प्रदर्शन के दौरान बदसलूकी और ‘ग़ैर-क़ानूनी’ हिरासत के बीच दिल्ली पुलिस को निर्देश देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका
एक महिला पत्रकार समेत कई लोगों ने दिल्ली पुलिस पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं. इसके साथ ही रविवार को आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा को एक ऐसी कार में हिरासत में लिया गया, जो निजी वाहनों की तरह दिख रही थी और और कार में एक भी महिला पुलिसकर्मी नजर नहीं आ रही थी|
नई दिल्ली: दिल्ली पुलिस ने रविवार (4 अक्टूबर) को दिल्ली के जंतर-मंतर पर मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन करने और उनके इस्तीफे की मांग करने पहुंचे छात्रों, युवा कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और अन्य लोगों को बड़े पैमाने पर हिरासत में लिया|
नागरिक जंतर-मंतर से इंडिया गेट तक मार्च में शामिल होने के लिए जुटे थे. वहां उन्हें बड़ी संख्या में पुलिस और सुरक्षा बलों की मौजूदगी का सामना करना पड़ा. 2 और 3 अक्टूबर की तरह ही प्रदर्शनकारियों के रास्ते में बैरिकेड लगाए गए थे. 3 अक्टूबर को कई प्रदर्शनकारी इन बैरिकेड पर चढ़ने में कामयाब रहे थे|
5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर और दिल्ली के अन्य स्थानों पर प्रदर्शन पर लगी पाबंदियों से संबंधित एक याचिका को सुना.
बार एंड बेंच के मुताबिक, याचिकाकर्ता ने दिल्ली पुलिस को शांतिपूर्ण प्रदर्शनों की अनुमति देने का निर्देश देने की मांग की थी. याचिकाकर्ता का कहना था कि छात्रों, नागरिकों और राजनीतिक प्रतिनिधियों को प्रदर्शन करने की अनुमति नहीं दी जा रही है|
हालांकि, भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने कहा कि इसी तरह के मामले पहले से ही सोमवार के लिए सूचीबद्ध हैं. उनकी पीठ उन याचिकाओं पर सुन रही थी, जिनमें यह सवाल उठाया गया है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने दो अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना चुनाव आयोग के महत्वपूर्ण फैसले लिए थे, जिनमें विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़ा फैसला भी शामिल है| बता दें कि इस मामले पर सुनवाई हो गई है और सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानेश कुमार के निलंबन के लिए कोई भी अंतरिम आदेश पारित करने से इनकार कर दिया है.
बिना नंबर वाली कारों में हिरासत, महिला पुलिसकर्मी भी नहीं
ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा को एक ऐसी कार में हिरासत में लिया गया, जो निजी वाहनों की तरह दिख रही थी. कुछ समय तक प्रदर्शनकारी उस कार के पीछे चलते रहे, लेकिन एक जगह कार अचानक तेज रफ्तार से वहां से निकल गई|
गौरतलब बात यह थी कि कार में एक भी महिला पुलिसकर्मी नजर नहीं आ रही थी. कार के वहां से निकल जाने के बाद नेहा से फोन पर भी संपर्क नहीं किया जा सकता था, इसके कारण दिल्ली पुलिस से लगातार पूछा जाने लगा कि नेहा कहां हैं और उन्हें कहां ले जाया गया है|
ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक विमेन्स एसोसिएशन (एआईडीडबल्यूए) की नेता आशा शर्मा और मैमूना मोल्लाह, आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज, कार्यकर्ता नवशरण सिंह और अन्य वरिष्ठ नेता नेहा और दूसरी महिला कार्यकर्ताओं के बारे में जानकारी लेने के लिए संसद मार्ग थाने पहुंचे. आइसा के महासचिव प्रसेनजीत और दिल्ली सचिव अभिज्ञान ने दिल्ली पुलिस आयुक्त को पत्र लिखकर नेहा को हिरासत में लिए जाने पर आपत्ति जताई. संगठन ने इस कार्रवाई को ‘अपहरण’ क़रार दिया|
वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने एक्स पर लिखा, ‘क्या यह एक शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी का पुलिस द्वारा किया गया अपहरण है?’
रात करीब 8 बजे सीपीआई (एमएल)-लिबरेशन ने बताया कि नेहा को नरेला इंडस्ट्रियल एरिया थाने से रिहा कर दिया गया है. हालांकि, उस समय उनके पास उनका बैग और फोन नहीं था. बाद में नेहा को उनका बैग और फोन वापस मिल गया. जिस थाने से उन्हें रिहा किया गया, वह जंतर-मंतर से करीब 42 किलोमीटर दूर था|
तृणमूल कांग्रेस (ममता बनर्जी गुट) और इंडिया ब्लॉक के नेता डेरेक ओ’ब्रायन ने भी हिरासत की कार्रवाई के लिए दिल्ली पुलिस की निंदा की.
राजद सांसद मनोज कुमार झा ने पुलिस की कार्रवाई की आलोचना की. झा ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, ‘दिल्ली पुलिस चाहे किसी ‘शहंशाह’ के मातहत हो, लेकिन उसे एक बार ठहरकर यह ज़रूर सोचना चाहिए कि अपने ही जैसे परिवारों के सदस्यों के साथ इस तरह का बर्बर व्यवहार आख़िर क्यों किया जा रहा है.’
महिलाओं के साथ पुलिस का व्यवहार
ऐसे गंभीर आरोप सामने आए हैं कि दिल्ली पुलिस के कुछ अधिकारियों ने प्रदर्शन स्थल पर महिला प्रदर्शनकारियों के साथ बदसलूकी और मारपीट की.
सोमवार को दिल्ली पुलिस ने उस महिला पत्रकार को भी हिरासत में लिया, जिन्होंने 2 अक्टूबर को सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) विवेक भगत पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था. उनके साथ कई अन्य लोगों को भी हिरासत में लिया गया है. हालांकि, इस मामले में अभी तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई है.
2 अक्टूबर से 4 अक्टूबर के बीच हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस पर कई महिला प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों को घसीटने और उनके साथ बदसलूकी करने के आरोप लगे.
पुलिसकर्मियों पर पहचान वाले नेमटैग नहीं
दिल्ली पुलिस के जवानों की वर्दी पर पहचान बताने वाले नेमटैग अब भी नहीं थे. 2 अक्टूबर को पुलिस ने द वायर के पत्रकारों को यह बताने से इनकार कर दिया था कि वे नेमटैग क्यों नहीं पहन रहे हैं|
सौजन्य :जस्टिस न्यूज़
माध्यम :समाचार पत्र









