मणिपुर हिंसा स्वतःस्फूर्त नहीं, बल्कि सुनियोजित व जातीय रूप से लक्षित थी: पीयूसीएल रिपोर्ट
पीयूसीएल ने 20 अगस्त को मणिपुर में चल रहे जातीय संघर्ष पर स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण की रिपोर्ट जारी की. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस कुरियन जोसेफ की अध्यक्षता में लिखी गई 694 पृष्ठों की यह रिपोर्ट कहती है कि 3 मई, 2023 को भड़की हिंसा स्वतःस्फूर्त नहीं, बल्कि सुनियोजित, जातीय रूप से लक्षित थी|
नई दिल्ली: पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) ने 20 अगस्त को नई दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में मणिपुर में चल जारी जातीय संघर्ष पर स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण (पीआईबी) रिपोर्ट जारी किया|
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस कुरियन जोसेफ की अध्यक्षता में लिखी गई 694 पृष्ठों की यह रिपोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचती है: ‘3 मई, 2023 को भड़की हिंसा स्वतःस्फूर्त नहीं, बल्कि सुनियोजित, जातीय रूप से लक्षित और राज्य सरकार की विफलताओं के चलते हुई थी.’
व्यापक प्रतिनिधित्व
पीयूसीएल द्वारा 2024 में उक्त न्यायाधिकरण की स्थापना की गई थी, जिसमें निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए जानबूझकर मणिपुर के बाहर से चुने गए प्रतिष्ठित व्यक्तियों की जूरी शामिल थीं. जस्टिस कुरियन जोसेफ के साथ जूरी में जस्टिस के. कन्नन, जस्टिस अंजना प्रकाश, पूर्व नौकरशाह एमजी देवसहायम और स्वराज बीर सिंह, उमा चक्रवर्ती और वर्जिनियस खाखा जैसे शिक्षाविद, मंजुला प्रदीप और हेनरी टीफाग्ने जैसे मानवाधिकार कार्यकर्ता, पत्रकार-लेखक आकार पटेल शामिल थे.ट्रिब्यूनल के समक्ष 150 से ज़्यादा सर्वाइवर ने मौखिक गवाही दी, जबकि हज़ारों लोगों ने लिखित रूप में या समूह चर्चाओं के ज़रिए अपने अनुभव साझा किए. जूरी ने लिखा, ‘हमने जो आवाज़ें सुनीं, वे व्यवस्थागत दंडमुक्ति और निशाना बनाकर की गई क्रूरता की तस्वीर पेश करती हैं.’
रिपोर्ट दर्ज करती है कि 60,000 से ज़्यादा आंतरिक रूप से विस्थापित लोग ‘27 महीनों की हिंसा के बाद भी शिविरों में रह रहे हैं और उन्हें नहीं पता कि कब तक उन्हें इन्हीं शिविरों में रहना पड़ेगा.’
विभाजित रेखाएं और टकराव के बिंदु
रिपोर्ट में लंबे समय से चले आ रहे जातीय विभाजन, सामाजिक-राजनीतिक हाशिए पर धकेले जाने और भूमि विवादों को हिंसा की जड़ बताया गया है. रिपोर्ट बताती है, ‘सुनियोजित नफरती अभियानों और राजनीतिक बयानबाज़ी’ ने इसे और बढ़ा दिया, जिससे मेईतेई और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच अविश्वास और बढ़ गया.’
बताया गया है कि मणिपुर हाईकोर्ट का 27 मार्च, 2023 का वह आदेश, जिसमें मेईतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने की सिफ़ारिश की गई थी, हिंसा भड़कने का एक प्रमुख कारण था|
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस निर्देश ने आदिवासी समूहों – खासकर कुकी और नगा – में यह डर पैदा कर दिया कि उनकी संवैधानिक सुरक्षा छिन जाएगी. रिपोर्ट में कहा गया है, ‘इस फ़ैसले ने भावनाएं भड़काने का काम किया, जिससे 3 मई को राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, जो जल्द ही लक्षित हिंसा में बदल गए.’
रिपोर्ट ने दो प्रमुख धारणाओं को भी ध्वस्त कर दिया: कि कुकी म्यांमार से आए ‘अवैध प्रवासी’ हैं, और यह कि वे अफीम की खेती को बढ़ावा दे रहे हैं|
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘दोनों ही दावे अतिरंजित और राजनीतिक रूप से हथियारबंद पाए गए, जिससे समुदाय को बदनाम करने में मदद मिली.’
क्रूरता और मिलीभगत
पीड़ितों की गवाही ने रिपोर्ट की कुछ सबसे कड़वी जानकारियां दीं, ‘हमने बड़े पैमाने पर हत्याएं, अंग-भंग, महिलाओं के कपड़े उतारना और यौन हिंसा देखी.’ महिलाओं ने गवाही दी कि पुलिस अक्सर उनकी मदद करने में नाकाम रही और कुछ मामलों में, ‘उन्हें भीड़ के हवाले कर दिया.’
नफ़रत भरे प्रचार ने इसमें अहम भूमिका निभाई. रिपोर्ट में कहा गया है, ‘सोशल मीडिया भड़काऊ सामग्री से भर गया, जबकि पक्षपातपूर्ण प्रिंट मीडिया कवरेज ने विभाजन को और गहरा कर दिया.’
एक पीड़ित ने जूरी को बताया: ‘हमें पता था कि हिंसा होने वाली है, सरकार ने इसे रोकने के लिए कुछ नहीं किया.’
राहत उपायों के ठप होने से मुश्किलें और बढ़ गई. शिविरों में बुनियादी स्वच्छता, भोजन और चिकित्सा सुविधाओं का अभाव था. अस्पतालों पर हमले हुए, कर्मचारी भाग गए और मरीजों को सांप्रदायिक आधार पर इलाज से वंचित रखा गया|
रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘कोई संस्थागत हस्तक्षेप न होने के कारण गंभीर मानसिक स्वास्थ्य परिणाम– आघात, पीटीएसडी और अवसाद – हो सकते हैं.’
संवैधानिक तंत्र का पतन
कानून-व्यवस्था पर रिपोर्ट के निष्कर्ष मुख्य रूप से गंभीर हैं – ‘चुनिंदा ढंग से एफआईआर दर्ज की गईं, जांच में देरी हुई और सुरक्षा बलों पर सक्रिय मिलीभगत का आरोप लगाया गया.’ इसमें निष्पक्ष विशेष जांच दल बनाने में विफल रहने के लिए राज्य सरकार की आलोचना की गई|
यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप को भी अपर्याप्त बताया गया|
रिपोर्ट में कहा गया, ‘गीता मित्तल समिति और सीबीआई जांच का दायरा सीमित था, संसाधनों की कमी थी और उसके बाद कार्रवाई का अभाव था.’
ट्रिब्यूनल ने राज्य और केंद्र दोनों सरकारों पर ‘दंड से मुक्ति दिलाने और जातीय विभाजन को बढ़ाने’ का आरोप लगाया.’
न्याय और शांति के लिए सुझाव
रिपोर्ट में मणिपुर में जवाबदेही बहाल करने और विश्वास के पुनर्निर्माण के लिए एक व्यापक रोडमैप की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है. इसने न्याय तक समान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए पहाड़ी ज़िलों में उच्च न्यायालय की एक स्थायी पीठ की स्थापना और सुरक्षा बलों से जुड़े मामलों सहित हज़ारों लंबित मामलों की जांच के लिए एक स्वतंत्र विशेष जांच दल के गठन की मांग की|
इसने हिंसा को बढ़ावा देने वाले नफ़रत भरे भाषणों और दुष्प्रचार के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई का आग्रह किया, साथ ही मुआवज़ा, नुकसान की स्वीकृति और पीड़ितों के पुनर्वास के साथ एक पुनर्स्थापनात्मक न्याय ढांचे की भी वकालत की. गहरे जातीय विभाजन को कम करने के लिए मज़बूत राहत उपायों और निरंतर सामुदायिक संवाद को ज़रूरी बताया गया|
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘मणिपुर के लोग टुकड़ों-टुकड़ों में दिए जाने वाले उपायों से कहीं ज़्यादा के हक़दार हैं. बिना किसी व्यवस्थित प्रतिक्रिया के शांति वापस नहीं आ सकती.’
जस्टिस कुरियन जोसेफ ने द वायर से कहा, ‘यदि राज्य में लोकतंत्र और शांति वापस आनी है तो न्याय और जवाबदेही पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता.’
भविष्य के लिए एक चेतावनी
मणिपुर में हिंसा भड़के दो साल हो गए हैं, लेकिन रिपोर्ट के निष्कर्ष कहते हैं कि ‘हिंसा से बचे लोगों ने लगातार यह गवाही दी है कि ‘राज्य ने या तो हिंसा होने दी या फिर उसे सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया.’
रिपोर्ट एक सख्त चेतावनी के साथ समाप्त होती है: ‘यदि जवाबदेही तय नहीं की गई और दंड से मुक्ति को जारी रहने दिया गया, तो मणिपुर एक खतरनाक मिसाल बन सकता है; जातीय हिंसा में राज्य की मिलीभगत का उदाहरण.’
सौजन्य :द वायर
नोट: यह समाचार मूल रूप से प्रकाशित https://thewirehindi.com/309625/manipur-viole किया गयाहै और इसका उपयोग विशुद्ध रूप से गैर-लाभकारी/गैर-वाणिज्यिक उद्देश्यों, विशेष रूप से मानवाधिकारों के लिए किया जाता है|









