साकेत थाने में दो महिला पत्रकारों से कथित मारपीट, दिल्ली पुलिस पर लगा मुस्लिम पहचान पर निशाना बनाने का आरोप
4PM से जुड़ीं महिला पत्रकारों शाहीन खान और नफीसा खान ने पुलिस पर लगाए गंभीर आरोप, दिल्ली पुलिस ने कहा—VVIP रूट बाधित करने पर थाने लाया गया, प्रेस संगठनों ने निष्पक्ष जांच की मांग की|
नई दिल्ली। दक्षिण दिल्ली के साकेत में दो महिला पत्रकारों के साथ कथित पुलिस मारपीट का मामला सामने आने के बाद दिल्ली पुलिस की कार्यशैली और पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठ खड़े हुए हैं। 4PM News Network से जुड़ी पत्रकार शाहीन खान और नफीसा खान ने आरोप लगाया है कि उन्हें एक कार्यक्रम की कवरेज के दौरान हिरासत में लेकर साकेत थाने ले जाया गया, जहां उनके साथ मारपीट की गई। दोनों ने यह भी आरोप लगाया कि उनकी मुस्लिम पहचान और सरनेम सामने आने के बाद कथित दुर्व्यवहार और बढ़ गया।
दिल्ली पुलिस ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है। दक्षिण दिल्ली के डीसीपी अनंत मित्तल के मुताबिक, दोनों महिलाओं को किसी सवाल पूछने के कारण नहीं, बल्कि VVIP मूवमेंट वाले रास्ते में कथित तौर पर स्कूटी खड़ी करने और रास्ता खाली करने के पुलिस निर्देशों का पालन नहीं करने के कारण थाने लाया गया था। पुलिस ने आरोपों को “तथ्यात्मक रूप से गलत और भ्रामक” बताया है।
अमित शाह और रेखा गुप्ता के कार्यक्रम की कवरेज के लिए पहुंची थीं
घटना 3 सितंबर को साकेत स्थित मैक्स स्मार्ट सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान हुई। कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता मौजूद थीं। दोनों पत्रकार इस कार्यक्रम को कवर करने पहुंची थीं। पत्रकारों के मुताबिक, वे मुख्यमंत्री से सवाल पूछने की कोशिश कर रही थीं। इसके बाद पुलिस ने उन्हें रोका और बाद में साकेत पुलिस स्टेशन ले जाया गया।
शाहीन खान ने घटना के बाद जारी वीडियो में आरोप लगाया कि पुलिसकर्मी उन्हें और उनकी सहयोगी को एक कमरे में ले गए और वहां उनके साथ मारपीट की। उन्होंने शरीर पर चोट के निशान दिखाते हुए दावा किया कि पुलिसकर्मियों ने उन्हें डंडों से पीटा और थप्पड़ मारे।
नफीसा खान के बारे में सामने आए वीडियो में उनके पैर में चोट दिखाई देती है और उन्हें चलने में परेशानी होती नजर आती है। हालांकि, इन चोटों का कारण पुलिस की मारपीट ही है या नहीं, इसकी स्वतंत्र पुष्टि अभी सामने नहीं आई है। मुस्लिम पहचान को लेकर गंभीर आरोप इस मामले को गंभीर बनाने वाला आरोप धार्मिक पहचान से जुड़ा है। शाहीन खान ने आरोप लगाया कि पुलिसकर्मियों ने उनसे उनके नाम और समुदाय के बारे में पूछा और जब उन्हें पता चला कि दोनों मुस्लिम हैं तो कथित तौर पर उनके साथ मारपीट बढ़ गई। 4PM News Network की ओर से जारी वीडियो और पोस्ट में भी इसी तरह के आरोप लगाए गए हैं। पत्रकारों के मुताबिक, उनके साथ पहचान और धर्म को लेकर आपत्तिजनक व्यवहार किया गया।
हालांकि, यह महत्वपूर्ण है कि धर्म के आधार पर मारपीट किए जाने के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। दिल्ली पुलिस ने इस दावे को भी खारिज किया है। पुलिस का पक्ष दिल्ली पुलिस के मुताबिक, दोनों महिलाओं ने कार्यक्रम स्थल के पास अपनी स्कूटी निर्धारित VVIP मूवमेंट रूट पर खड़ी की थी। पुलिस का कहना है कि उन्हें कई बार वाहन हटाने और रास्ता साफ करने के निर्देश दिए गए, लेकिन उन्होंने कथित तौर पर उनका पालन नहीं किया। पुलिस के अनुसार, VVIP सुरक्षा प्रोटोकॉल को देखते हुए दोनों को स्थानीय थाने में आगे की पूछताछ के लिए ले जाया गया। पुलिस ने स्पष्ट किया है कि मुख्यमंत्री से सवाल पूछने के कारण पत्रकारों को पीटे जाने का आरोप “गलत, भ्रामक और निराधार” है।
इस तरह फिलहाल घटना को लेकर दोनों पक्षों का दावा बिल्कुल अलग है। पत्रकार जहां हिरासत के दौरान मारपीट और धार्मिक पहचान के आधार पर कथित दुर्व्यवहार की बात कर रही हैं, वहीं पुलिस इसे VVIP सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी कार्रवाई बता रही है। पत्रकार संगठनों ने मांगी स्वतंत्र जांच मामले में कई प्रमुख पत्रकार संगठनों ने हस्तक्षेप किया है। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, इंडियन विमेन्स प्रेस कॉर्प्स, दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स, प्रेस एसोसिएशन और केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स ने संयुक्त बयान में घटना की निंदा करते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है। संगठनों ने दिल्ली पुलिस आयुक्त से मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराने तथा यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है। उन्होंने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया से भी मामले का स्वतः संज्ञान लेने का आग्रह किया है। सवाल सिर्फ दो पत्रकारों का नहीं यह घटना ऐसे समय में सामने आई है जब पत्रकारों और पुलिस के बीच टकराव को लेकर पहले से बहस चलती रही है। सुरक्षा व्यवस्था और VVIP प्रोटोकॉल निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हैं, लेकिन किसी पत्रकार को हिरासत में लेने की स्थिति में उसके साथ कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप व्यवहार किया जाना भी उतना ही जरूरी है।
अगर पत्रकारों के आरोप जांच में सही पाए जाते हैं और यह साबित होता है कि उन्हें उनकी धार्मिक पहचान के कारण निशाना बनाया गया, तो मामला सिर्फ पुलिस कार्रवाई का नहीं रहेगा। यह समानता, धार्मिक भेदभाव, पुलिस जवाबदेही और प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन जाएगा। दूसरी ओर, यदि पुलिस का यह दावा सही साबित होता है कि कार्रवाई केवल VVIP सुरक्षा और रास्ता बाधित करने के कारण हुई थी, तब भी यह सवाल रहेगा कि हिरासत के दौरान पत्रकारों को चोट कैसे लगी और घटनाक्रम की पूरी तस्वीर क्या थी। इसलिए इस मामले में सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर CCTV फुटेज, मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों और अन्य प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, मेडिकल रिकॉर्ड तथा पुलिस की कार्रवाई से संबंधित आधिकारिक दस्तावेज सामने आना जरूरी है। फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक 3 सितंबर की शाम तक दोनों पत्रकारों के खिलाफ कोई औपचारिक मामला दर्ज होने की सूचना नहीं थी और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी दोनों महिलाओं के संपर्क में थे। पत्रकार किसी सत्ता प्रतिष्ठान के कार्यक्रम में सवाल पूछने पहुंचते हैं तो उनका काम असहज सवाल पूछना भी है। वहीं पुलिस का काम सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना है। इन दोनों भूमिकाओं के बीच टकराव की स्थिति में लोकतंत्र की कसौटी यही है कि सुरक्षा के नाम पर पत्रकारिता के अधिकार और पुलिस की जवाबदेही—दोनों सुरक्षित रहें। साकेत की घटना में सच क्या है, इसका अंतिम जवाब निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है। लेकिन दो महिला पत्रकारों के लगाए आरोप और पुलिस के इनकार ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या सत्ता से सवाल पूछने वाले पत्रकार को सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा मानकर नियंत्रित किया जाएगा, या लोकतंत्र में उसके सवाल पूछने के अधिकार की भी उतनी ही रक्षा होगी?
सौजन्य :जस्टिस न्यूज़
माध्यम :समाचार पत्र









