नोएडा श्रमिक आंदोलन: एक और छात्र गिरफ़्तार, साथी बोले- मज़दूरों, कार्यकर्ताओं के साथ खड़े होने की सज़ा
दिल्ली यूनिवर्सिटी से एलएलबी कर रहे छात्र योगेश मीणा को नोएडा मज़दूर आंदोलन से जुड़े मामले में गिरफ़्तार किया गया है. उनके साथियों का आरोप है कि उन्हें श्रमिक आंदोलन मामले में गिरफ़्तार कार्यकर्ताओं के पक्ष में अभियान चलाने की वजह से निशाना बनाया गया है|

नई दिल्ली: 30 मई की दोपहर दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र योगेश अपने दोस्त समीर के साथ पैदल रामजस कॉलेज के बाहर से निकल रहे थे कि तभी उनके पास एक गाड़ी आकर रुकी. उस वाहन में बैठे लोगों ने योगेश का नाम पुकारा. इसके बाद सादे कपड़ों और पुलिस वर्दी में मौजूद कुछ लोगों ने दोनों को बिना कोई वारंट, गिरफ्तारी मेमो या पहचान पत्र दिखाए वाहन में बैठा लिया. कुछ घंटों बाद समीर को छोड़ दिया गया और योगेश को ‘यूपी पुलिस’ अपने साथ ले गई|
उत्तर प्रदेश के मुज्जफ़रनगर के 18 वर्षीय समीर रामजस कॉलेज में प्रथम वर्ष के छात्र हैं. 1 जून को दिल्ली पुलिस को भेजी गई शिकायत में उन्होंने दावा है कि 30 मई को उस गाड़ी में बैठाए जाते समय उन्हें बताया गया कि उनके खिलाफ कोई शिकायत है और उसके बाबत ही पूछताछ के लिए ले जाया जा रहा है. ईमेल के माध्यम से भेजी गई यह शिकायत एसएचओ मौरिस नगर, डीसीपी सिविल लाइंस, और दिल्ली पुलिस के कमिश्नर को भेजी गई है|
समीर के अनुसार, वाहन को पहले मुखर्जी नगर थाने, फिर मौरिस नगर थाने और बाद में नोएडा बॉर्डर की ओर ले जाया गया. लगभग दो से तीन घंटे तक उन्हें और योगेश को उसी गाड़ी में ही रखा गया, उनसे पूछताछ की गई और ‘डराया-धमकाया’ गया. बाद में समीर को मौरिस नगर थाने के पास छोड़ दिया गया, जबकि योगेश को यूपी पुलिस अपने साथ ले गई|
बताया गया है कि यह क़दम अप्रैल के मध्य में नोएडा में मजदूरों द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शन के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा की जा रही कार्रवाई का हिस्सा है|
अखबारों- दैनिक भास्कर और हिंदुस्तान ने पुलिस के हवाले से योगेश के गिरफ़्तारी की पुष्टि की थी. साथ ही, पुलिस द्वारा जारी की गई रिमांड शीट में मजिस्ट्रेट द्वारा योगेश को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजने की बात सामने आई है. हालांकि, शुरुआत में इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई थी|
स्नातक की पढ़ाई दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रतिष्ठित श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से पूरी करने वाले 23 वर्षीय योगेश मीणा फ़िलहाल इसी यूनिवर्सिटी की लॉ फैकल्टी में दूसरे साल के छात्र हैं. योगेश के दोस्त बताते हैं कि अभी उनकी परीक्षा चल रही है, जो वह गिरफ्तार होने के कारण नहीं दे पाएंगे|
योगेश मीणा की ओर से 4 जून को गौतमबुद्ध नगर की अदालत में मजिस्ट्रेट के समक्ष एक आवेदन दायर कर जेल प्रशासन को उन्हें पढ़ाई और परीक्षा से संबंधित सामग्री उपलब्ध कराने का निर्देश देने की मांग की गई थी. आवेदन में कहा गया था कि योगेश एलएलबी के छात्र हैं और उनके सेमेस्टर की परीक्षाएं चल रही हैं, 5 और 11 जून को उन्हें पेपर देना है|
याचिका के अनुसार, गिरफ्तारी से पहले वह एक परीक्षा दे चुके थे, लेकिन बाद में न्यायिक हिरासत में भेज दिए गए.
आवेदन में अदालत से अनुरोध किया गया था कि उन्हें उनकी किताबें, क्लास नोट्स, स्टेशनरी और अन्य अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराई जाए, साथ ही उन्हें शेष विश्वविद्यालय परीक्षाओं में शामिल होने की अनुमति देने के लिए जेल अधीक्षक को आवश्यक निर्देश जारी किए जाएं|
इस आवेदन पर मजिस्ट्रेट आरके सागर के हस्ताक्षर के साथ यह दर्ज किया गया कि ‘जेल अधीक्षक नियमानुसार आवश्यक कार्यवाही करे.’
हालांकि, योगेश के साथियों ने द वायर हिंदी को बताया है कि योगेश को 5 जून की परीक्षा नहीं देने दी गई.
रिमांड शीट के अनुसार, योगेश पर एफआईआर संख्या 169/2026 के तहत नोएडा फेज 2 थाने में मामला दर्ज हुआ है.
योगेश के दोस्त बताते हैं कि पुलिस के पास उनकी गिरफ्तारी का आधार महज वो वॉट्सऐप ग्रुप है, जिसका हिस्सा रहे अन्य एक्टिविस्टों में से कई फ़िलहाल गिरफ्तार हैं. ऋचा ग्लोबल नाम से बने उस ग्रुप से योगेश भी जुड़े थे. इस ग्रुप के बारे में पुलिस का कहना है कि इसी के माध्यम से अप्रैल में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़काने की साजिश हुई थी.
आंदोलन को ‘साज़िश’ बताने का खेल
ज्ञात हो कि अप्रैल के महीने में नोएडा में हुए मजदूर आंदोलन के दौरान नोएडा के फैक्ट्री मजदूर वेतन बढ़ाने, बेहतर कामकाजी परिस्थितियों और श्रम अधिकारों की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे. 13 अप्रैल को प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़क गई थी. प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया था कि पुलिस ने बिना उकसावे के बल प्रयोग किया, जबकि पुलिस का कहना है कि भीड़ हिंसक हो गई थी और हालात काबू करने के लिए कार्रवाई करनी पड़ी.
अब इस मामले में पुलिस ‘साजिश’, ‘हिंसा’ और हिंसा के ‘मास्टरमाइंड’ जैसे आरोप लगाते हुए कार्रवाई कर रही है. पुलिस का कहना है कि ‘मजदूर आंदोलन के दौरान हुई हिंसा एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा था.’
हालांकि, मजदूर अधिकार संगठन से जुड़े कार्यकर्ताओं तथा अन्य कार्यकर्ताओं का कहना है कि पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए लोग विरोध करने के अपने संवैधानिक अधिकार का प्रयोग कर रहे थे, और कुछ छात्र तथा कार्यकर्ता उनका सहयोग कर रहे थे, जिसे पुलिस साजिश का नाम दे रही है.
इस मामले में अब तक कई मजदूरों तथा 8 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है. गिरफ्तार किए गए कार्यकर्ताओं में योगेश के अलावा वरिष्ठ पत्रकार सत्यम वर्मा, आदित्य आनंद, रुपेश राय, आकृति चौधरी, सृष्टि, हिमांशु और मजदूर मनीषा शामिल हैं. सत्यम वर्मा और आकृति चौधरी पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) लगा दिया गया है.
फंसाने का प्रयास?
योगेश के दोस्त और नोएडा विरोध प्रदर्शन मामले में एक याचिकाकर्ता केशव आनंद और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस योगेश को अनिल कुमार नाम के एक शख्स से जोड़ रही है. केशव योगेश के मामले में भी करीब से जुड़े हैं.
बता दें कि नोएडा विरोध प्रदर्शनों के बाद गिरफ़्तार कार्यकर्ताओं के मामले के कई याचिकाकर्ताओं ने इन्हीं अनिल कुमार पर हिंसा भड़काने और पुलिस की ओर से काम करने का आरोप लगाया था.
द वायर यह सत्यापित करने में सक्षम रहा कि 13 अप्रैल को अनिल कुमार ने ऋचा ग्लोबल वॉट्सऐप ग्रुप पर एक वॉयस नोट भेजा था जिसमें वह कह रहे थे, ‘मोदी बाइपास का उद्घाटन करने आ रहे हैं, कल पूरा रोड जाम करना चाहिए.’
21 अप्रैल को संपर्क किए जाने पर अनिल कुमार ने द वायर से कहा था कि वह केंद्रीय गृह मंत्रालय में संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) पर ड्राइवर के रूप में काम करते हैं. उन्होंने यह भी बताया था कि वह पहले ऋचा ग्लोबल कंपनी में काम कर चुके हैं, जहां न्यूनतम वेतन और अन्य मांगों को लेकर मजदूरों का आंदोलन हुआ था. हालांकि, उन्होंने उक्त वॉयस नोट के जरिए हिंसा भड़काने के किसी भी इरादे से इनकार किया था.
याचिका में आरोप लगाया गया है कि यूपी पुलिस में सब-इंस्पेक्टर बीना कौर और अनिल कुमार ने मजदूरों के वॉट्सऐप ग्रुप में घुसपैठ कर ‘मुसीबत खड़ी करने’ की कोशिश की.
यूपी पुलिस द्वारा 21 मई को ड्राइवर अनिल कुमार को हिरासत में लिया गया. हालांकि यह सपष्ट नहीं है कि उन्हें कहां से हिरासत में लिया गया था. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस ने कहा कि ‘अनिल कुमार का नोएडा के किसी भी पुलिस अधिकारी से कोई संबंध नहीं था और न ही वह शहर में काम करते हैं.’
पुलिस ने यह भी कहा कि कुमार ‘दिल्ली में एक केंद्रीय सरकारी एजेंसी के अधिकारी के यहां संविदा पर कार्यरत है.’ वहीं, द वायर से बातचीत में अनिल कुमार ने कहा था कि वह केंद्रीय गृह मंत्रालय के लिए काम करते हैं.
केशव के अनुसार, अनिल से पुलिस योगेश को जोड़ रही है. केशव ने बताया कि पुलिस का कहना है कि योगेश बराबर अनिल के संपर्क में थे. दैनिक भास्कर ने भी पुलिस अधिकारियों के हवाले से लिखा है कि ‘जांच में यह सामने आया कि अनिल और योगेश मीणा के बीच लगातार संपर्क था.’
केशव का कहना है कि आंदोलन से जुड़े लोगों ने सार्वजनिक रूप से अनिल कुमार की भूमिका पर सवाल उठाए थे और उसे लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की थी और अदालत के समक्ष उसे साक्ष्य के रूप में भी प्रस्तुत किया गया था.
उन्होंने कहा, ‘अगर हम खुद किसी व्यक्ति की भूमिका को उजागर कर रहे थे, तो फिर हमें उसी व्यक्ति का सहयोगी बताना समझ से परे है.’
केशव ने द वायर हिंदी को यह भी बताया कि उपलब्ध चैट रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट है कि योगेश ने अनिल कुमार द्वारा डाले गए कथित भड़काऊ संदेशों का समर्थन नहीं किया था, बल्कि उन पर सवाल उठाए थे. (द वायर हिंदी ने इन चैट्स को देखा है.)
केशव का आरोप है कि अब जांच एजेंसियां योगेश और अन्य कार्यकर्ताओं को अनिल कुमार से जोड़कर एक नई कहानी गढ़ने की कोशिश कर रही हैं. उन्होंने कहा, ‘हमारे पास ऐसे स्क्रीनशॉट हैं जिनमें योगेश इस तरह के संदेशों का विरोध करते दिखाई देते हैं. अगर पूरी चैट सार्वजनिक की जाए तो तस्वीर अलग दिखेगी.’
केशव ने यह भी बताया कि ‘योगेश ने अनिल कुमार को एक बार कॉल किया था. वो भी तब जब उसने ग्रुप में भड़काऊ मेसेज किए थे. हालांकि उनकी बात अनिल से नहीं हो पाई थी.’
किसी प्रक्रिया का पालन नहीं
उधर, योगेश के वकील अली ज़िया कबीर कहते हैं कि पुलिस ने अभी तक उनको लिखित या मौखिक रूप से यह नहीं बताया है कि उन्हें किस आधार पर गिरफ्तार किया है.
30 मई को गिरफ्तारी के बाद योगेश मीणा को गौतमबुद्ध नगर की जनपद न्यायालय के मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया, जहां उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया गया.
योगेश के वकील ने आरोप लगाया है कि गिरफ्तारी के आधार, एफआईआर का विवरण या गिरफ्तारी के कारणों की लिखित सूचना उन्हें नहीं दी गई. वे कहते हैं कि गिरफ्तारी के दौरान उन बुनियादी कानूनी प्रक्रियाओं का भी पालन नहीं किया गया, जिन्हें लेकर सुप्रीम कोर्ट कई बार स्पष्ट निर्देश दे चुका है.
उनके अनुसार, ‘सिर्फ मौखिक रूप से बताना भी पर्याप्त नहीं है. कानून कहता है कि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में दिए जाने चाहिए. योगेश को दिल्ली विश्वविद्यालय के परिसर से उठाया गया, लेकिन न तो गिरफ्तारी के आधार बताए गए और न ही निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया.’
कबीर ने सवाल उठाया कि जिस मामले की घटना अप्रैल मध्य की बताई जा रही है, उसमें मई के अंत में गिरफ्तारी की गई. उन्होंने कहा, ‘अगर पुलिस लगभग डेढ़ महीने तक इंतजार कर सकती है, तो फिर ऐसी क्या आपात स्थिति थी कि कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी छात्र को उठाकर ले जाया जाए? यदि किसी के खिलाफ मामला है, तो कानून में उसके लिए स्पष्ट प्रक्रियाएं मौजूद हैं.’
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि गिरफ्तारी के बाद भी पारदर्शिता नहीं बरती गई.
अली ज़िया कबीर के अनुसार, वे 31 मई को पूरे दिन अदालत में मौजूद रहे, लेकिन उन्हें यह तक नहीं बताया गया कि योगेश को कब और कहां पेश किया जाएगा.
उन्होंने कहा, ‘रिमांड की सुनवाई एक महत्वपूर्ण न्यायिक प्रक्रिया होती है, जहां बचाव पक्ष को भी अपनी बात रखने का अधिकार है. लेकिन हमें समय पर कोई सूचना नहीं दी गई. लंबे समय तक हमें यह भी स्पष्ट नहीं था कि उन्हें पुलिस हिरासत मिली है या न्यायिक हिरासत.’
योगेश के साथी भी उनके वकील की बातों की तस्दीक करते हैं. इनका भी आरोप है कि गिरफ्तारी की पूरी प्रक्रिया कानूनन निर्धारित नियमों के अनुरूप नहीं थी.
समीर के अनुसार, गिरफ्तारी के समय न तो किसी एफआईआर की प्रति दिखाई गई, न गिरफ्तारी के आधार बताए गए और न ही किसी तरह का गिरफ्तारी मेमो तैयार किया गया. समीर ने अपनी शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि दोनों के मोबाइल फोन की तलाशी ली गई और निजी डिजिटल सामग्री देखी गई, जबकि कोई सर्च वारंट नहीं दिखाया गया था.
शिकायत में समीर ने यह भी लिखा कि योगेश के पास उस समय उनका मोबाइल फोन और टैबलेट था, जिन्हें बाद में पुलिस अपने साथ ले गई.
उन्होंने शिकायत में योगेश के साथ दुर्व्यवहार होने की आशंका जताई थी और यह भी आरोप लगाया था कि गिरफ़्तारी के 24 घंटे बीत जाने के बाद भी परिवार और साथियों को उनके ठिकाने की जानकारी नहीं दी गई थी.
शिकायत में समीर ने आरोप लगाया है कि हिरासत के दौरान उनसे और योगेश से जाति, धर्म और सामाजिक गतिविधियों को लेकर सवाल पूछे गए तथा उनको अपमानित करने के लिए जातिसूचक टिप्पणियां की गईं.
हिंसा में कोई हाथ नहीं, समर्थन के लिए मिल रही सजा
योगेश दिशा छात्र संगठन से जुड़े हैं और वे पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ चुके हैं.
योगेश के करीबी बताते हैं कि एक छात्र कार्यकर्ता होने के नाते मजदूरों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन को उनका समर्थन था. लेकिन हिंसा भड़काने में अन्य गिरफ्तार एक्टिविस्टों की तरह उनका भी कोई योगदान नहीं है.
योगेश के साथी बताते हैं कि यूनिवर्सिटी में आने के बाद से ही उनका झुकाव सामाजिक कार्यों की ओर रहा है. वे गरीब और मजदूर के बच्चों को पढ़ते थे, और उन्हें शिक्षा को लेकर जागरूक करते थे.
पुलिस की कार्रवाई के डर से नाम न बताने की शर्त पर उनके एक साथी बताते हैं, ‘नोएडा प्रोटेस्ट मामले में गिरफ्तार अन्य कार्यकर्ताओं की रिहाई के लिए वे लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, यूनिवर्सिटी के अंदर वे अपने अन्य साथियों की गिरफ्तारी के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान में सक्रिय थे और छात्रों के बीच पर्चे बांट कर मामले को लेकर समर्थन जुटा रहे थे. इसी करण वह पुलिस के निशाने पर आए.’
केशव ने बताया कि ‘वह रामजस कॉलेज के बाहर अभियान चला रहे थे, तभी उन्हें वहां से उठा लिया गया.’
केशव आनंद ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी), राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग और दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को शिकायत भेजी है. उनका आरोप है कि नॉर्थ कैंपस से हिरासत में लेने के बाद ‘यूपी पुलिसकर्मियों ने योगेश को जातिसूचक गालियां दीं, मारपीट की और एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम का उल्लंघन किया.’
शिकायत में संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज करने, सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने और मामले की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई है.
समीर अनुसूचित जाति समुदाय से आते हैं, वहीं योगेश अनुसूचित जनजाति से ताल्लुक रखते हैं.
पुलिस का पक्ष
दैनिक भास्कर के मुताबिक, पुलिस अधिकारियों का कहना है कि ‘श्रमिक हिंसा कोई अचानक हुई घटना नहीं थी, बल्कि इसके पीछे सुनियोजित साजिश रची गई थी.’
अख़बार ने पुलिस के हवाले लिखा है कि जांच के दौरान पुलिस को कई डिजिटल और तकनीकी साक्ष्य मिले हैं, जिनके आधार पर योगेश मीणा की गिरफ्तारी की गई. पुलिस का दावा है कि आरोपी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और विभिन्न वॉट्सऐप ग्रुपों के ज़रिए मज़दूरों के बीच ‘आक्रोश और भ्रम का माहौल पैदा करने की कोशिश कर रहा था.’
योगेश की गिरफ्तारी नोएडा के सेक्टर-फेज-2 थाने में दर्ज एफआईआर संख्या 169/2026 से जुड़ी है. यह एफआईआर 23 अप्रैल 2026 को दर्ज की गई थी, और इसमें वर्णित घटनाएं 10 अप्रैल से 13 अप्रैल के बीच की बताई गई हैं.
हालांकि, यह जानकारी आधिकारिक तौर पर योगेश के वक़ील या साथियों को नहीं दी गई है.
एफआईआर के अनुसार, नोएडा की एक निजी कंपनी के बाहर मजदूरों का आंदोलन चल रहा था. शिकायतकर्ता कंपनी से जुड़े एक अधिकारी हैं, जिन्होंने आरोप लगाया कि कुछ व्यक्तियों और अज्ञात लोगों ने कंपनी के गेटों पर धरना दिया, कर्मचारियों को अंदर-बाहर जाने से रोका और बाद में भीड़ को उकसाकर हिंसा तथा आगजनी की घटनाओं को अंजाम दिया. एफआईआर में आरोप है कि वॉट्सऐप समूहों के माध्यम से लोगों को संगठित किया गया और आंदोलन को हिंसक दिशा दी गई.
एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की कई धाराएं लगाई गई हैं. इनमें धारा 126(2), 127(2), 109(1), 61(2) और 326(जी) शामिल हैं.
एफआईआर में दो नामजद आरोपियों के साथ ‘अन्य अज्ञात व्यक्ति’ भी दर्ज है. इसी के हवाले बाद की जांच में पुलिस ने कई सामाजिक और छात्र कार्यकर्ताओं को इस मामले से जोड़कर गिरफ्तार करना शुरू किया. ऐसा बताया गया है कि योगेश मीणा को भी इसी मामले में गिरफ्तार किया गया है.
द वायर द्वारा नोएडा फेज 2 थाने के एसएचओ और कमिश्नर नोएडा पुलिस को सवाल भेजे गए हैं. फेज 2 थाने को फोन कॉल और मैसेज के ज़रिये संपर्क भी किया गया है, हालांकि खबर के प्रकाशन तक उनका कोई जवाब नहीं मिला. उनका उत्तर मिलने पर रिपोर्ट में जोड़ा जाएगा|
सौजन्य :द वायर
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