ 50 प्रतिशत की सीमा से अधिक नहीं हो सकता|
द टेलीग्राफ की खबर के मुताबिक, विशेष घटक योजना महाविद्यालय सरकार द्वारा अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदायों के लिए निर्धारित धनराशि और योजनाओं से स्थापित किए जाते हैं|
इस संबंध में मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने युवराज सिंह द्वारा दायर अपील पर यूपी सरकार को नोटिस जारी किया, जिसमें उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती दी गई थी जिसमें कहा गया था कि शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण इंदिरा साहनी मामले में शीर्ष अदालत द्वारा लगाई गई 50 प्रतिशत की सीमा से बंधा है|
मालूम हो कि उत्तर प्रदेश में कम से कम चार कॉलेज ऐसे हैं, जो दलित छात्रों को शिक्षा प्रदान करते हैं. इन कॉलेजों में कथित तौर पर आरक्षण का लाभ 90 प्रतिशत से कहीं अधिक हो गया है.
इस मामले पर मुख्य न्यायाधीश गवई ने आश्चर्य जताया कि कुल आरक्षण 90 प्रतिशत से अधिक कैसे हो सकता है|
इस पर अपीलकर्ता की ओर से पेश हुए वकील मोहन गोपाल ने तर्क देने की कोशिश की कि राज्य के ‘विशेष घटक योजना कॉलेजों’ पर 50 प्रतिशत की सीमा लागू नहीं होनी चाहिए|
हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने मोहन गोपाल के उच्च न्यायालय के 4 सितंबर के फैसले पर रोक लगाने के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया, लेकिन इस बड़े मुद्दे को लेकर विचार करने पर सहमत हुए कि क्या आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन कर सकता है|
मालूम हो कि नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 1992 के इंदिरा साहनी मामले में अपने फैसले में कोटा लाभ की सीमा 50 प्रतिशत तय की थी. पीठ ने स्पष्ट किया था कि इस सीमा का उल्लंघन तभी किया जा सकता है जब राज्य ऐसी कार्रवाई के लिए कोई ‘असाधारण’ परिस्थिति प्रदर्शित करे|
हालांकि, तमिलनाडु, तेलंगाना और महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने इस सीमा का उल्लंघन किया है, और हाल ही में केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख भी इस सूची में शामिल हो गया है. इस लेकर सुप्रीम कोर्ट की कई अन्य पीठों ने राज्यों को कोटा सीमा का उल्लंघन न करने की चेतावनी दी थी|
उल्लेखनीय है कि 5 मई 2021 को 16 प्रतिशत मराठा आरक्षण विवाद पर विचार करते हुए पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा था, ‘जब इंदिरा साहनी मामले में संविधान पीठ ने यह माना था कि अनुच्छेद 16(4) के तहत आरक्षण की ऊपरी सीमा 50 प्रतिशत है, तो यह अनुच्छेद 141 के तहत बाध्यकारी कानून है और इसे लागू किया जाना चाहिए.’
पांच न्यायाधीशों की पीठ ने महाराष्ट्र राज्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) के लिए आरक्षण अधिनियम, 2018 को ‘असंवैधानिक’ करार देते हुए रद्द कर दिया था|
इस विवादित कानून में मराठों के लिए 16 प्रतिशत और मुसलमानों के लिए 5 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान था, जिससे उनका कुल कोटा 70 प्रतिशत से अधिक हो गया|
संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित कानून सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी है और अनुच्छेद 14 के तहत, ‘सभी सिविल और न्यायिक प्राधिकारी सर्वोच्च न्यायालय की सहायता में कार्य करेंगे’.
पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ का फैसला इंदिरा साहनी फैसले और केशवानंद भारती मामले में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की शक्तियों से संबंधित 13 न्यायाधीशों की पीठ के फैसले की व्याख्या पर आधारित था.
सौजन्य :द वायर
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