दलितों से भेदभाव पर पहली बार माफी मांगेगा भारत का पड़ोसी नेपाल, PM बालेन शाह ने किया बड़ा ऐलान
नेपाल की करीब 3 करोड़ आबादी में दलित समुदाय की आबादी करीब 13 प्रतिशत है। भारत समेत दक्षिण एशिया के सभी देशों में वर्षों से दलितों के साथ अत्याचार किया गया है, उनके साथ भेदभाव किया गया है और उन्हें ‘अछूत’ मांगा गया है। उन्हें सदियों से सामाजिक और धार्मिक जीवन से अलग रखा गया।
दलितों से वर्षों तक हुए अत्याचार के लिए माफी मांगेगी नेपाल सरकार
काठमांडू: नेपाल वर्षों तक दलितों से किए गये भेदभाव को लेकर माफी मांगने की तैयारी कर रहा है। नेपाल की नई सरकार का कहना है कि वह आखिरकार इस अन्याय को स्वीकार करने के लिए तैयार है। प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के प्रशासन ने रविवार को घोषणा की है कि नेपाल, पहली बार दलित समुदाय से औपचारिक रूप से माफी मांगेगा। इसके अलावा नेपाल की नई सरकार की 100-दिन की शासन-सुधार कार्ययोजना के तहत दो हफ्तों के भीतर एक सुधार कार्यक्रम शुरू करने का भी वादा किया है। इसका मकसद समावेशी पुनर्वास, ऐतिहासिक मेल-मिलाप और सामाजिक न्याय के लिए आधार तैयार करना है।
नेपाल की दलित सोसाइटी डेवलपमेंट फोरम के अध्यक्ष नेपाली ने कहा है कि ‘राज्य की तरफ से मांगी गई औपचारिक माफी हमारे जख्मों पर मरहम का काम करेगी।’ नेपाली 40 साल की उम्र की एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और सुदूर-पश्चिमी ज़िले बैतड़ी में ‘दलित समाज विकास मंच’ की अध्यक्ष हैं। उन्होंने आगे कहा कि ‘लेकिन इन जख्मों को पूरी तरह भरने के लिए नेपाल सरकार को हमारे सभी गारंटीशुदा अधिकारों को प्रभावी ढंग से सुनिश्चित करना होगा। इससे हमें न्याय मिलेगा और हमारी गरिमा भी बनी रहेगी।’
दलित समुदाय से माफी मांगेगी नेपाल सरकार
आपको बता दें कि नेपाल की करीब 3 करोड़ आबादी में दलित समुदाय की आबादी करीब 13 प्रतिशत है। भारत समेत दक्षिण एशिया के सभी देशों में वर्षों से दलितों के साथ अत्याचार किया गया है, उनके साथ भेदभाव किया गया है और उन्हें ‘अछूत’ मांगा गया है। उन्हें सदियों से सामाजिक और धार्मिक जीवन से अलग रखा गया है और नेपाल सरकार का माफी मांगने का फैसला स्वागत योग्य है। नेपाल ने 2006 में खुद को ‘अछूत-मुक्त राष्ट्र’ घोषित कर लिया था। 2011 में जाति-आधारित भेदभाव को अपराध घोषित कर दिया गया और 2015 में लागू देश के मौजूदा गणतांत्रिक संविधान में दलितों के अधिकारों को शामिल किया गया था।
हालांकि मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि ‘भेदभाव अभी भी जारी है’। इसके लिए प्रमुख संस्थानों में दलितों के प्रतिनिधित्व की कमी और समुदाय की सीमित राजनीतिक शक्ति को जिम्मेदार ठहराया जाता है जिसके कारण मौजूदा कानूनों को ठीक से लागू नहीं किया जा पा रहा है। नेपाल में हर आठ में से लगभग एक व्यक्ति दलित होने के बावजूद देश की संसद में उनके पास सिर्फ 6 प्रतिशत सीटें ही हैं और उनमें से लगभग 42 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे र
हते हैं जो राष्ट्रीय औसत का लगभग दोगुना है।
‘जख्मों पर मरहम’
दलित लेखक और राजनीतिक विश्लेषक जे. बी. बिस्वकर्मा ने संघीय सरकार के फैसले का स्वागत किया है। लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि ‘सिर्फ माफी मांगना काफी नहीं होगा।’ वह चाहते हैं कि यह माफी सभी 753 स्थानीय सरकारी इकाइयों में मांगी जाए। बिस्वकर्मा ने कहा, इससे उनका मनोबल बढ़ेगा और माफी साफ तौर पर दिखाई देगी।’ उन्होंने आगे कहा कि ‘आर्थिक मुआवजे और न्याय दिलाने से जुड़े मुद्दे ही सरकार की माफी का सच्चा आईना होंगे।’ हालांकि बालेन शाह की तरफ से माफी नामे को लेकर ज्यादा जानकारी नहीं दी गई है लेकिन ये पहला सकारात्मक और स्वागत योग्य है।
सौजन्य :नवभारत टाइम्स
नोट: यह समाचार मूल रूप से https://navbharattimes.indiatimes.com/world/asian-countries/nepal-gover पर प्रकाशित किया गया है और इसका उपयोग विशुद्ध रूप से गैर-लाभकारी/गैर-वाणिज्यिक उद्देश्यों, विशेष रूप से मानवाधिकारों के लिए किया जाता है।









