‘अमानवीय, दिमाग में सिर्फ यही बात आ रही’, दलित छात्र के सुसाइड पर सुप्रीम कोर्ट ने प्रोफेसर को बुरी तरह फटकारा, कहा- संदेश जाना जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने दलित छात्र को उत्पीड़ित करने के आरोपी प्रोफेसर को राहत देने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि प्रोफेसर अपने छात्रों से किस तरह पेश आते हैं, उन्हें इसका अहसास होना चाहिए। इस मामले में कड़ा संदेश जाना चाहिए।
दलित छात्र की आत्महत्या मामले में आरोपी प्रोफेसर की अपील को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी।
नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केरल के कन्नूर डेंटल कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. एम. कोडंडा राम की अपील खारिज कर दी। डॉ. एम. कोडंडा राम पर दलित छात्र नितिन राज पर मौखिक रूप से प्रताड़ित करने का आरोप है जिसने इस साल अप्रैल में सुसाइड कर लिया है।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की एक बेंच ने कहा कि प्रोफेसर का बर्ताव अमानवीय है और यह बात जोर देकर कहा कि उन्हें नतीजों का सामना किए बिना नहीं छोड़ा जा सकता है। बेंच ने कहा कि, ‘अभी सिर्फ अमानवीय शब्द दिमाग में आ रहा है। वह अपने छात्रों को कैसे संबोधित करते हैं?’
अभी सिर्फ अमानवीय शब्द दिमाग में आ रहा है। प्रोफेसर अपने छात्रों को किस तरह बात करते हैं?
सुप्रीम कोर्ट
उत्पीड़न से परेशान होकर दलित छात्र ने किया सुसाइड
असल में, केरल में डेंटल कॉलेज के छात्र नितिन राज ने 10 अप्रैल को कॉलेज के पास एक इमारत से कूदकर आत्महत्या कर ली। आरोप है कि मरने से पहले नितिन राज को डेंटल कॉलेज के प्रोफेसर ने जाति के नाम पर उसे उत्पीड़ित किया।
डेंटल कॉलेज में डिपार्टमेंट के हेड डॉ. राम इस मामले में मुख्य आरोपी हैं। नितिन राज के पिता की शिकायत के आधार पर पुलिस ने डॉ. राम और दो अन्य स्टाफ सदस्यों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अपराधों का मामला दर्ज किया है।
सत्र अदालत ने जमानत देने से किया मना
डॉ. राम कोडंडा और एक अन्य आरोपी प्रोफेसर डॉ. संगीता नाम्बियार ने पहले अग्रिम जमानत के लिए सत्र अदालत में अपील दायर की थी। लेकिन सत्र अदालत ने 25 अप्रैल को डॉ. नाम्बियार को राहत दी, वहीं डॉ. राम को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया।
इसके बाद प्रोफेसर कोडंडा राम ने हाई कोर्ट का रुख किया, जिसने 19 जून को उन्हें राहत देने से इनकार कर दिया। इसके बाद प्रोफेसर राम कोडंडा ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
सुप्रीम कोर्ट में आरोपी प्रोफेसर की दलील
प्रोफेसर राम कोडंडा की तरफ से सीनियर एडवोकेट दामा शेषद्रि नायडू सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए। उन्होंने बेंच के सामने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल और मृतक छात्र के बीच हुई कथित घटना और आत्महत्या की तारीख के बीच एक महीने का अंतर था। नायडू ने दलील दी, ‘मान लीजिए कि किसी खास दिन उन्होंने छात्र को अपमानित किया। एक महीने बाद, आत्महत्या से एक घंटे पहले, एक दूसरे प्रोफेसर ने प्रिंसिपल से शिकायत की कि छात्र ने उस प्रोफेसर को गारंटर बनाकर एक ऐप से लोन लिया है। उसे प्रिंसिपल के कमरे में बुलाकर डांटा-फटकारा गया। प्रोफेसर वाली घटना एक महीने पहले हुई थी। लोन ऐप वाली परेशानी आत्महत्या से एक घंटे पहले हुई। उसने जाति के बारे में कुछ नहीं कहा। इसलिए SC/ST एक्ट लागू नहीं होता। इसका उन प्रोफेसरों पर बुरा असर पड़ेगा जो अनुशासन बनाए रखना चाहते हैं।’
प्रोफेसर को अपने रवैये का अहसास होना चाहिएः सुप्रीम कोर्ट
बेंच ने कहा कि प्रोफेसर को अपने कामों के नतीजों का एहसास होना चाहिए। कोर्ट ने पूछा, ‘अगर क्लासरूम में किसी स्टूडेंट की इस तरह बेइज्जती की जाती है, तो इसका क्या असर होगा?’ नायडू ने कहा, ‘यह एक महीने पहले हुआ था।’ बेंच ने जवाब दिया, ‘वही निर्णायक मोड़ था।’ नायडू ने कहा, ‘उन पर एक प्रोफेसर का नाम गारंटर के तौर पर इस्तेमाल करने का आरोप था। इस बात ने (उन्हें आत्महत्या करने के लिए) मजबूर किया होगा।’
छात्र से बुरा बर्ताव, नतीजे का संदेश जाना जरूरी
बेंच ने कहा, ‘वह टीचर इस तरह के व्यवहार के बाद बच नहीं सकता। एक संदेश जाना चाहिए।’ नायडू ने जवाब दिया, ‘प्रोफेसर ने सबक सीख लिया है।’ बेंच ने प्रोफेसर द्वारा छात्र के लिए इस्तेमाल किए गए शब्दों का जिक्र करते हुए कहा, ‘सबक सीखने की कोई बात नहीं है। हम आपसे वे बातें (जो उन्होंने कही थीं) जोर से पढ़ने के लिए नहीं कहेंगे।’ नायडू ने जवाब दिया, ‘अंग्रेजी में अनुवाद करने पर शायद सही मतलब न निकले।’ सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया और अपील खारिज कर दी।
सौजन्य :जस्टिस न्यूज़
माध्यम :समाचार पत्र








