इन दलित बच्चों ने पीपल के चबूतरे पर एक्टिंग सीखी, अब फ़िल्मों में कर रहे हैं काम
ये कहानी है पीपल के एक पेड़ की. एक चबूतरे की. एक टीचर की.समाज के उस दलित वर्ग की जो आज भी कई मायनों में संघर्ष कर रहा है. और सबसे ज़रूरी उन उम्मीदों के पूरा होने की जिन्हें सपने में देखने की हिम्मत भी इन बच्चों के पास नहीं थी|
पीपल के इस पेड़ की छांव में बना ये चबूतरा, सिर्फ़ ईंट-सीमेंट से बनी कोई जगह नहीं है. ये मंच है. पाठशाला है और ख़ुद पर यक़ीन करने की हिम्मत की ज़मीन है| इस जगह ने ना जाने कितने ही बच्चों को ये यक़ीन दिलाया कि सिनेमा में काम करने वाले किसी दूसरी दुनिया या किसी ख़ास जगह से नहीं आते, वो भी एक्टर बन सकते हैं|
सिनेमा की जादुई दुनिया के दरवाज़े तक पहुंचाने वाली इस सीढ़ी का नाम है – चबूतरा थिएटर|
सौजन्य :बीबीसी
नोट: यह समाचार मूल रूप से https://www.bbc.com/hindi/articl पर प्रकाशित किया गया है और इसका उपयोग विशुद्ध रूप से गैर-लाभकारी/गैर-वाणिज्यिक उद्देश्यों, विशेष रूप से मानवाधिकारों के लिए किया जाता है।









