‘अवैध क़ैद’- कार्यकर्ताओं ने की श्रमिक आंदोलन के बाद गिरफ़्तार लोगों की तत्काल रिहाई की मांग
दिल्ली के जंतर मंतर पर प्रदर्शन करते हुए कार्यकर्ताओं, छात्रों और नोएडा श्रमिक आंदोलन के बाद गिरफ़्तार लोगों के परिवार के सदस्यों ने पुलिस के बयानों में विरोधाभास, पर्याप्त सबूतों की कमी और अप्रैल के आंदोलन के सिलसिले में रिश्तेदारों और दोस्तों को कथित तौर पर परेशान किए जाने का मुद्दा उठाया|
14 मई 2026 को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर कैंपेन फॉर द रिलीज ऑफ वर्कर्स एंड एक्टिविस्ट्स ऑफ नोएडा की ओर से पत्रकार सत्याम वर्मा और कार्यकर्ता आकृति चौधरी पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत लगाए गए आरोपों के विरोध में प्रदर्शन किया गया था|
नई दिल्ली: नोएडा में श्रमिकों के आंदोलन को चार महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद कई श्रमिक और कार्यकर्ता अब भी जेल में बंद हैं. उनकी रिहाई की मांग को लेकर छात्र नेताओं और कार्यकर्ताओं ने मंगलवार (11 अगस्त) को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया.
इस प्रदर्शन ने अप्रैल में हुए उन विरोध प्रदर्शनों की ओर एक बार फिर लोगों का ध्यान खींचा है, जिनमें उचित मजदूरी की मांग कर रहे सैकड़ों प्रदर्शनकारियों और कार्यकर्ताओं को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था.
मंगलवार का प्रदर्शन कैंपेन फॉर द रिलीज ऑफ वर्कर्स एंड एक्टिविस्ट्स ऑफ नोएडा (कारवां) ने आयोजित किया था. यह एक अस्थायी मानवाधिकार समूह है. प्रदर्शन में छात्र, कार्यकर्ता, श्रमिक और कलाकारों के साथ-साथ जेल में बंद लोगों के परिवार के सदस्य भी शामिल हुए.
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने घटनाओं के क्रम और समय को लेकर पुलिस की रिपोर्ट्स में कथित विरोधाभासों और विसंगतियों को सामने रखा. उन्होंने पुलिस की कार्रवाई को ‘अवैध और बेबुनियाद’ बताया.
कारवां के सदस्य केशव आनंद ने द हिंदू से कहा, ‘आठ कार्यकर्ताओं को जेल में बंद हुए चार महीने हो चुके हैं. उत्तर प्रदेश पुलिस ने इनमें से प्रत्येक के खिलाफ कम से कम 11 एफआईआर दर्ज की हैं और आकृति चौधरी और सत्यम वर्मा के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के प्रावधान भी लगाए हैं. हालांकि, पुलिस ने अब तक अदालत में कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया है.’
केशव आनंद, श्रमिकों के प्रदर्शन के दौरान ‘हिंसा भड़काने’ के मुख्य आरोपी बनाए गए आदित्य आनंद के भाई हैं.
केशव ने यह भी कहा कि आकृति चौधरी, सृष्टि गुप्ता, मनीषा चौहान और रूपेश रॉय समेत कई मामलों में मजिस्ट्रेट के सामने पेश की गई चार्जशीट और रिमांड शीट में घटनास्थल और तारीख जैसी अहम जानकारियां अलग-अलग दी गई हैं|
उन्होंने कहा, ‘एक चार्जशीट में कहा गया है कि 26 अप्रैल को नोएडा फेज-2 पुलिस स्टेशन के पास एक जगह पर आकृति का फोन उनके बैग में मिला था. वहीं, एक दूसरी चार्जशीट में कहा गया कि उनके फोन की आखिरी ज्ञात लोकेशन बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन थी, जहां से उन्हें 11 अप्रैल को शाम 7:04 बजे गिरफ्तार किया गया था. पुलिस हिरासत में रहते हुए वह अपना फोन किसी दूसरी जगह कैसे रख सकती थीं?’
गिरफ्तार लोगों के परिवार के सदस्यों ने भी पुलिस पर उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं. उनका कहना है कि पुलिस बिना वॉरंट के उनके घरों की तलाशी ले रही है, उनसे पहचान संबंधी दस्तावेज मांगकर परेशान कर रही है और उनके रिश्तेदारों तथा दोस्तों से पूछताछ कर रही है|
सृष्टि की दोस्त नूरीन सबा ने द हिंदू से कहा, ‘18 अप्रैल को पुलिस हमारे पीजी के कमरे में आई और मुझसे पूछताछ की. उन्होंने पीजी के मालिक से हमें बाहर निकालने के लिए भी कहा और हमें ‘आतंकवादी’ बताया. हमने इन अवैध कार्रवाइयों को लेकर राष्ट्रीय महिला आयोग समेत कई अधिकारियों के पास शिकायतें दर्ज कराई हैं, लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला है.’
ज्ञात हो कि ये गिरफ्तारियां अप्रैल में नोएडा के औद्योगिक इलाके में मजदूरी बढ़ाने, काम के घंटों और ओवरटाइम के बेहतर भुगतान की मांग को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद हुई थीं. ऐसे ही एक प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर हिंसा भड़क गई, जिसके बाद बड़े पैमाने पर पुलिस कार्रवाई शुरू हुई. कई लोगों को हिरासत में लिया गया और उनके खिलाफ एनएसए के तहत मामले दर्ज किए गए. इस कानून के तहत किसी व्यक्ति को बिना मुकदमे के एक साल तक हिरासत में रखा जा सकता है|
सौजन्य :जस्टिस न्यूज़
माध्यम :समाचार पत्र









