कॉलेजियम नहीं, प्रधानमंत्री मोदी कर रहे सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति: पूर्व जज
मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व जज के. चंद्रू ने अपने एक वक्तव्य में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति कॉलेजियम के बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर रहे हैं. उन्होंने कॉलेजियम व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी पर सवाल उठाए. परिचर्चा में पूर्व मुख्य न्यायाधीश एस. मुरलीधर ने न्यायपालिका में महिला जजों की कमी पर भी चिंता जताई|
नई दिल्ली: मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व जज के. चंद्रू ने शनिवार को आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति अब कॉलेजियम के बजाय सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर रहे हैं| उन्होंने कहा कि 2014 में केंद्र की सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) बनाने की कोशिश की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को रद्द कर दिया. चंद्रू के मुताबिक, इसके बाद से सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के सभी जजों की नियुक्ति मोदी ने सीधे की है, कॉलेजियम ने नहीं|
चंद्रू ने कहा कि सरकार ने एनजेएसी को दोबारा लागू करने की कोई कोशिश नहीं की, क्योंकि उसे आयोग से ज्यादा फायदेमंद तरीके मिल गए थे|उन्होंने न्यायिक नियुक्तियों की कॉलेजियम व्यवस्था की आलोचना करते हुए कहा कि इस प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है और संविधान में भी इसका कोई उल्लेख नहीं है|
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म (एसीजे) की ओर से आयोजित ‘हू विल जज द जजेज’ (जजों का फैसला कौन करेगा?) विषय पर एक परिचर्चा में मुख्य वक्तव्य देते हुए चंद्रू ने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट में 38 जज हैं और हाईकोर्ट में करीब 1,000 जज हैं. कॉलेजियम व्यवस्था के तहत नियुक्ति की प्रक्रिया में किसी को कुछ पता नहीं चलता. यह ऐसी व्यवस्था है, जिसे संविधान की मान्यता नहीं है. यह देश का सबसे बेहतरीन तरीके से छिपाकर रखा गया रहस्य है.’
उन्होंने कहा कि भारत को छोड़कर दुनिया में कहीं भी जज खुद ही दूसरे जजों की नियुक्ति नहीं करते. उन्होंने यह भी कहा कि भारत जैसे किसी भी निर्वाचित लोकतंत्र में ऐसी व्यवस्था नहीं है|
हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों और महिला जजों की कमी पर भी सवाल
इससे पहले, ओडिशा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एस. मुरलीधर ने ‘प्राइमस इंटर पेरेस: ए क्रिटीक ऑफ द ऑफिस ऑफ द चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया’ विषय पर मुख्य वक्तव्य दिया| उन्होंने कहा कि देश में ऐसे कई मुख्य न्यायाधीश बनने वाले हैं, जिन्होंने कभी किसी हाईकोर्ट का नेतृत्व नहीं किया है|
सुप्रीम कोर्ट में महिला जजों की पर्याप्त संख्या न होने पर भी मुरलीधर ने सवाल उठाए. उन्होंने कहा, ‘पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ दो साल तक पद पर रहे. लेकिन उन्हें सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति के योग्य एक भी महिला जज नहीं मिलीं. विविधता की बात सिर्फ लोगों को दिखाने के लिए की जाती है.’
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने ‘अनिच्छा या अक्षमता? महाभियोग की कोशिशें नाकाम क्यों होती हैं’ विषय पर अपनी बात रखी.
वहीं, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व जज के. कन्नन ने ‘जजों को फैसला करने के लिए तैयार करना’ विषय पर संबोधित किया. मद्रास हाईकोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता आर. वैगई ने न्यायिक नियुक्तियों में विविधता की कमी और न्याय की गुणवत्ता से जुड़े सवालों पर मुख्य वक्तव्य दिया|
सौजन्य :जस्टिस न्यूज़
माध्यम :समाचार पत्र









