लोगों को मताधिकार से वंचित करने का मिशन’: पूर्व मंत्री आरके सिंह ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग की
सिंह ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग द्वारा संशोधित मतदाता सूचियों का उपयोग करना – जबकि हटाए गए नामों के खिलाफ अपीलें अभी भी लंबित थीं – अवैध था।
नई दिल्ली: पूर्व केंद्रीय गृह सचिव आरके सिंह ने एक तीखे खुले पत्र में चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) की कड़ी आलोचना की है और कहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज किए जाने चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारत के इतिहास में यह पहली बार है कि सरकार लोगों को मताधिकार से वंचित करने के मिशन पर है। सिंह ने लिखा, “अब तक सरकार और चुनाव आयोग का प्रयास हमेशा सभी पात्र मतदाताओं को पंजीकृत करना रहा है। यह लोकतंत्र को मजबूत करने और सभी नागरिकों को सशक्त बनाने का मिशन था। देश के इतिहास में यह पहली बार है कि मिशन लोगों को मताधिकार से वंचित करना है।”
सिंह ने कहा कि एसआईआर का संचालन लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए किया गया है। उन्होंने कुमार की भूमिका और चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए।
पूर्व मंत्री ने कहा कि अधिनियम की धारा 21 केवल विशेष मामलों में, लिखित रूप में दर्ज कारणों के साथ और किसी निर्वाचन क्षेत्र या निर्वाचन क्षेत्र के किसी भाग के लिए विशेष पुनरीक्षण की अनुमति देती है।
“पूरे देश के लिए गहन पुनरीक्षण का आदेश अवैध था। विशेष मामलों के लिए दी गई छूट नियम नहीं बन सकती। सामान्य एसआईआर को बरकरार रखने वाला सर्वोच्च न्यायालय का आदेश गलत था। एक और सवाल यह है कि पूरे देश के लिए एसआईआर का निर्णय किसने लिया? क्या यह पूरा आयोग था; या केवल ज्ञानेश कुमार?” सिंह ने X पर लिखा।
सिंह ने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग द्वारा संशोधित मतदाता सूचियों का उपयोग करना – जबकि हटाए गए नामों के खिलाफ अपीलें अभी भी लंबित थीं – अवैध था क्योंकि अधिनियम की धारा 21 कहती है कि सभी अपीलों के निपटारे तक मूल मतदाता सूची लागू रहेगी।
“संशोधित मतदाता सूची तभी पूर्ण होती है जब शामिल किए जाने या हटाए जाने के विरुद्ध दायर सभी अपीलों का निपटारा हो जाता है। जहां अपीलें लंबित थीं, वहां अधिसूचना की तिथि पर वैध मूल मतदाता सूची का उपयोग किया जाना था। इसके विपरीत, हटाए गए नामों वाली नई मतदाता सूची का उपयोग चुनाव के दौरान किया गया, जबकि हटाए जाने के विरुद्ध अपीलें अभी भी लंबित थीं। यह अवैध था,” सिंह ने कहा।
उन्होंने आगे आरोप लगाया कि अधिनियम की धारा 22 के तहत उल्लिखित प्रक्रिया का पालन किए बिना मतदाताओं को हटाया गया और कहा कि चुनाव आयोग का यह कदम “स्पष्ट रूप से अवैध” था।
“आरपी अधिनियम की धारा 22 में यह प्रावधान है कि मतदाता सूची से किसी का नाम केवल मतदाता पंजीकरण अधिकारी ही हटा सकता है, और वह भी धारा 22(क), (ख) और (ग) में सूचीबद्ध आधारों पर ही; और वह भी विशिष्ट जांच के बाद, संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का उचित अवसर देने के बाद, और उसके आदेश के विरुद्ध अपीलों का निपटारा होने के बाद ही। ज्ञानेश कुमार ने 2003 के बाद मतदाता पंजीकरण अधिकारियों द्वारा सूचीबद्ध सभी मतदाताओं के नाम बिना किसी आधार, बिना किसी जांच और पंजीकृत मतदाताओं को कारण बताओ नोटिस दिए बिना हटा दिए। यह स्पष्ट रूप से गैरकानूनी था,” सिंह ने आरोप लगाया।
सिंह ने लाल बाबू हुसैन और अन्य बनाम चुनावी पंजीकरण अधिकारी और अन्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट के 1995 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यह साबित करने के लिए सबूत पेश करने का भार कि एक पंजीकृत मतदाता को अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए, अधिकारियों पर है, न कि मतदाता पर।
सिंह ने फॉर्म 6 में परिशिष्ट जोड़ने पर भी सवाल उठाया और आरोप लगाया कि कुमार ने दो चुनाव आयुक्तों के विरोध के बावजूद इसे जोड़ा। उन्होंने कहा कि परिशिष्ट के तहत आवेदकों को 2003 की मतदाता सूची में अपने माता-पिता के नामों का क्रम संख्या देना आवश्यक है, जिससे नए मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने की कोशिश कर रहे युवा मतदाताओं को कठिनाई होती है।पूर्व गृह सचिव ने फॉर्म के माध्यम से दर्ज की गई सामूहिक आपत्तियों पर भी सवाल उठाए, यह पूछते हुए कि आपत्तियां किसने दर्ज कीं, उन्हें कैसे स्वीकार किया गया और उन पर कार्रवाई की गई, और फॉर्म पर हस्ताक्षर करने वाले लोग उपस्थित क्यों नहीं हुए।
पश्चिम बंगाल के बारे में सिंह ने दावा किया कि चुनावी पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) द्वारा योग्य पाए गए 16 लाख मतदाताओं को मतदाता सूची में शामिल नहीं किया गया क्योंकि चुनाव आयोग ने उनके शामिल होने के खिलाफ अपील दायर की थी, जबकि गोवा में, ईआरओ द्वारा योग्य पाए जाने के बावजूद 97 मतदाताओं को मतदाता सूची से बाहर रखा गया था।
सिंह ने आयोग द्वारा पेश किए गए ‘तार्किक विसंगति’ खंड का हवाला देते हुए चुनाव आयोग पर देश के सबसे हाशिए पर रहने वाले लोगों की जीवन स्थितियों से अनभिज्ञ होने का भी आरोप लगाया।
“एक बेतुकी बात उठाई गई जिसे ‘तार्किक विसंगति’ कहा गया। ज्ञानेश कुमार को इस बात का कोई अंदाजा नहीं है कि भारत में गरीब लोग कैसे रहते हैं। उनके बच्चे अस्पतालों में पैदा नहीं होते। उनके पास जन्म प्रमाण पत्र नहीं होते। उनके घरों में कैलेंडर नहीं होते। जब मतदान अधिकारी (बीएलओ) ने उन्हें मतदाता सूची में दर्ज करने के लिए संपर्क किया, तो उन्होंने अपनी अनुमानित जन्मतिथि बताई। इसी तरह, जब उनके पिताओं के नाम मतदाता सूची में दर्ज किए गए, तो उन्होंने भी अपनी अनुमानित जन्मतिथि बताई। ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में चुनाव आयोग के मूर्ख लोगों ने कहा कि पिता और बच्चों के बीच 15 साल से कम का अंतर तार्किक विसंगति है, जो उनके नामों को बाहर करने का औचित्य साबित करता है। अधिनियम की धारा 21 का उल्लंघन करते हुए, बिना किसी जांच के ‘तार्किक विसंगति’ वाले नामों को बाहर कर दिया गया,” सिंह ने कहा।
सौजन्य :जस्टिस न्यूज़
माध्यम :समाचार पत्र









