सामाजिक समरसता की मिसाल: गाजे-बाजे से लाए और बरसाए फूल, फिर सम्मानपूर्वक दलित समाज को कराया भोजन – EXAMPLE OF SOCIAL HARMONY
मकराना के लाडोली गांव में सामाजिक समरसता की मिसाल पेश करते हुए स्थानीय लोगों ने दलित समाज को अनूठे अंदाज में सम्मान दिया|
मकराना: मकराना पंचायत समिति के लाडोली गांव में सामाजिक समरसता की एक अनूठी परंपरा देखने को मिली. जहां जातिवाद और छुआछूत जैसी कुरीतियों से परे हटकर राजपूत समाज ने पूरे सम्मान और सत्कार के साथ वाल्मीकि समाज के लोगों को अपने घर बुलाया और भोजन कराया. इसके बाद फिर पूरे गांव ने अन्न ग्रहण किया. यह आयोजन दिवंगत भंवर सिंह राठौड़ की पुण्य स्मृति में किया गया था. भंवर सिंह के परिजनों ने बताया कि उन्होंने जीवन भर सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जागरूकता फैलाने का कार्य किया था|
वाल्मीकि समाज का भव्य स्वागत: स्वर्गीय भंवर सिंह के पुत्र दानवीर सिंह और पूरे राजपूत समाज ने यह आयोजन कर सामाजिक एकता की एक नई मिसाल पेश की. आयोजन के दौरान वाल्मीकि समाज के लोगों को पूरे मान-सम्मान के साथ उनके घर से गाजे-बाजे के साथ लाया गया. रास्ते में उनके स्वागत के लिए गलीचा बिछाया गया और पुष्प वर्षा की गई. उन्हें समाज के घरों में बुलाकर चरण धोकर सम्मानित किया गया और फिर अपने हाथों से भोजन कराया गया. इसके बाद पूरे गांव ने भोजन ग्रहण किया|
आभूषण और नकद राशि दे की विदाई: वाल्मीकि समाज के लोगों को न केवल भोजन कराया गया, बल्कि राजपूत समाज ने उन्हें सोने-चांदी के आभूषण और नकद राशि देकर ससम्मान विदाई भी दी. इस मौके पर दानवीर सिंह ने कहा कि उनके पिता भंवर सिंह राठौड़ हमेशा छुआछूत और जातिगत भेदभाव से दूर रहकर सामाजिक समरसता के लिए कार्य करते रहे थे. ऐसे में उनकी इसी सोच को आगे बढ़ाने के लिए इस परंपरा को फिर से शुरू किया गया है|
सामाजिक समरसता के लिए जातिवाद नुकसानदायक: पूर्व सरपंच रेवत सिंह राठौड़ और ग्रामीणों ने जातिवाद को समाज के लिए जहर बताते हुए कहा कि राजनीति में जातिवाद हावी होने से सामाजिक समरसता को नुकसान पहुंचा है. उन्होंने कहा कि सनातन धर्म की परंपराओं को बनाए रखना जरूरी है, ताकि समाज में एकता और भाईचारा बना रहे. स्वर्गीय भंवर सिंह राठौड़ का जन्म ठाकुर भवानी सिंह राठौड़ के परिवार में हुआ था. वे बचपन से ही सामाजिक कार्यों में रुचि रखते थे और जीवनभर सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जागरूकता फैलाने में लगे रहे. उनका वाल्मीकि समाज के लोगों से विशेष लगाव था और वे हमेशा उन्हें अपने पास बैठाकर बातचीत करते थे. उनके इसी संस्कार को आगे बढ़ाते हुए उनके परिवार ने इस परंपरा को फिर से जीवित किया, जो पिछले 35 वर्षों से जारी रहा|
सौजन्य: इटीवी भारत








