आदिवासी और वनवासी: जनजातीय क्षेत्र में आरएसएस के कामों का एक वृहद और सिलसिलेवार दस्तावेज़
पुस्तक समीक्षा: गहन शोध पर आधारित कमल नयन चौबे की ‘आदिवासी और वनवासी’ एक ऐसी पुस्तक है, जिससे आधुनिक भारत के इतिहास, राजनीति तथा भारतीय समाज के बदलते हुए स्वरूप को समझने में मदद मिलती है. इसके साथ ही हिंदुत्ववादी विचारधारा की संगठनात्मक विविधता और जनजातीय भारत के बीच की विसंगतियों का गहन अध्ययन भी इस किताब में मौजूद है|
कमल नयन चौबे की किताब ‘आदिवासी और वनवासी: ट्राइबल इंडिया एंड द पॉलिटिक्स ऑफ हिंदुत्व‘ जनजातीय क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा किए गए कार्यों का एक वृहद तथा सिलसिलेवार दस्तावेज़ है. साथ ही हिंदुत्ववादी विचारधारा की संगठनात्मक विविधता और जनजातीय भारत के बीच की विसंगतियों का गहन अध्ययन भी.
कमल नयन राजनीति शास्त्र पढ़ाते हैं और उन्हें 2024 में द प्रिंट’स लिस्ट ऑफ इंडिया के अगली पीढ़ी के महत्त्वपूर्ण बौद्धिकों में शामिल किया गया है. वह सीएसडीएस के जर्नल ‘प्रतिमान’ के संपादकीय प्रबंधन की भूमिका भी निभाते रहे हैं.
अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम जो कि अपने लोकप्रिय नाम वनवासी कल्याण आश्रम (वीकेए) से जाना जाता है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जनजातीय विंग है. देश के सबसे बड़े जनजातीय संगठन के रूप में इसका कार्य क्षेत्र देश का वह वृहत्तर जनजातीय भाग है, जिसमें केरल तथा उत्तर पूर्व भी शामिल हैं. 1970 के अंत तक वीकेए का कार्यक्षेत्र छत्तीसगढ़ के कुछ क्षेत्र (पहले मध्यप्रदेश का भाग), झारखंड (पहले बिहार) और उड़ीसा तक ही सीमित था, लेकिन धीरे-धीरे इसने भारत के विभिन्न भागों में अपने पैर जमा लिए.
अपनी स्थापना काल से ही वीकेए ने आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षण संस्थाओं और छात्रावास की स्थापना तथा धार्मिक कर्मकांड के आयोजन द्वारा हिंदुत्ववादी मूल्यों के प्रसार पर ध्यान केंद्रित किया. 1960 के मध्य से इसने लगातार जनजातियों के लिए चिकित्सीय सुविधा मुहैया कराने का भी अथक प्रयास किया. 1970 आते-आते इसने जनजातीय जीवन के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया. 1990 के शुरुआत में इसने औपचारिक रूप से वन-भूमि तथा प्राकृतिक संपदा पर जनजातीय लोगों के एकाधिकार को स्वर देना शुरू किया.
पुस्तक का पहला अध्याय ‘द युनिकनेस ऑफ द वनवासी कल्याण आश्रम’ संगठन की भूमिका पर आधारित है, तो वहीं सातवें और अंतिम अध्याय में लेखक इस निष्कर्ष पर एक प्रश्नवाचक चिह्न लगाते हैं कि क्या वनवासी कल्याण आश्रम हिंदुत्व की राजनीति का तगड़ा एंबेसडर हैं? तीसरा अध्याय महत्त्वपूर्ण है जहां वनवासी कल्याण आश्रम के कार्यों और संभावनाओं को लेकर विश्लेषण है|
इस अध्याय में वीकेए की तीन मूल नीतियों को लेकर चल रहे विमर्श के विश्लेषण का प्रयास है. पहला भाग श्रद्धा जागरण को समर्पित है- श्रद्धा जागरण हिंदू तीर्थ स्थलों की यात्रा एवं हिंदू तथा जनजातीय त्यौहार का आयोजन करता है. दूसरे भाग में वीकेए के उन अनोखे तरीकों का ज़िक्र है जिसके द्वारा नामचीन जनजातीय व्यक्तित्व का महिमा मंडन कर जनजातीय तथा ग़ैर जनजातीय लोगों में उनकी लोकप्रियता को वह स्थापित करता है और इस बहाने हिंदू मूल्य का विकास करना भी उसका एक लक्ष्य बन जाता है|
आगे चलकर इस वाद-विवाद कि जनजातीय लोगों को आदिवासी माना जाए या इस देश का स्थानीय मूलनिवासी, पर भी चर्चा की गई है. वीकेए वनवासी या ट्राइबल नामकरण पर विशेष बल देता है क्योंकि आदिवासी शब्द में जनजातीय तथा ग़ैर जनजातीय लोगों में किए जाने वाले भेद अंतर्निहित है. तीसरे भाग में धर्मांतरण विशेषकर जनजातीय समुदायों के ईसाई धर्म अपनाने की प्रक्रिया का आलोचनात्मक विवेचन हुआ है|
वनवासी कल्याण आश्रम की उत्पत्ति तथा ऐतिहासिक विकास, उसकी विचारधारा के स्वरूप तथा विभिन्न कार्यों को रेखांकित करते हुए कमल नयन चौबे ने इस संगठन के उन कार्यक्षेत्रों का परिचय कराया है जो अब तक हमारे लिए अनजान रहे हैं. गहन शोध पर आधारित आदिवासी और वनवासी एक ऐसी पुस्तक है जिससे आधुनिक भारत के इतिहास, राजनीति तथा भारतीय समाज के बदलते हुए स्वरूप को समझने में मदद मिलती है|(लेखक सीएसडीएस की शोधपरक पत्रिका ‘प्रतिमानः समय समाज संस्कृति’ के सहायक संपादक हैं.)
सौजन्य :द वायर
नोट: यह समाचार मूल रूप सेhttps://thewirehindi.com/306081/b प्रकाशित किया गयाहै और इसका उपयोग विशुद्ध रूप से गैर-लाभकारी/गैर-वाणिज्यिक उद्देश्यों, विशेष रूप से मानवाधिकारों के लिए किया जाता है।









