दिल्ली दंगे: गढ़े गए सबूत, झूठे गवाह और फ़र्ज़ी मुक़दमे- अदालतों ने बरी किए कम से कम 17 आरोपी
दिल्ली की अदालतों ने साल 2020 के दंगों से जुड़े कम से कम 17 मामलों में आरोपियों को ‘गढ़े गए’ सबूत, ‘काल्पनिक’ गवाह और ‘फ़र्ज़ी मुक़दमे’ का हवाला देते हुए बरी कर दिया है. जजों ने जांच के दौरान दिल्ली पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं|
नई दिल्ली: दिल्ली की अदालतों ने साल 2020 के दंगों से जुड़े कम से कम 17 मामलों में आरोपियों को ‘गढ़े गए’ सबूत, ‘काल्पनिक’ गवाह और ‘फर्जी मुकदमे’ (थोपे गए मामलों) का हवाला देते हुए बरी कर दिया है. यह खुलासा अख़बार इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी पड़ताल में किया है|
अखबार ने बरी करने के 93 आदेशों की समीक्षा की, जिसमें एक साफ पैटर्न दिखा कि जजों ने बार-बार दिल्ली पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए. जिन 116 मामलों में अब तक फैसले आए हैं, उनमें से 97 मामलों में आरोपी बरी हो चुके हैं|
कम से कम 12 आदेशों में अदालतों ने पाया कि पुलिस ने ‘आर्टिफिशियल’ गवाह पेश किए या तो ‘गढ़े हुए’ सबूत रखे. दो मामलों में गवाहों ने अदालत को बताया कि पुलिस अधिकारियों ने उनसे बयान लिखवाया था.
पिछले महीने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश परवीन सिंह ने एक फैसले में पुलिस जांच पर नाराज़गी जताते हुए कहा था, ‘जांच अधिकारी द्वारा सबूतों के साथ बड़े स्तर पर मिलावट की गई है. ऐसे मामलों से लोगों का कानून और जांच प्रक्रिया पर से भरोसा उठ जाता है.’
ज्ञात हो कि साल 2020 में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध प्रदर्शनों के दौरान राजधानी दिल्ली में दंगे भड़क गए थे, जिसमें कम से कम 53 लोगों की मौत हो गई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे|
इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में कई ऐसे आदेश सामने आए जिनमें अदालत ने अभियोजन पक्ष का मामला पूरी तरह खारिज कर दिया. एक जज ने कहा कि ‘एक अहम गवाह का अस्तित्व ही संदेह के घेरे में है और यह नकारा नहीं जा सकता कि वह व्यक्ति काल्पनिक हो सकता है.’
दो समान मामलों में अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि पुलिस जानती थी कि उनका केस ‘गढ़ा हुआ’ है, क्योंकि उन्होंने टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (टीआईपी) कराना जरूरी नहीं समझा.
अदालतों की यह सख्त टिप्पणियां साफ़ तौर पर बताती हैं कि दिल्ली की सबसे भयावह सांप्रदायिक हिंसा की जांच में गंभीर खामियां रहीं हैं|
सौजन्य : द वायर
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