केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा- अरुणाचल सीएम के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच नहीं कर सकते
अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री और भाजपा नेता पेमा खांडू के पर भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के आरोप हैं. एक जनहित याचिका में खांडू पर अपने परिजनों को सार्वजनिक ठेके देने के आरोपों की जांच की मांग की गई थी. इसके जवाब में केंद्र सरकार ने मंत्रियों के लिए आचार संहिता का हवाला देते हुए कहा कि वह जांच नहीं कर सकती|
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने मंत्रियों के लिए आचार संहिता का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि वह अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेता पेमा खांडू के खिलाफ भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के आरोपों की जांच नहीं कर सकती|
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने इस संबंध में शीर्ष अदालत में एक हलफनामा दायर किया, जो दो गैर-लाभकारी संगठनों द्वारा दायर एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें खांडू पर अपने परिवार के सदस्यों को सार्वजनिक ठेके देने के आरोपों की जांच की मांग की गई थी.
अपने हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा कि खांडू पर लागू मंत्रियों की आचार संहिता राज्य के अधिकारक्षेत्र में आती है और केंद्रीय वित्त मंत्रालय के सार्वजनिक खरीद नियम राज्यों पर बाध्यकारी नहीं हैं|
इससे पहले याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि खांडू ने न केवल गृह मंत्रालय (एमएचए) द्वारा जारी सभी राज्य और केंद्रीय मंत्रियों पर लागू आचार संहिता का उल्लंघन किया, बल्कि केंद्रीय वित्त मंत्रालय के खरीद नियमों का भी पालन नहीं किया|
18 मार्च को अदालत के आदेश के बाद भी केंद्र सरकार द्वारा जवाब दाखिल न करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने उसे जवाब दाखिल करने के लिए तीन हफ़्ते का समय दिया था| यह जनहित याचिका दो गैर-सरकारी संगठनों- सेव मोन रीजन फ़ाउंडेशन और वॉलंटरी अरुणाचल सेना द्वारा दायर की गई है, जिसमें खांडू, उनके पिता की दूसरी पत्नी रिनचिन ड्रेमा और उनके भतीजे त्सेरिंग ताशी पर इन ठेकों के लाभार्थी होने का आरोप लगाया गया है.
अपने हलफ़नामे में केंद्र सरकार ने कहा कि आचार संहिता निश्चित रूप से सभी राज्य और केंद्र के मंत्रियों के लिए बाध्यकारी है. इसने 18 सितंबर, 2025 के गृह मंत्रालय के एक कार्यालय ज्ञापन का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि मंत्रियों के लिए आचार संहिता का खंड 2(डी) केंद्र और राज्य दोनों के मंत्रियों पर लागू होता है.
इस संहिता में कहा गया है, ‘पदभार ग्रहण करने के बाद, और जब तक वह पद पर बने रहेंगे, मंत्री यह सुनिश्चित करेंगे कि उनके परिवार के सदस्य उस सरकार को माल या सेवाएं प्रदान करने वाले (व्यापार या व्यवसाय के सामान्य क्रम और मानक या बाज़ार दरों को छोड़कर) या मुख्य रूप से उस सरकार से लाइसेंस, परमिट, कोटा, पट्टे आदि प्राप्त करने पर निर्भर कोई व्यावसायिक संस्था शुरू न करें या उसमें भाग न लें.’
हालांकि, केंद्र सरकार ने तब अपने हलफनामे में कहा था कि इस मामले में गृह मंत्रालय की कोई और भूमिका नहीं है|
अख़बार के अनुसार, सरकार ने हलफनामे में कहा, ‘इस मामले में गृह मंत्रालय की कोई और भूमिका नहीं है. वास्तव में रिट याचिका में उठाए गए मुद्दे राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं.’
वकील प्रशांत भूषण और नेहा राठी द्वारा प्रतिनिधित्व किए गए याचिकाकर्ताओं ने अरुणाचल प्रदेश सरकार द्वारा सार्वजनिक खरीद प्रक्रिया में अपनाई गई प्रक्रियाओं पर भी चिंता व्यक्त की| आरोपों का जवाब देते हुए अरुणाचल सरकार ने जुलाई में कहा था कि खांडू या याचिका में कथित लाभार्थियों के रूप में नामित व्यक्तियों को ‘कोई सरकारी ठेका नहीं दिया गया.’
इसमें कहा गया था कि खांडू, ड्रेमा या ताशी से संबंधित फर्मों या व्यक्तियों को दिए गए 95% ठेके ‘खुली निविदा’ प्रक्रिया के माध्यम से दिए गए थे और तकनीकी और वित्तीय बोलियों को आमंत्रित करने और उनका मूल्यांकन करने के बाद दिए गए थे. राज्य सरकार ने नामित लाभार्थियों में से किसी के संबंध में किसी भी तरह की ‘चुन-चुनकर’ या ‘अनुचित पक्षपात’ करने से इनकार किया था|
सुप्रीम कोर्ट ने इस साल मार्च में कहा था, ‘आचार संहिता में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि मंत्रियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके परिवार सरकारी निविदाओं में भाग न लें. अगर निविदाएं आमंत्रित नहीं की गईं, तो क्या प्रक्रिया अपनाई गई, इसका स्पष्ट जवाब हमारे पास होना चाहिए. यह बताया जाना चाहिए.’
सौजन्य :द वायर
नोट: यह समाचार मूल रूप से प्रकाशित https://thewirehindi.com/315053/unio किया गयाहै और इसका उपयोग विशुद्ध रूप से गैर-लाभकारी/गैर-वाणिज्यिक उद्देश्यों, विशेष रूप से मानवाधिकारों के लिए किया जाता है|









