यूपी पुलिस के कर्मी संविधान के बजाय सत्ताधारियों के प्रति ज़्यादा वफ़ादार: हाईकोर्ट
गैंगस्टर एक्ट से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस की शक्तियों के ग़लत इस्तेमाल पर गंभीरता से संज्ञान लेते हुए कहा कि अधिकारियों का एक बड़ा वर्ग क़ानून के शासन को संवैधानिक ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि कामकाज में आने वाली रुकावट मानता है. प्रदेश में नेताओं और अफ़सरों की ‘सामंती सोच’ ने लंबे समय से संवैधानिक शासन को जनसेवा के बजाय निजी दबदबे का ज़रिया बना दिया है|
नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा है कि उत्तर प्रदेश में पुलिस अधिकारी संविधान के बजाय सत्ताधारी सरकार के प्रति ज़्यादा वफ़ादार हैं|
बार एंड बेंच की ख़बर के मुताबिक, यूपी पुलिस के कामकाज की कड़ी आलोचना करते हुए जस्टिस विनोद दिवाकर ने कहा कि उत्तर प्रदेश में नेताओं और अफ़सरों की ‘सामंती सोच’ ने लंबे समय से संवैधानिक शासन को जनसेवा के बजाय निजी दबदबे का ज़रिया बना दिया है|
उल्लेखनीय है कि अदालत ने यह अहम टिप्पणियां गाज़ियाबाद में एक ही परिवार के तीन सदस्यों के ख़िलाफ़ यूपी गैंगस्टर एक्ट के तहत दर्ज आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान कीं. कोर्ट ने पाया कि यह सख़्त कानून पूरी तरह से दीवानी कानूनों के अंतर्गत आने वाले विवाद में लागू किया गया है|
बेंच ने गौर किया कि चार्जशीट में किसी ठोस सबूत का उल्लेख नहीं किया गया है. जबकि गैंगस्टर एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज होने के ठीक अगले दिन इन लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया और उन्हें लगभग 80 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रहना पड़ा|
बेंच ने कहा कि हो सकता है कि आरोपियों ने धोखाधड़ी और जालसाज़ी जैसे अपराध किए हों. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है इन्होंने सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाड़ने या कोई अनुचित फ़ायदा उठाने के मकसद से हिंसा, डराने-धमकाने या ज़बरदस्ती का सहारा लिया है. इसे संगठित गिरोह चलाने के तौर पर नहीं देखा जा सकता है. इसलिए इस मामले में गैंगस्टर एक्ट की धारा 2(b) लागू करने के लिए ज़रूरी शर्तें पूरी नहीं होती हैं|
अपने निष्कर्ष में अदालत ने यूपी गैंगस्टर एक्ट के तहत दर्ज इस आपराधिक मामले को रद्द कर दिया|
कोर्ट ने कहा कि राज्य का प्रशासनिक तंत्र अलग-अलग सरकारों के दौर में गहरे राजनीतिक दखल का शिकार रहा है और कुछ मामलों को छोड़कर, अधिकारियों के तबादले, पोस्टिंग और प्रमोशन अक्सर योग्यता-आधारित शासन के बजाय राजनीतिक संरक्षण का साधन रहे हैं|
अदालत ने आगे कहा कि यह एक जानी-मानी बात है कि जो अधिकारी वफादार माने जाते हैं, उन्हें मनपसंद पोस्टिंग – जैसे शहरी कमिश्नरेट और ज़्यादा कमाई वाले ज़िले- दिए जाते हैं, जबकि जो अधिकारी आज़ाद सोच दिखाते हैं, उन्हें सज़ा के तौर पर कम अहमियत वाली जगहों पर ट्रांसफर कर दिया जाता है|
अदालत के अनुसार, ‘अधिकारियों की वफ़ादारी संविधान के प्रति नहीं, बल्कि सत्ताधारी सरकार के प्रति होती है. फील्ड अधिकारी ट्रांसफर-पोस्टिंग के खेल को अच्छी तरह समझते हैं और अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के हिसाब से ही काम करते हैं. एनकाउंटर में हत्याएं, चुनिंदा लोगों पर कार्रवाई और परेशानी पैदा करने वाले लोगों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट का इस्तेमाल – इन सब मामलों पर समय-समय पर अदालतों का ध्यान गया है.’
‘प्रक्रिया का इस्तेमाल नहीं’
उत्तर प्रदेश में पुलिस के कामकाज और कानून के शासन पर कड़ी टिप्पणी करते हुए जस्टिस दिवाकर ने कहा, ‘अधिकारियों का एक बड़ा वर्ग कानून के शासन को संवैधानिक ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि कामकाज में आने वाली एक रुकावट मानता है. बिना सही प्रक्रिया के गिरफ्तारियां की जाती हैं; कई बार गलत इरादों से एफआईआर दर्ज की जाती हैं या दबा दी जाती हैं; और अधिकारियों की मनमर्जी से एहतियातन हिरासत के प्रावधानों का मनमाना इस्तेमाल किया जाता है. ‘कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रोसीजर’ (और अब ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’) के तहत मिलने वाली प्रक्रियात्मक सुरक्षा को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है. अदालती आदेशों का पालन सिर्फ़ दिखावे के लिए किया जाता है, लेकिन असल में उनका मक़सद पूरा नहीं होने दिया जाता है.’
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, 1986 से जुड़े मामले को लेकर राज्य में पुलिस की शक्तियों के गलत इस्तेमाल पर गंभीरता से प्रकाश डाला. चूंकि सुप्रीम कोर्ट भी 1986 के कानून से जुड़े मुद्दों पर विचार कर रहा है, इसलिए जस्टिस दिवाकर ने उन मुद्दों पर कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया|
हालांकि, कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की कई कमियों की बात की.
अदालत ने राज्य के गृह सचिव की आलोचना की और सरकार से कहा कि वह विभाग में अपने अधिकारियों की उपयुक्तता और काम करने की क्षमता का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन करे|
कोर्ट ने कहा, ‘कुछ अधिकारी जो गृह सचिव के पद तक पहुंचे, उन्होंने असल में अपने निजी स्वार्थों को साधने का काम किया है. ऐसे मामलों में पोस्टिंग की सिफारिशें, विभागीय कार्यवाही की मंज़ूरी और अदालती कार्यवाही पर जवाब देने में निष्पक्ष और संवैधानिक रूप से सही प्रशासनिक फ़ैसले के बजाय निजी या बाहरी कारणों का असर दिखा है. यह उस संस्थागत ईमानदारी से बुनियादी तौर पर समझौता करता है जिसकी इस पद के लिए ज़रूरत होती है.’
कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक कामकाज को किसी व्यक्ति की अपनी ज़रूरतों या सुविधा का बंधक नहीं बनाया जा सकता. साथ ही सरकारी तंत्र को किसी सत्ताधारी व्यवस्था के प्रति नहीं, बल्कि कानून और भारत के संविधान के प्रति जवाबदेह होना चाहिए|
कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में पुलिस अधिकारियों के मनमाने ढंग से काम करने का उदाहरण देने के लिए कानपुर के बिकरू गांव में मारे गए गैंगस्टर विकास दुबे के ख़िलाफ़ की गई कार्रवाई का भी ज़िक्र किया|
अदालत ने कहा कि बिकरू गांव के ऑपरेशन देखने वाले पुलिसकर्मियों- जिसमें डीसीपी समेत आठ पुलिसकर्मी मारे गए थे, को सिर्फ़ एक औपचारिक चेतावनी देकर छोड़ दिया गया|
बेंच ने कहा कि इस कोर्ट को सुपरवाइज़री विफलता की गंभीरता और उसके मुकाबले इतनी हल्की सज़ा के बीच कोई तालमेल नहीं दिखता. असल में संस्थागत छूट का यही चलन अधिकारियों को जवाबदेही से बचने का हौसला देता है और उस सामंती व राजनीतिक संरक्षण वाले प्रशासनिक सिस्टम को बनाए रखता है, जिसका ज़िक्र कोर्ट ने पहले किया है|
सौजन्य : द वायर
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