सहारनपुर मस्जिद: हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से मांगा जवाब, 6.41 करोड़ रुपये हर्जाने की वसूली पर रोक
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में मस्जिद गिराए जाने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है. अदालत ने मस्जिद प्रबंधन पर लगाए गए 6.41 करोड़ रुपये के हर्जाने की वसूली पर भी रोक लगा दी है. याचिकाकर्ता ने जमीन के स्वामित्व और मस्जिद के वक़्फ़ रजिस्टर में दर्ज होने का हवाला देते हुए ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को चुनौती दी है|
नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को गिराए जाने को चुनौती देने वाली याचिका पर शुक्रवार (11 सितंंबर) को उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है|
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक अदालत ने मस्जिद प्रबंधन पर लगाए गए 6.41 करोड़ रुपये के हर्जाने की वसूली पर भी रोक लगा दी है. अब इस मामले की अगली सुनवाई अक्टूबर में होगी|
इस संबंध में जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल ने अधिवक्ता मोहम्मद तनवीर अहमद की ओर से दाखिल रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार और मस्जिद के प्रबंधक/मौलवी अब्दुल हमीद को नोटिस जारी किया है. अदालत ने दोनों से तीन सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है|
उल्लेखनीय है कि यह मामला सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में 315 वर्ग मीटर क्षेत्र में बनी मस्जिद से जुड़ा है. शहर के मजिस्ट्रेट ने उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परिसर (बेदखली और अनधिकृत कब्जाधारी) अधिनियम, 1972 के तहत मस्जिद को खाली कराने और गिराने का आदेश दिया था. साथ ही मस्जिद प्रबंधन पर 6.41 करोड़ रुपये का हर्जाना लगाया गया था|
इस आदेश के खिलाफ दायर अपील को ज़िला अदालत ने 2 सितंबर को खारिज कर दिया था और इसके तीन दिन बाद, 5 सितंबर को मस्जिद गिरा दी गई|
इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आशीष कुमार सिंह ने अदालत में दलील दी कि प्रशासन ने जमीन के स्वामित्व का उचित निर्धारण किए बिना ही बेदखली और ध्वस्तीकरण का आदेश पारित कर दिया|
उन्होंने कहा कि राजस्व रिकॉर्ड में वहीद खान और याकूब खान के नाम दर्ज हैं और मस्जिद का नाम वक्फ रजिस्टर में भी दर्ज है|वहीं, उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता मनीष गोयल ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने संपत्ति के स्वामित्व को लेकर विरोधाभासी दावे किए हैं. एक तरफ वह इसे ‘जमींदारों’ की संपत्ति बता रहे हैं, जबकि दूसरी ओर इसे वक्फ को समर्पित बताया जा रहा है|
गोयल ने कहा कि कथित वक्फ सरेंडर कब किया गया, इसे साबित करने वाला कोई दस्तावेज पेश नहीं किया गया है. उन्होंने यह भी कहा कि सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को इस मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया है|
सरकार की ओर से यह भी दलील दी गई कि सरकारी रिकॉर्ड में संपत्ति कलेक्ट्रेट/कचहरी के रूप में दर्ज है और अधिकारियों ने निजी स्वामित्व से संबंधित प्रविष्टियों को फर्जी माना है|
गोयल के मुताबिक, अधिकारियों के समक्ष संपत्ति के निजी स्वामित्व को साबित करने वाला कोई दस्तावेज भी पेश नहीं किया गया था|
हालांकि, याचिकाकर्ता ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि पुराने राजस्व रिकॉर्ड में वहीद खान और याकूब खान के नाम दर्ज हैं. उन्होंने अदालत को बताया कि 1956 की एक प्रविष्टि में भी वहीद खान, कलेक्ट्रेट/कचहरी और याकूब खान के नाम दर्ज हैं|
याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि मस्जिद का वक्फ रजिस्टर में पंजीकरण मौजूद होने के बावजूद निचली अदालतों ने इस तथ्य पर विचार नहीं किया|
गौरतलब है कि इससे पहले द वायर ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में करीब 115 साल पुरानी बताई जा रही मस्जिद को ज़िला अदालत के फैसले के तीन दिन बाद 5 सितंबर को बुलडोज़र से गिरा दिया गया|
इसके बाद विपक्षी दलों के नेताओं को घटनास्थल पर जाने से रोका गया, जिसके बाद इस कार्रवाई को लेकर राजनीतिक विवाद देखने को मिला. विपक्ष ने इसे अवैध और अनावश्यक बताते हुए आरोप लगाया कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मुस्लिम समुदाय के धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया जा रहा है|
इस मामले में ज़िला अदालत ने 2 सितंबर को मस्जिद प्रबंधन की अपील खारिज करते हुए शहर के मजिस्ट्रेट की अदालत के 16 जुलाई के बेदखली आदेश को बरकरार रखा था. मजिस्ट्रेट की अदालत ने 315 वर्ग मीटर सरकारी जमीन पर कथित ‘अनधिकृत कब्जे’ के लिए मस्जिद प्रबंधन पर 6.41 करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया था|
अपने 26 पन्नों के फैसले में ज़िला जज सत्येंद्र कुमार ने कहा था कि मस्जिद प्रबंधन संपत्ति पर अपने स्वामित्व और वैध कब्जे के पक्ष में पर्याप्त साक्ष्य पेश करने में विफल रहा है|
उल्लेखनीय है कि मामला 2025 में बजरंग दल कार्यकर्ता विकास त्यागी की शिकायत के बाद सामने आया था. राज्य सरकार का दावा है कि यह जमीन सरकारी रिकॉर्ड में कलेक्ट्रेट/कचहरी के लिए दर्ज है और मूल रूप से मुकदमेबाजों के लिए विश्राम गृह के रूप में बनाई गई थी, जिसे बाद में धार्मिक स्थल में बदल दिया गया|
वहीं, मस्जिद के मुतवल्ली मोहम्मद तनवीर अहमद का दावा है कि मस्जिद 115 साल से अधिक पुरानी है और 1911 से पहले बनी थी. उन्होंने इसे पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के तहत संरक्षित बताया है|
सौजन्य :जस्टिस न्यूज़
माध्यम :समाचार पत्र









