एक ठाकुर का दलित के प्रति प्रायश्चित
चलते-चलते मैंने इनका चरण स्पर्श किया। मेरा चरण स्पर्श दरअसल एक प्रायश्चित भी है, सदियों से दलित समाज पर किए गए तरह तरह के अत्याचार, शोषण और प्रताड़ना के लिए।
राम सिहासन प्रेम जी को बुके देकर सम्मानित करते यशवंत सिंह (लेखकः यशवंत) राम सिहासन प्रेम भइया रिटायर हो गए। वे मेरे गाँव के उन कुछ विशिष्ट लोगों में शामिल हैं, जो पढ़ लिखकर प्रशासनिक अफसर बने। आईएएस अफसर के पद से सेवानिवृत्ति ली। रेवन्यू बोर्ड में लंबे समय से थे। उसके पहले मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) पद पर थे। योगी राज में जाने क्या इनके ख़िलाफ़ प्रपंच हुआ कि डीएम की कुर्सी नहीं मिली। ठाकुरों के राज में एक दलित प्रशासनिक अफसर को वो सम्मान नहीं मिला जो मिलना चाहिए था !
स्वभाव से बेहद सरल और सहज राम सिंहासन भइया के पिताजी रामराज जी सूबेदार थे। उनके छत्रछाया में राम सिंहासन भइया का निर्माण हुआ। लखनऊ में अपने आवास के प्रवेश द्वार पर पिताजी का नाम लिखा रखा है। जिस रूम में हम लोग बैठे थे वहाँ माता पिता की तस्वीर के साथ साथ ढेर सारी किताबें थीं। महात्मा बुद्ध और बाबा साहेब अंबेडकर के चित्र और इनका प्रचुर साहित्य दिखा।
मैंने भइया को बुके देकर नौकरी से आज़ादी और आगे के जीवन के लिए शुभकामनाएं दी! चलते-चलते मैंने इनका चरण स्पर्श किया। जब तक ये जॉब में थे, मिलने पर केवल हाथ जोड़कर प्रणाम करता था। अब जब वो जॉब से मुक्त हो चुके हैं, मेरे लिए ज़्यादा सम्माननीय हो चुके हैं। मेरा चरण स्पर्श दरअसल एक प्रायश्चित भी है, सदियों से दलित समाज पर किए गए तरह तरह के अत्याचार, शोषण और प्रताड़ना के लिए।
राम सिंहासन भइया की दो बेटियां हैं। दोनों पढ़ लिख कर काबिल बनने की राह में हैं। आगे के जीवन के लिए राम सिंहासन भइया के पास कई योजनाएं हैं। दलित-वंचित तबके के सामाजिक-बौद्धिक उत्थान के लिए भी कुछ ठोस करने का इरादा है। उनके हर प्रयास में मैं साथ हूँ! बहुत बहुत शुभकामनाएँ भइया।
सौजन्य : दलित दस्तक
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