दलितों के अपमान पर अदालतें और सरकार चुप क्यों?
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने अनुसूचित जाति/जनजाति अधिनियम-1989 (SC/ST एक्ट) के तहत एक मामले को यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि सिर्फ़ जातीय टिप्पणी किया जाना पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता। पीठ ने कहा कि SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(R) और 3(1)(S) के तहत सिर्फ़ जातीय टिप्पणी किया जाना आरोप का आधार नहीं बन सकता, इसके लिए अपमान किए जाने का इरादा और इस अपमान का ‘पब्लिक व्यू’ में किया जाना; एक जरूरी शर्त है। सर्वोच्च न्यायालय का मानना है कि घर के अंदर, जहाँ घटना किसी स्वतंत्र व्यक्ति की सार्वजनिक दृष्टि (‘पब्लिक व्यू’) में नहीं घटित हुई है, केवल वहाँ कथित जातिसूचक गाली देना इन धाराओं के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता। इससे एक दिन पहले एक महिला को ‘चमार’ कहे जाने को लेकर दर्ज कराये गए एक मामले को इलाहबाद उच्च न्यायालय ने भी रद्द कर दिया था। कोर्ट का कहना था कि ‘चमार’ एक जाति है और इसके नाम भर ले लेने से SC/ST एक्ट स्वतः लागू नहीं हो जाता। एक्ट लागू होने के लिए अपमान की नीयत और इस अपमान का ‘पब्लिक व्यू’ में आना जरूरी है। एक और मिलता जुलता मामला 2021 का है जिसमें शिकायतकर्ता श्याम नारायण के बारे में आरोपी राजीव कुमार दुबे द्वारा कथित रूप से “Chamara doctor did not come”(चमार डॉक्टर नहीं आया है) इस्तेमाल किया गया था।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने क्या था?
इस पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि सिर्फ “चमरा” शब्द का इस्तेमाल अपने आप ही यह साबित नहीं करता कि शिकायतकर्ता को उसकी जाति के कारण अपमानित या नीचा दिखाने के इरादे से कहा गया था। कोर्ट के अनुसार मामले में दूसरी महत्वपूर्ण कमी “पब्लिक व्यू” की थी।
इन सारे मामलों से यह स्पष्ट हो रहा है कि अदालत ये साफ़ साफ़ कह रही है कि चूँकि दलितों को अपमानित करने का काम सार्वजनिक रूप से नहीं किया गया है और यह भी कि चमार जैसे शब्द चूँकि भारत सरकार के संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 की उत्तर प्रदेश वाली सूची में लिखे गए हैं इसलिए इसे चमार कहा जाना अपराध नहीं माना जाएगा। पर क्या यह न्याय संगत है? क्या कानून की धाराओं को क्रूरतापूर्वक अक्षरशः मानकर इसकी मुख्य नीयत को ही दरकिनार नहीं किया जा रहा है?
क्या संवैधानिक न्यायालयों को समझ नहीं आता कि जब सरकारें ‘चमार’ शब्द का इस्तेमाल आधिकारिक रूप से करती हैं और जब एक आम और तथाकथित ऊँची जाति का व्यक्ति चमार शब्द का इस्तेमाल करता है तब इसमें क्या अन्तर होता है?
जब कोई ‘दुबे जी’ किसी डॉक्टर को संबोधित करते हुए उसे ‘चमरा डॉक्टर’ कहते हैं तो क्या दुबे जी “भारत सरकार के संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950” का पाठ कर रहे होते हैं? किसी कानून का दुरुपयोग ना हो यह कानून के शासन का अंतर्निहित भाव है लेकिन इस दुरुपयोग को रोकने के लिए कब एक अन्य दुरुपयोग को प्रोत्साहित कर दिया जाता है इसका भी ध्यान रखना चाहिए।
एक जरूरी सवाल यह भी है, जिसका जवाब भारत के संवैधानिक न्यायालयों और संसद को देना चाहिए, वो ये; कि क्या किसी दलित को बंद कमरे में अपमानित किया जा सकता है? यदि कोई दलित अपने अपमान के पक्ष में कोई सबूत ही ना जुटा पाये तो क्या वह अपमानित होते रहने को बाध्य है? क्या कानून की इस सीमा का लाभ उठाकर दलितों का लगातार उत्पीड़न नहीं हो रहा है? असल में यही हो रहा है।
सौजन्य :जस्टिस न्यूज़
माध्यम :समाचार पत्र









