दलित छात्र ने भारतीय विश्वविद्यालय में जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया
कानून के अंतिम वर्ष के छात्र का कहना है कि छात्र विरोध प्रदर्शन के बाद उसे छह महीने के लिए परिसर से प्रतिबंधित कर दिया गया और जुर्माना लगाया गया। छात्र ने विश्वविद्यालय अधिकारियों पर दलित छात्रों को असमान रूप से निशाना बनाने का आरोप लगाया है।
नई दिल्ली, भारत (एमएनटीवी) – भारत के अग्रणी जाति-विरोधी प्रतीक बीआर अंबेडकर के नाम पर स्थापित एक विश्वविद्यालय में कानून के एक दलित छात्र ने एक छात्र की मृत्यु के बाद हुए अशांति के मामले में छह महीने के लिए परिसर से प्रतिबंधित किए जाने और जुर्माना लगाए जाने के बाद विश्वविद्यालय के प्रशासकों पर जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया है।
हिंदी भाषा के समाचार पत्र दैनिक भास्कर के अनुसार, लखनऊ के बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में एलएलबी ऑनर्स के अंतिम वर्ष के छात्र पवन चौधरी ने कहा कि उन पर 12,000 भारतीय रुपये (125 डॉलर) का जुर्माना भी लगाया गया था।
एक वीडियो बयान में, चौधरी ने आरोप लगाया कि अप्रैल में हुए विरोध प्रदर्शन के बाद छात्रों के खिलाफ डकैती से संबंधित आरोपों सहित गंभीर आपराधिक आरोप लगाए गए हैं और दावा किया कि उन्हें इसलिए दंडित किया जा रहा है क्योंकि वह दलित हैं, एक ऐसा समुदाय जो ऐतिहासिक रूप से भारत की जाति व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर है।
उन्होंने कहा, “मुझे छह महीने के लिए कैंपस में आने से रोक दिया गया है और 12,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया है। यह कार्रवाई मेरे खिलाफ लूटपाट जैसे आरोपों के आधार पर की गई है क्योंकि मैं एक दलित छात्र हूं।”
यह विवाद 28 अप्रैल से शुरू हुआ, जब स्नातक छात्रा अनामिका सिंह की कथित तौर पर खाद्य विषाक्तता से मृत्यु के बाद छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया। आक्रोशित छात्रों ने कुलपति के आवास को घेर लिया और भीड़ में मौजूद कुछ लोगों ने अंदर तोड़फोड़ की।
व्यवस्था बहाल करने के लिए पुलिस को बुलाया गया। बाद में विश्वविद्यालय ने 16 छात्रों और कई अज्ञात लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद पुलिस ने आपराधिक मामला दर्ज किया।
जिन छात्रों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है, उन्होंने तोड़फोड़ की जिम्मेदारी से इनकार करते हुए दावा किया है कि बाहरी लोग प्रदर्शनकारी भीड़ में घुस आए और संपत्ति को नुकसान पहुंचाया। इसके बाद विश्वविद्यालय ने आरोपी छात्रों को परिसर में प्रवेश करने से रोक दिया।
चौधरी ने कहा कि यह सजा विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि बीबीएयू की स्थापना अंबेडकर के सम्मान में की गई थी, जो दलित न्यायविद और समाज सुधारक थे जिन्होंने जातिगत भेदभाव के खिलाफ भारत के संघर्ष का नेतृत्व किया और देश के संविधान के प्रमुख निर्माताओं में से एक थे।
विश्वविद्यालय अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए 50% सीटें आरक्षित रखता है, जो ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहने वाले समुदाय हैं और भारतीय कानून के तहत सकारात्मक कार्रवाई सुरक्षा के हकदार हैं।
बीबीएयू के मुख्य प्रॉक्टर राम चंद्र ने इस सुझाव को खारिज कर दिया कि अनुशासनात्मक कार्रवाई अनुचित थी, उन्होंने कहा कि लगभग 20 छात्रों के खिलाफ ऐसे आचरण के लिए कार्रवाई की गई थी जो “क्षमा के योग्य नहीं था।”
हालांकि, उन्होंने कहा कि छात्रों और उनके अभिभावकों की अपील के बाद विश्वविद्यालय सजाओं पर पुनर्विचार करेगा क्योंकि इनका छात्रों के भविष्य पर संभावित प्रभाव पड़ सकता है।
विश्वविद्यालय के एक बोर्ड से मामलों की समीक्षा करने और यह तय करने की अपेक्षा की जाती है कि अनुशासनात्मक उपायों को कम किया जाना चाहिए या वापस लिया जाना चाहिए।
सौजन्य :जस्टिस न्यूज़
माध्यम :समाचार पत्र









