सतना के दूरगामी लामा टूटैल प्राथमिक विद्यालय में चंदा कर मनाई आजादी की 80वीं वर्षगांठ, डीपीसी बोले- स्कूल कहां पर है, पता नहीं
ग्रामीणों का कहना है कि 15 अगस्त को जब गांव में न शिक्षक पहुंचे और न कोई अधिकारी या जनप्रतिनिधि, तब ऐसा लगा मानो हम आजाद भारत में नहीं, बल्कि गुलामी का दर्द झेलते हुए अपने देश का झंडा फहरा रहे हैं।
सतना के दूरगामी लामा टूटैल प्राथमिक विद्यालय में चंदा कर मनाई आजादी की 80वीं वर्षगांठ, डीपीसी बोले- स्कूल कहां पर है, पता नहीं चंदा एकत्र कर मिठाई मंगाई, खीर-पूड़ी बनाई, उत्साह के साथ राष्ट्रीय पर्व मनाते ग्रामीण।
न तिरंगा था, न मिठाई, न शिक्षक और न ही कोई सरकारी प्रतिनिधि
विद्यालय बंद, लेकिन बच्चों का उत्साह नहीं टूटा, नहीं कम हुआ उत्साह
विद्यालय के शिक्षक भी कई बार गांव तक नहीं पहुंच पाते
शिवम कृष्ण त्रिपाठी, नईदुनिया, सतना। एक ओर, जहां देश आजादी की 80वीं वर्षगांठ पर तिरंगे के रंग में रंगा था। शहरों में सरकारी कार्यालयों से लेकर स्कूल-कॉलेज तक राष्ट्रगान गूंज रहा था। कहीं मंच सजे थे तो कहीं जनप्रतिनिधि और अधिकारी ध्वजारोहण कर रहे थे।
सतना के दूरगामी मझगवां तहसील के लामा-टुटैला गांव में कुछ बच्चे आजादी का जश्न मनाने के लिए स्कूल पहुंचे तो वहां न तिरंगा था, न मिठाई, न शिक्षक और न ही कोई सरकारी प्रतिनिधि। बच्चों की आंखों में आजादी का उत्साह था और व्यवस्था के पास उनके लिए कोई इंतजाम नहीं। सर्व शिक्षा अभियान के जिला कार्यक्रम समन्वयक दिवाकर तिवारी बोले- मुझे अभी इस विषय में जानकारी लेनी पड़ेगी।
हर किसी ने अपनी हैसियत के मुताबिक सहयोग किया
यह तस्वीर है मझगवां तहसील के लामा-टुटैला गांव की, जहां स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए आखिरकार ग्रामीणों को ही आगे आना पड़ा। किसी ने 100 रुपये दिए तो किसी ने अपनी हैसियत के मुताबिक सहयोग किया। देखते ही देखते ग्रामीणों ने करीब तीन से चार हजार रुपये चंदा जुटाया।
लड्डू और मिठाई मंगाई गई, खीर-पूड़ी बनाई गई
इसी चंदा के पैसे से बच्चों के लिए लड्डू और मिठाई मंगाई गई, खीर-पूड़ी बनाई गई और फिर लकड़ी के एक डंडे के सहारे तिरंगा खड़ा कर आजादी का पर्व मनाया गया। गांव के रहवासी रोहित की पीड़ा व्यवस्था की पूरी कहानी कह देती है।
स्वतंत्रता दिवस का अर्थ किताबों और भाषणों से कहीं अधिक
ग्रामीणों का कहना है कि बच्चों को क्या बताएं जिनके लिए स्वतंत्रता दिवस का अर्थ किताबों और भाषणों से कहीं अधिक है। वे भी चाहते हैं कि उनके स्कूल में तिरंगा फहरे, राष्ट्रगान हो, मिठाई मिले और कोई उन्हें बताए कि देश की आजादी उनके लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी देश के बड़े शहरों में रहने वाले बच्चों के लिए।
बच्चों की जिद ने बचाई पर्व की गरिमा
विद्यालय बंद रहा, लेकिन बच्चों का उत्साह नहीं टूटा। वे स्वतंत्रता दिवस मनाने की जिद पर अड़े रहे। आखिरकार ग्रामीणों ने ही जिम्मेदारी संभाली। चंदा एकत्र किया, मिठाई मंगाई, खीर-पूड़ी बनाई और लकड़ी के डंडे में तिरंगा लगाकर जमीन में गाड़ दिया। फिर बच्चों के साथ राष्ट्रगान गाया गया।
यह तस्वीर सिर्फ एक गांव की मजबूरी नहीं…
एक तरफ देशभर में स्वतंत्रता दिवस के भव्य आयोजन हुए, वहीं लामा-टुटैला में बच्चों ने ग्रामीणों के सहारे आजादी का पर्व मनाया। यह तस्वीर सिर्फ एक गांव की मजबूरी नहीं, बल्कि उन दूरस्थ इलाकों में सरकारी पहुंच और बुनियादी सुविधाओं की हकीकत पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है, जहां आज भी देश की आजादी का जश्न मनाने के लिए ग्रामीणों को अपने स्तर पर व्यवस्था करनी पड़ रही है।
तीन तरफ नदी, पीछे पहाड़… बारिश में दुनिया से कट जाता है गांव लामा-टुटैला की परेशानी सिर्फ स्वतंत्रता दिवस तक सीमित नहीं है। गांव की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि बारिश में गांव मुख्यधारा से कट जाता है। तीन ओर नदी और पीछे पहाड़ से घिरा है यह खूबसूरत गांव तेज बारिश के दौरान ग्रामीणों का बाहर निकलना तक मुश्किल हो जाता है। नदी में पानी कम हो तो घुटनों तक पानी में उतरकर रास्ता पार करना पड़ता है। पानी बढ़ जाए तो गांव का संपर्क लगभग पूरी तरह बंद हो जाता है।
सरकारी प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक भी कई बार गांव तक नहीं पहुंच पाते।मुझे अभी इस विषय में जानकारी लेनी पड़ेगी। लामा टूटैल प्राथमिक विधालय कहां पर है। दिवाकर तिवारी, जिला कार्यक्रम समन्वयक, सर्व शिक्षा अभियान|
सौजन्य :जस्टिस न्यूज़
माध्यम :समाचार पत्र









