भारतीय संविधान : रक्तहीन सामाजिक क्रांति का औजार
भारतीय संविधान को केवल राजनीतिक लोकतंत्र का दस्तावेज कहना अधूरा होगा। वह सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की दिशा में भी एक कार्यक्रम प्रस्तुत करता है..
Constitution is a tool to change the society with a bloodless revolution.” यह कथन भारतीय संविधान की प्रकृति और उसके उद्देश्य को समझने की एक अत्यंत प्रभावशाली कुंजी है। इस विचार को भारतीय संवैधानिक न्यायशास्त्र में विशेष गहराई न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्ण अय्यर ने दी। Akhil Bharatiya Soshit Karamchari Sangh (Railway) v. Union of India, (1981) 1 SCC 246 : AIR 1981 SC 298 में उन्होंने भारतीय संविधान को केवल शासन-संचालन की कानूनी पुस्तिका मानने से इनकार करते हुए उसे सामाजिक परिवर्तन का गतिशील साधन माना। इसी निर्णय में उन्होंने कहा कि हमारा संविधान “a dynamic document with destination social revolution” है और वह “a National Charter pregnant with social revolution” है।
यह टिप्पणी उस मुकदमे के संदर्भ से अलग करके नहीं समझी जा सकती। मामला रेलवे सेवाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण तथा उससे संबंधित रेलवे बोर्ड के निर्देशों की संवैधानिक वैधता से जुड़ा था। तीन न्यायाधीशों की पीठ—न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्ण अय्यर, न्यायमूर्ति आर. एस. पाठक और न्यायमूर्ति ओ. चिनप्पा रेड्डी—ने 14 नवंबर 1980 को निर्णय दिया। न्यायालय ने आरक्षण संबंधी चुनौती को अस्वीकार किया।
लेकिन इस निर्णय का महत्व केवल आरक्षण के एक विवाद के निपटारे में नहीं है। इसका वास्तविक महत्व इस बात में है कि न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर ने संविधान की व्याख्या को भारतीय समाज के ऐतिहासिक अन्याय से जोड़ दिया। उनके लिए संविधान का अनुच्छेद 14 केवल कागज पर समानता का आश्वासन नहीं था; अनुच्छेद 16 केवल समान अवसर की औपचारिक घोषणा नहीं था; और अनुच्छेद 46 केवल नीति-निर्देशक तत्व नहीं था। इन प्रावधानों का वास्तविक उद्देश्य उस समाज को बदलना था जिसमें सदियों से जन्म के आधार पर मनुष्य की सामाजिक हैसियत निर्धारित होती रही थी।
यही भारतीय संविधान की क्रांतिकारी विशेषता है। भारत ने 1947 में राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की, लेकिन राजनीतिक स्वतंत्रता अपने आप सामाजिक स्वतंत्रता नहीं बन गई। औपनिवेशिक शासन समाप्त हुआ, परंतु जाति-व्यवस्था, अस्पृश्यता, सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक विषमता और अवसरों की असमानता बनी रही। संविधान निर्माताओं के सामने इसलिए दोहरी चुनौती थी—एक ओर आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्र का निर्माण और दूसरी ओर उस सामाजिक संरचना का परिवर्तन जिसने करोड़ों मनुष्यों को समान नागरिक बनने से रोका था। न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर ने इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझते हुए संविधान को social revolution का instrument माना। उन्होंने ग्रानविल ऑस्टिन की प्रसिद्ध पुस्तक The Indian Constitution: Cornerstone of a Nation का उल्लेख किया और संविधान सभा की बहसों के आधार पर बताया कि संविधान का लक्ष्य केवल राजनीतिक लोकतंत्र स्थापित करना नहीं, बल्कि भारतीय समाज में “socio-economic revolution” लाना था—ऐसी क्रांति जो समाज की संरचना में बुनियादी परिवर्तन करे।
इस दृष्टि से भारतीय संविधान की पहली क्रांति नागरिकता की क्रांति थी। “हम भारत के लोग” कहकर संविधान ने सत्ता के स्रोत को राजा, साम्राज्य, धर्म या जाति से हटाकर जनता में स्थापित किया। संविधान की प्रस्तावना ने भारत को न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता पर आधारित लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने का संकल्प लिया। यह घोषणा अपने आप में भारतीय इतिहास की सामाजिक संरचना के विरुद्ध एक शांतिपूर्ण क्रांतिकारी उद्घोषणा थी। दूसरी क्रांति समानता की क्रांति थी। संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और विधियों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। अनुच्छेद 15 भेदभाव के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करता है। अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता स्थापित करता है और अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का उन्मूलन करता है। विशेष रूप से अनुच्छेद 17 का महत्व समझना चाहिए। जिस सामाजिक व्यवस्था में किसी मनुष्य को केवल उसके जन्म के कारण छूना तक अपवित्र माना जाता था, उसी समाज में संविधान ने घोषणा की कि अस्पृश्यता समाप्त है और उसका किसी भी रूप में व्यवहार दंडनीय होगा। यह किसी सैन्य या हिंसक क्रांति से कम व्यापक परिवर्तन नहीं था।
लेकिन संविधान निर्माताओं को यह भी मालूम था कि सदियों की असमानता को केवल समान कानून बनाकर समाप्त नहीं किया जा सकता। यदि दो व्यक्ति एक ही दौड़ में खड़े हों, लेकिन एक को सदियों से शिक्षा, संपत्ति, सम्मान और संस्थागत अवसर मिले हों और दूसरे को इन सबसे वंचित रखा गया हो, तो केवल यह कहना कि दोनों को समान अवसर प्राप्त है, वास्तविक समानता नहीं है। यहीं से संविधान की सकारात्मक भेदभाव और आरक्षण की व्यवस्था सामने आती है। अनुच्छेद 16(4), अनुच्छेद 46 तथा अन्य संवैधानिक प्रावधान ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को वास्तविक अवसर उपलब्ध कराने की संवैधानिक नीति का आधार बने। Akhil Bharatiya Soshit Karamchari Sangh में यही प्रश्न सामने था। न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर ने समानता को यांत्रिक और औपचारिक अवधारणा के रूप में स्वीकार करने के बजाय “activist equalisation” की आवश्यकता पर बल दिया। उनके अनुसार यदि सामाजिक अन्याय के कारण कुछ समुदाय वास्तविक समानता से वंचित हैं तो उन्हें समान स्थिति तक पहुंचाने के लिए राज्य द्वारा सक्रिय हस्तक्षेप संविधान-विरोधी नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा के अनुरूप है। यहां भारतीय संविधान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है—समानता का अर्थ हमेशा समान व्यवहार नहीं होता। कभी-कभी वास्तविक समानता के लिए असमान परिस्थितियों वाले लोगों के साथ अलग व्यवहार करना आवश्यक होता है। यही वह विचार है जिसने भारतीय संविधान को सामाजिक परिवर्तन का औजार बनाया।
न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर का संवैधानिक दर्शन केवल दलितों या आरक्षण तक सीमित नहीं था। उनकी दृष्टि में संविधान का उद्देश्य एक ऐसे समाज का निर्माण करना था जिसमें मनुष्य की गरिमा सर्वोपरि हो। Akhil Bharatiya Soshit Karamchari Sangh के निर्णय में उन्होंने सदियों से उत्पीड़ित SC/ST समुदायों की स्थिति का उल्लेख करते हुए इस बात पर जोर दिया कि संविधान ऐतिहासिक सामाजिक अन्याय के प्रति neutral नहीं हो सकता। इस दृष्टि से संविधान की प्रस्तावना, मौलिक अधिकार और नीति-निदेशक तत्व अलग-अलग खानों में रखे हुए प्रावधान नहीं हैं। वे मिलकर एक transformative constitutional project बनाते हैं। अनुच्छेद 38 सामाजिक व्यवस्था में न्याय की स्थापना और असमानताओं को कम करने की दिशा देता है। अनुच्छेद 39 आर्थिक संसाधनों के वितरण तथा धन के अत्यधिक संकेंद्रण को रोकने की संवैधानिक आकांक्षा व्यक्त करता है। अनुच्छेद 46 कमजोर वर्गों, विशेषकर SC/ST के शैक्षिक और आर्थिक हितों की विशेष सुरक्षा का निर्देश देता है। इसलिए भारतीय संविधान को केवल राजनीतिक लोकतंत्र का दस्तावेज कहना अधूरा होगा। वह सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की दिशा में भी एक कार्यक्रम प्रस्तुत करता है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—क्या यह रक्तहीन सामाजिक क्रांति पूरी हो चुकी है? उत्तर स्पष्ट रूप से नहीं है। संविधान ने कानून बदल दिया, लेकिन सामाजिक चेतना को पूरी तरह नहीं बदल पाया। अस्पृश्यता अपराध है, फिर भी उसके सामाजिक रूप आज भी विभिन्न क्षेत्रों में दिखाई देते हैं। जाति आधारित भेदभाव कानूनी रूप से अस्वीकार्य है, लेकिन जाति आज भी विवाह, राजनीति, सामाजिक संबंधों और संसाधनों के वितरण को प्रभावित करती है। संविधान ने महिलाओं को समान नागरिकता दी, लेकिन पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचनाएं अभी भी मजबूत हैं। संविधान ने अवसर की समानता का सिद्धांत दिया, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य, संपत्ति और रोजगार के अवसरों में भारी असमानताएं बनी हुई हैं। यही वह स्थान है जहां संविधान की शक्ति और उसकी सीमा दोनों दिखाई देती हैं। संविधान समाज को बदलने का औजार हो सकता है, लेकिन वह समाज को अपने आप नहीं बदल सकता। कानून सामाजिक परिवर्तन का रास्ता खोल सकता है; वह परिवर्तन की संस्थाएं बना सकता है; वह उत्पीड़ित को अधिकार दे सकता है; वह राज्य को सकारात्मक कार्रवाई के लिए बाध्य कर सकता है—लेकिन अंततः सामाजिक मानसिकता, राजनीतिक संस्कृति और प्रशासनिक व्यवहार को भी बदलना पड़ता है। भारतीय संविधान की उपलब्धि इसलिए इस बात में है कि उसने परिवर्तन को हिंसा के बजाय संवैधानिक लोकतंत्र के माध्यम से संभव बनाया। भारत में सत्ता परिवर्तन के लिए बंदूक की आवश्यकता नहीं है; चुनाव पर्याप्त हैं। सामाजिक न्याय के लिए हिंसक विद्रोह आवश्यक नहीं है; संसद, न्यायपालिका, प्रशासन, आरक्षण, शिक्षा और नागरिक अधिकारों के माध्यम उपलब्ध हैं। शासक को हटाने के लिए क्रांति की आवश्यकता नहीं; मतदाता का एक मत पर्याप्त हो सकता है। इसी अर्थ में संविधान bloodless revolution का institutional mechanism है। इस क्रांति की एक और विशेषता है—यह स्वयं को संशोधित करने की क्षमता रखती है। संविधान ने अनुच्छेद 368 के माध्यम से संशोधन की व्यवस्था की, ताकि बदलती सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार संवैधानिक व्यवस्था विकसित हो सके। लेकिन संसद की शक्ति को असीमित नहीं छोड़ा गया। Kesavananda Bharati v. State of Kerala (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने Basic Structure Doctrine विकसित किया और यह स्थापित किया कि संविधान में संशोधन की शक्ति संविधान की मूल संरचना को नष्ट करने की शक्ति नहीं है। बाद में Minerva Mills v. Union of India (1980) ने सीमित संशोधन शक्ति और न्यायिक समीक्षा के महत्व को और मजबूत किया। इससे संविधान का एक अद्भुत द्वंद्व सामने आता है—वह परिवर्तन का दस्तावेज भी है और परिवर्तन के नाम पर सत्ता के निरंकुश केंद्रीकरण के विरुद्ध सुरक्षा-कवच भी। न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर की दृष्टि में संविधान “anaemic nor neutral” नहीं था; वह मूल्य-संपन्न और परिवर्तनकारी दस्तावेज था। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सामाजिक अन्याय को केवल औपचारिक समानता के नाम पर जस का तस छोड़ दिया गया तो संविधान की सामाजिक क्रांति का उद्देश्य निष्प्रभावी हो जाएगा। आज, चार दशक से अधिक समय बाद, इस दृष्टि की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। प्रश्न केवल यह नहीं है कि संविधान ने हमें क्या अधिकार दिए; प्रश्न यह है कि हमने उन अधिकारों को समाज के अंतिम व्यक्ति तक कितना पहुंचाया है। यदि संविधान की प्रस्तावना न्याय की बात करती है, लेकिन न्याय तक पहुंच आर्थिक क्षमता पर निर्भर हो जाए; यदि संविधान समानता की बात करता है, लेकिन सामाजिक प्रतिष्ठा जन्म से निर्धारित होती रहे; यदि संविधान स्वतंत्रता की गारंटी देता है, लेकिन असहमति को सामाजिक या राजनीतिक शत्रुता समझा जाने लगे; यदि संविधान बंधुता का आह्वान करता है, लेकिन समाज जाति, धर्म और पहचान के आधार पर लगातार विभाजित होता जाए—तो समस्या संविधान में नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों के सामाजिक अनुपालन में है। इसलिए आज संविधान की समीक्षा करते हुए हमें यह नहीं पूछना चाहिए कि संविधान ने भारत को कितना बदल दिया; बल्कि यह पूछना चाहिए कि भारत ने संविधान को अपने सामाजिक जीवन में कितना उतारा है। भारतीय संविधान की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने परिवर्तन का रास्ता रक्त से नहीं, अधिकार से; हिंसा से नहीं, विधि से; प्रतिशोध से नहीं, न्याय से; और सत्ता पर कब्जे से नहीं, लोकतांत्रिक भागीदारी से बनाया। यही न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्ण अय्यर की संवैधानिक दृष्टि का सार है। अतः “bloodless revolution” का अर्थ यह नहीं कि संविधान ने भारत में कोई तत्काल चमत्कार कर दिया। इसका अर्थ यह है कि संविधान ने उस समाज में परिवर्तन की ऐसी लोकतांत्रिक संरचना निर्मित की जिसमें ऐतिहासिक रूप से उत्पीड़ित व्यक्ति हिंसा के बजाय अधिकारों के माध्यम से अपनी स्थिति बदल सकता है। इस अर्थ में भारतीय संविधान कोई निष्प्राण कानूनी दस्तावेज नहीं है। वह एक जीवित सामाजिक परियोजना है—जिसका लक्ष्य केवल सरकार बनाना नहीं, बल्कि समाज को बदलना है; केवल नागरिक को अधिकार देना नहीं, बल्कि उसे गरिमा देना है; केवल राजनीतिक समानता स्थापित करना नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को चुनौती देना है। और शायद इसी कारण न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर की वह उक्ति आज भी भारतीय संवैधानिक चेतना को चुनौती देती है— संविधान ने रक्तहीन सामाजिक क्रांति का रास्ता तो खोल दिया है; लेकिन उस क्रांति को पूरा करना अभी भी भारतीय समाज का अधूरा दायित्व है।
सौजन्य :जस्टिस न्यूज़
माध्यम :समाचार पत्र









