कृष्णा अय्यर से सूर्यकांत तक
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने समान अधिकार नियम यूसीसी पर पूरी तरह से रोक लगाते हुए घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन का कानून बनाने के लिए दायर एक याचिका को खारिज करते हुए में ट्रेड यूनियनों पर जो आर्थिक और औद्योगिक विकास कौ क्षति पहुंचाने का आरोप लगाया है वह दरअसल न्यायपालिका के निरंतर जनविरोधी होते जाने के कलंक कथा का एक और काला पन्ना है।
- अरविंद कुमार श्रीवास्तव (सीपीआई)
सरकार सौ साल से अधिक समय के संघर्षों से श्रमिकों द्वारा अर्जित श्रम कानूनों को दफन करके चार लेबर कोड थोपे है उन्हें न्यायालय में चुनौती दिये जाने पर उनका क्या हश्र होगा यह अभी से उजागर हो गया है। मैंने ४५सालश्रम कानूनों की वकालत और ट्रेड यूनियन आंदोलन में भागीदारी और नेतृत्व किया है और तमाम कानूनों के होने के बावजूद श्रमिकों ख़ासतौर पर असंगठित वर्ग का जिनकी संख्या कुल श्रमशक्ति का ९३है जो क्रूर और अमानवीय शोषण और अत्याचार होता है उसे निकट से देखा है। हमारे साथी 6घंटे के श्रम दिवस कि मांग करते हैं और सरकार ने उन्हें आठ से बढ़ाकर 12घंटे तक कर दिया और उनका वेतन किसी कानून से नहीं बल्कि मजबूरी और आवश्यकता से निर्धारित है।श्रम आंदोलन के दबाव में ठेका श्रमिक उन्मूलन कानून बनाया गया था जबकि आज की तारीख में सरकारी सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में केवल कुछ exception को छोड़कर सभी काम यहां तक कि शिक्षा कर्म भी संविदा पर हो रहा है और पी एच डी धारी शिक्षक अपनी ही संस्था में चतुर्थ श्रेणी के नियमित कर्मचारी से कम वेतन पर काम करने की शर्मिंदगी झेलने को मजबूर हैं। लाखों आंगनबाड़ी आशा ऊषा मध्यान्ह भोजन कर्मी चतुर्थ श्रेणी से भी कम वेतन पर अपना श्रम बेचने को मजबूर हैं ।दस मिनट में डिलिवरी देने के खतरनाक खेल में कितने गिग वर्कर मौत के मुंह में जा रहे हैं यह न्याय की बहुत ऊंची कुर्सी पर बैठ कर शायद समझा नहीं जा सकता क्योंकि उसके लिए नीचे झुक कर देखना पड़ता है।।
सामान्य नौकरियों की बात तो जाने दें इस देश में आज तक निजी क्षेत्र के प्रबंधकीय वर्ग को कानूनी सुरक्षा देने के लिए कोई कानून नहीं है।उनका नियुक्ति पत्र ही जो जाहिर है एकतरफा होता है, उनके लिए सेवा शर्त है और अगर अपने को फायर करने के खिलाफ किसी ने प्रतिरोध की कोशिश की तो उनको इतना ज़लील होना पड़ता है कि लगता है आत्म हत्या कर ले।
आजकल आन लाइन काम और बड़े बड़े आकर्षक पैकेज पाने वाले बच्चों के मां बाप इठला कर यह सब को बतलाते हैं पर कितने-कितने घंटे और कई बार लगातार 20/22घंटे तक कम्प्यूटर पर आंख धंसाये और गर्दन झुकाए बच्चों को देखकर लगता है कि मशीन या घोड़े खच्चर भी इतनी मेहनत नहीं करते होंगे। तुर्रा यह है कि इन क्षेत्रों में ट्रेड यूनियन बनाना प्रतिबंधित है और विरोध की कोई आवाज बर्दाश्त नहीं। यानी जबरा मारे रोने न दे।
क्या हमारे माननीय मुख्य न्यायाधीश ने नजरें फिराकर जानने की कोशिश की किश्रम और सेवा संबंधी मुकदमे लड़ते लड़ते ज्यादातर समय के साथ व्यर्थ हो जाते हैं और अब तो सर्वोच्च न्यायालय गैर कानूनी सेवा बर्खास्तगी को भी 50हजार या एक दो लाख मुआवजा देकर निपटा देता है। जितना लिखा जाये उतना थोड़ा।
माननीय सूर्य कांत जी को यू सी सी से काल्पनिक रूप से प्रताड़ित कथित सवर्णों की करुण पुकार तुरंत सुनाई पड़ गई पर उनका क्या जो 6/7साल से बिना मुकदमे जेलों में सड रहे या मर रहे हैं।सपा नेता मोहिद ख़ान बलात्कार के आरोप से बरी हो गये पर उनका घर दूकान बुलडोजर से गिरा दिया गया। अक्षरधाम कांड के मुस्लिम अपराधी 4/5साल जेल काटकर निर्दोष छूट गये उनकी यातना का क्या? और ऐसे एक नहीं सैकड़ों मामले हैं जिनमें दलित या अल्पसंख्यक जेलों में मर रहे हैं।
बड़ी अजीब बात है रोहित वेमुला प्रवीण ताडवी और उन दलित नौजवानों के हत्यारों का पता नहीं और जिन कारणों ने यू सी सी बनाने के लिए मजबूर किया उन कानूनों में किसी एक दो असंवैधानिक धाराओं नह पूरे कानून पर रोक?
और जस्टिस अकील कुरैशी विजय पटेल मुरलीधरन और अतुल श्रीधरन को सरकार के दबाव में प्रताड़ित करने वाले न्याय के देवताओं को जहरीले शेखर यादव,मोर के आंसू से बच्चे पैदा करवाने वाले न्यायधीश महेश शर्मा, सनातन के निर्देश पर न्याय पालिका को चलाने की इच्छा रखने वाले जस्टिस स्वामी नाथन,और मद्रास की ही एक सनातनी मोहतरमा जज नजर नहीं आते न नजर आते हैं हेमंत विश्व शर्मा न विजय शाह न गिरिराज सिंह न अनुराग ठाकुर न नरसिंहा नंद न बागेश्वर का बांगड़ बिल्ला न स्वयंभू जगतगुरु नजर आते हैं।न देश का पैसा लूटने और भागने वाले नज़र आते हैं। माननीय की नजर में तो ये देश की बड़ी सेवा कर रहे हैं नुकसान पंहुचा रहे हैं तो देश के मजदूर और उनके संगठन।
जस्टिस कृष्णा अय्यर के नेतृत्व में जस्टिस भगवती डी ए देसाई, वरदराजन जी डी ओझा और कई न्यायधीशों ने न्यायपालिका को संविधान के रक्षक और सामाजिक न्याय के वाहक के रूप में उसे वंचित वर्गों की पीड़ा को खत्म नहीं तो कम करने के सशक्त हथियार के रूप में प्रभावी इस्तेमाल किया था। ओल्गा टेलिस ने देश में पहली जनहित याचिका मुंबई के रेहड़ी पटरी वालों की सुरक्षा के लिए दायर की थी और जस्टिस कृष्णा अय्यर ने बंगलोर वाटर वर्क्स के प्रकरण में औद्योगिक विवाद अधिनियम के अंतर्गत “उद्योग ” और “कर्मकार”की इतनी व्यापक परिभाषा दी कि लगभग समूचा असंगठित वर्ग उसके सुरक्षा कवर में आ गया।हाल में केरल चुनाव में ईसाई वोटों पर नज़र गड़ायी भाजपा ने जस्टिस के टी थामस को पद्म भूषण से नवाजा जिनकी सबसे बड़ी और एकमात्र उपलब्धि कृष्णा अय्यर द्वारा मजदूर वर्ग को दिए गये सुरक्षा कवच को छीनना था। हालांकि कुछ सालों में ही उनका फैसला पलट दिया गया।
जस्टिस कृष्णा अय्यर से शुरू हुई यात्रा ने पिछलेदस बीस वर्षों में मान लिया है कि वह अपने सर्वोच्च शिखर को छू चुकी है और उस ढलान पर फिसलते ही जाना है और अब यह फिसलन दिन ब दिन गति पकड़ती जा रही है। सवाल यह है कि यह यात्रा क्या सब कुछ नष्ट हो जाने के बाद ही थमेगी?









