विद्यार्थी आवास का संकट और राज्य की जवाबदेही
सत्य निकेतन की घटना इसलिए दिल्ली से एक व्यापक प्रश्न पूछती है—क्या हम अपने बच्चों को पढ़ने के लिए महानगरों में भेजते समय केवल विश्वविद्यालय की सीट, फीस और परीक्षा की चिंता करेंगे, या उनके रहने की सुरक्षित छत को भी शिक्षा की बुनियादी आवश्यकता मानेंगे
इलाहाबाद हाईकोर्ट में अधिवक्ता राकेश कुमार गुप्त की टिप्पणी Satya Niketan Building Collapse : सत्य निकेतन की घटना के बाद सबसे आसान रास्ता यही होगा कि जांच बैठाई जाए, भवन मालिक के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो, कुछ अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाए और मृतकों तथा घायलों के परिवारों के लिए मुआवजे की घोषणा कर दी जाए। ये सभी कदम आवश्यक हो सकते हैं, लेकिन इनसे मूल समस्या समाप्त नहीं होगी। यदि विद्यार्थियों के लिए सुरक्षित आवास की कमी बनी रहती है, यदि निजी PG का बाजार उसी तरह अनियंत्रित रहता है और यदि भवन सुरक्षा की निगरानी दुर्घटना के बाद ही शुरू होती है, तो एक इमारत गिरने के बाद दूसरी इमारत का इंतजार करना ही हमारी व्यवस्था की नियति बन जाएगा। इसलिए प्रश्न ‘दोषी कौन है’ से आगे बढ़कर यह होना चाहिए कि ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों हुई जिसमें विद्यार्थियों को जोखिम भरे आवास में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा।
यह प्रश्न सीधे विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी से जुड़ता है, लेकिन विश्वविद्यालयों पर पूरा बोझ डाल देना भी उचित नहीं होगा। दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे विशाल संस्थान की अपनी सीमाएँ हैं। उसके पास अनेक कॉलेज, विभाग और परिसरों में फैली हुई विशाल विद्यार्थी आबादी है। विश्वविद्यालय जितने हॉस्टल बना सकता है, उनकी एक भौतिक सीमा है। जमीन सीमित है, निर्माण महंगा है और हर विद्यार्थी को परिसर में आवास देना व्यावहारिक रूप से कठिन हो सकता है। लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं कि विश्वविद्यालय अपने विद्यार्थियों के आवासीय संकट से पूरी तरह अलग हो जाए। यदि हजारों विद्यार्थी विश्वविद्यालय के आसपास निजी PG में रहते हैं, तो विश्वविद्यालय को कम-से-कम सुरक्षित और सत्यापित आवास की सूचना उपलब्ध कराने, स्थानीय प्रशासन के साथ समन्वय करने और जरूरतमंद विद्यार्थियों के लिए आवास सहायता की व्यवस्था विकसित करने की जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का उदाहरण भी यही बताता है कि बड़ी हॉस्टल व्यवस्था अपने आप में पर्याप्त नहीं होती। JNU की आधिकारिक जानकारी में सीमित हॉस्टल आवास का उल्लेख है और यह भी स्पष्ट किया गया है कि प्रवेश मिल जाना अपने आप हॉस्टल की गारंटी नहीं है। विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट पर विभिन्न हॉस्टलों की सूची और क्षमता उपलब्ध है। इसका अर्थ यह है कि विद्यार्थी आवास की समस्या केवल दिल्ली विश्वविद्यालय की समस्या नहीं है; यह महानगरों में उच्च शिक्षा के विस्तार से पैदा हुई व्यापक संरचनात्मक समस्या है।
अंबेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली का उदाहरण भी इसी तस्वीर का दूसरा पहलू सामने लाता है। विश्वविद्यालय की आधिकारिक जानकारी के अनुसार उसके छात्रावास में छात्राओं के लिए 35 की intake capacity है। विश्वविद्यालय के पुराने आधिकारिक दस्तावेजों में जरूरतमंद विद्यार्थियों को हॉस्टल शुल्क और कुछ मामलों में किराये जैसी सहायता दिए जाने का भी उल्लेख मिलता है। यह प्रयास महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे यह भी स्पष्ट होता है कि उच्च शिक्षा संस्थानों को केवल हॉस्टल बनाने के बजाय आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए housing assistance के वैकल्पिक मॉडल पर भी विचार करना होगा।
यही वह जगह है जहाँ केंद्र और दिल्ली सरकार की भूमिका सामने आती है। विद्यार्थी आवास को केवल विश्वविद्यालय का विषय मानना उसी तरह अधूरा है जैसे स्कूल भवनों को केवल शिक्षा विभाग का विषय मानना और अग्नि सुरक्षा को केवल अग्निशमन विभाग का। वास्तव में विद्यार्थी आवास एक बहु-विभागीय विषय है। भूमि उपयोग और भवन नियमन DDA तथा स्थानीय निकायों से जुड़ते हैं, भवन की अनुमति और प्रवर्तन नगर निकायों से, अग्नि सुरक्षा अग्निशमन विभाग से, विश्वविद्यालयों के हॉस्टल शिक्षा संस्थानों से और व्यापक आवास नीति सरकार से जुड़ती है। यदि इन सबके बीच समन्वय नहीं है तो जिम्मेदारी बिखर जाती है और बिखरी हुई जिम्मेदारी अक्सर अंततः किसी की जिम्मेदारी नहीं रह जाती।
इसलिए दिल्ली को सबसे पहले यह जानना होगा कि उसके विद्यार्थी रहते कहाँ हैं। कितने विद्यार्थी विश्वविद्यालयों के हॉस्टल में रहते हैं, कितने निजी हॉस्टल में, कितने PG में और कितने सामान्य किराये के मकानों में—इसका कोई समेकित, नियमित रूप से अद्यतन सार्वजनिक डेटा होना चाहिए। विद्यार्थी आवास का एक डिजिटल मानचित्र बनाया जा सकता है जिसमें पंजीकृत PG और छात्रावासों की जानकारी, भवन की स्वीकृत मंजिलें, अधिकतम अनुमत occupancy, fire-safety स्थिति और structural inspection की तारीख उपलब्ध हो। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों पर अतिरिक्त बोझ डालना नहीं, बल्कि उन्हें जानकारी के आधार पर सुरक्षित विकल्प चुनने में सक्षम बनाना होगा। जिस विद्यार्थी को आज केवल किराया और दूरी दिखाई देती है, उसे कल यह भी दिखाई देना चाहिए कि वह भवन सुरक्षा के लिहाज से प्रमाणित है या नहीं। लेकिन केवल प्रमाणपत्र जारी कर देना भी पर्याप्त नहीं होगा। भवन सुरक्षा कागज पर नहीं, नियमित निरीक्षण से सुनिश्चित होती है। विद्यार्थी PG और निजी छात्रावासों में समय-समय पर structural audit, electrical inspection और fire-safety inspection अनिवार्य किया जाना चाहिए। विशेष रूप से उन भवनों की निगरानी अधिक कठोर होनी चाहिए जिनमें बड़ी संख्या में विद्यार्थी रहते हैं। यदि किसी भवन में अतिरिक्त मंजिल बनाई गई है, बेसमेंट का उपयोग बदल दिया गया है, सीढ़ियों या निकास मार्गों में परिवर्तन किया गया है अथवा क्षमता से अधिक लोग रखे जा रहे हैं, तो कार्रवाई दुर्घटना के बाद नहीं, उससे पहले होनी चाहिए। सत्य निकेतन की घटना में बेसमेंट में निर्माण कार्य की सूचना सामने आई है; जांच को यह भी देखना होगा कि निर्माण वैध था या नहीं और उसका भवन की संरचना पर कोई प्रभाव पड़ा या नहीं। इस संदर्भ में एक और गंभीर प्रश्न है—क्या केवल अवैध PG बंद कर देना समाधान है? यदि किसी इलाके में हजारों विद्यार्थी निजी PG में रह रहे हैं और प्रशासन अचानक बड़ी संख्या में मकान बंद कर देता है, तो विद्यार्थियों के पास क्या विकल्प होगा? वे अगले दिन दूसरे इलाके में नया कमरा खोजेंगे और यदि सुरक्षित आवास पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है तो वही समस्या कहीं और पैदा होगी। इसलिए नियमन का उद्देश्य केवल बंद करना नहीं होना चाहिए; उद्देश्य सुरक्षित विकल्प पैदा करना होना चाहिए। पहले सुरक्षित और किफायती आवास की क्षमता बढ़ाई जाए, फिर असुरक्षित आवास पर कार्रवाई की जाए। अन्यथा हम जोखिम को समाप्त नहीं करेंगे, केवल उसका पता बदल देंगे।
सौजन्य :जस्टिस न्यूज़
माध्यम :समाचार पत्र









