महज़ 6 महीने में सीवर में 100 से ज़्यादा मौतें, लेकिन सरकार ख़ामोश
सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बेज़वाड़ा विल्सन का कहना है कि कि देश में हर 45 घंटे में सीवर में एक व्यक्ति की मौत होने के बावजूद, सरकारों ने आपराधिक चुप्पी ओढ़ रखी है। साफ़ है कि दलित ज़िंदगियां सरकार के लिए कोई मायने नहीं रखतीं।
Sewer deaths 2026
नई दिल्ली। एक ही दिन में मध्य प्रदेश में दो अलग-अलग घटनाओं में तीन लोगों की मौत के बाद इस साल के पहले 188 दिनों में देश भर में सीवर व सेप्टिक टैंकों में होने वाली मौतों का आंकड़ा 101 के पार हो गया है।
सफाई कर्मचारी आंदोलन (SKA) के आंकड़ों के अनुसार, इनमें से 12 मौतें तो केवल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में हुई हैं। इस साल ऐसी मौतों की संख्या में भयावह तरीके से वृद्धि हुई है क्योंकि पिछले साल 2025 में पूरे सालभर में 121 मौतें हुई थीं।
सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बेज़वाड़ा विल्सन की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि देश में हर 45 घंटे में सीवर में एक व्यक्ति की मौत होने के बावजूद, बेशर्म सरकारों ने आपराधिक चुप्पी ओढ़ रखी है। साफ है कि दलित जिंदगियां सरकार के लिए कोई मायने नहीं रखतीं और उनकी मौतें उसके लिए एक सामान्य घटना है। सीवर में मौतें किस तरह से सब तरफ हो रही हैं, इसका एक साक्ष्य एस बात से मिलता है कि इस साल सीवर व सेप्टिक टैंकों में मौतें देश के 16 राज्यों में हुई हैं।
पिछले दशक में सीवर व सेप्टिक टैंकों में मौतों में खतरनाक रूप से वृद्धि हुई है। साल 2016 में इनकी संख्या 39 थी जिसमें साल 2017 में 350 फीसदी वृद्धि हुई और वह 137 तक पहुंच गई।
सुप्रीम कोर्ट के तमाम फैसलों और साल 2013 के ‘मैला ढोने वालों को राजगार पर रखने का निषेध और उनका पुनर्वास कानून’ के बाद सरकारों से इस दिशा में कुछ सक्रियता की अपेक्षा थी। लेकिन सफाई कर्मचारी आंदोलन के आंकड़ों के अनुसार नया कानून बनने के बाद भी देश में 1726 मौतें सीवर व सेप्टिक टैंकों में हुई हैं। इनमें से 1203 मौतें तो केवल सात राज्यों- तमिलनाडु (332), गुजरात (216), दिल्ली-एनसीआर (157), महाराष्ट्र (155), उत्तर प्रदेश (148), हरियाणा (104) और बिहार (91) में हुई हैं।
इतनी बड़ी संख्या के बावजूद इनमें से किसी भी राज्य ने इन मौतों को रोकने की दिशा में एक भी कदम नहीं उठाया है। नमस्ते (नेशनल एक्शन फॉर मैकेनाइज़्ड सैनिटेशन इकोसिस्टम) योजना मोदी सरकार ने जुलाई 2023 में लागू की थी। इस योजना में टॉयलेट निर्माण के लिए 349.73 करोड़ रुपये का प्रावधान था। जबकि स्वच्छ भारत योजना के तहत सरकार पहले ही 12 करोड़ टॉयलेट बनाने में 19 हजार करोड़ रुपये खर्च कर चुकी थी। लेकिन न तो सफाई की व्यवस्था मैकेनाइज़्ड हुई और न ही शुष्क शौचालय पूरी तरह खत्म हो पाए हैं।
अफसोस व विडंबना की बात यह है कि इन तमाम सालों में मोदी सरकार के मंत्री संसद के भीतर लगातार यह झूठ बोलते आए हैं कि देश में मैनुअल स्कैवेंजिंग से कोई मौत नहीं हुई है। जाहिर है कि कानून वे समझ नहीं पाए। साथ ही, यह भी पता चलता है कि उनके लिए उन सफाई कर्मचारियों के जीवन का क्या मूल्य है, जिन्हें अब भी देश के कई इलाकों में अछूत समझा जाता है।
सफाई कर्मचारी आंदोलन की मांग है कि प्रधानमंत्री तुरंत सीवर व सेप्टिक टैंकों में हो रही मौतों को तत्काल प्रभाव से पूरी तरह रोकने के बारे में एक ऐलान देश के सामने करें।
सौजन्य :जस्टिस न्यूज़
माध्यम :समाचार पत्र








