खाना छूने की कीमत जान से चुकानी पड़ी, कब टूटेंगी बुंदेलखंड की ये बेड़ियां?
बुंदेलखंड में छुआछूत और पिछड़ों पर अत्याचार के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं. यहां मंदिर में प्रसाद चढ़वाने पर पूरे परिवार का कर दिया गया बहिष्कार.
भोपाल (शैफाली पांडे): मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड में जहां छुआछूत की बेड़ियां टूटनी चाहिए थीं, वहीं ये घेरा क्यों और मजबूत होता जा रहा है? यहां से सुनाई देने वाली घटनाएं समानान्तर सिनेमा की किसी पटकथा जैसे सामने आ रही हैं. छतरपुर के एक गांव का वाकया ही ले लीजिए, यहां दलित युवक का केवल इसलिए सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया कि उसने मंदिर में प्रसाद चढ़ाया था.
इतना ही नहीं, दमोह में एक नौजवान पर कथित तौर पर कुंए से पानी लेने पर बैन लगा दिय गया क्योंकि वह एक दलित युवती के साथ रह रहा था. आखिर क्या वजह है कि रोजी के लिए पलायन झेलने वाले मध्य प्रदेश का ये इलाका रुढ़ी की बेड़ी तोड़ नहीं पा रहा है? दलितों पर अत्याचार के मामले में देश के टॉप थ्री राज्यों में मध्य प्रदेश बना हुआ है. प्रदेश के आंकड़ों में बुंदेलखंड की बड़ी भागीदारी क्यों है?
आज भी कई इलाकों में दलितों को नहीं छूने देते कुएं की बाल्टी (ETV Bharat)
जिसने प्रसाद खाया उसका भी हुक्का पानी बंद
किसी नौजवान का मंदिर में प्रसाद चढ़वाना क्या उसके सामाजिक बहिष्कार की वजह होनी चाहिए? दरअसल, सटई थाने के अतरार गांव में एक दलित ने हनुमान मंदिर में पुजारी के माध्यम से प्रसाद चढ़वाया था. इसके बाद प्रसाद गांव के कुछ लोगों को बांट दिया. खबर गांव के सरपंच संतोष तिवारी को लगी, तो उन्होंने दलित से प्रसाद खाने पर 5 लोगों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया.
सामाजिक कार्यक्रमों में जाने पर बैन
गांव वालों का आरोप है कि अब गांव में सरपंच के आदेश पर उन्हें किसी भी शादी समारोह, तेरहवीं, चौक जैसे कार्यक्रमों में नहीं बुलाया जाता, जिससे उन्हें मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है. बाद में ये पूरा मामला कलेक्टर के सामने पहुंचा. पीड़ित जगत अहिरवार ने कहा, ” मंदिर में पुजारी से प्रसाद चढ़वाया था, उसके बाद मेरा बहिष्कार किया गया. जिस-जिस ने प्रसाद खाया उनका भी सरपंच संतोष तिवारी ने सामाजिक बहिष्कार कर दिया.” हांलाकि, सरपंच ने इसे सियासी मामला बताते हुए कहा कि फरियादी जगत अहिरवार चुनाव में हार गया तो इस तरह की फर्जी शिकायतें कर रहा है. मामला पुलिस के पास पहुंचा और जांच के बाद दोनो पक्षों को समझाइश दे दी गई|
साहब को गुटका उधार नहीं दिया तो पीट डाला
छतरपुर में अत्याचार के एक दूसरे मामले में एक महिला को केवल इसलिए पीटा गया कि उसने गांव के उच्च जाति के एक व्यक्ति को पान मसाला देने से इनकार कर दिया. इस महिला के परिवार तक बात गई, तो तीन भाईयों को भी बुरी तरह पीटा गया. पीड़ित पूजा ने कहा, ” गांव के दबंगों ने जाति सूचक गालियां देते हुए जान से मारने की धमकी दी और कहा है कि गांव छोड़कर भाग जाओ, वरना सभी को जान से मार देंगे.” बम्होरी थाना क्षेत्र के इस मामले में पुलिस ने दोनों पक्षों के खिलाफ मामला दर्ज किया है.
भोजन को हाथ लगाने की भी सजा
छतरपुर के गौरीहार थाना इलाके में भोजन छू लेने पर एक युवक की पिटाई की गई. पीड़ित राजेंद्र अनुरागी का अपराध ये था कि वो मित्रों के कहने पर पार्टी में चला गया. वहां उसने गलती ये कि जब भोजन बनकर तैयार हो गया, तो उसने अपने हाथ से खाना ले लिया. इसी से नाराज होकर आरोपी भूरा और संतोष ने लाठियों से उसकी पिटाई कर दी और गंभीर रूप से घायल हुए पीड़ित की मौत हो गई.
दलितों समाज के लोगों ने प्रशासन से लगाई गुहार (ETV Bharat)
दलितों पर अत्याचार से जुड़े मामलों पर काम कर रहे अंकित पचौरी कहते हैं, ” असल में कानून के बूते ये समस्या हल नहीं होगी. इसके लिए जरूरी है नैतिक शिक्षा का पाठ और जो बच्चों को ये सिखाएं कि सब बराबर हैं, कोई ऊंचा और नीचा नहीं. ये लकीर ही गहरी होती जा रही है.
कुरीतियों को परंपरा ना समझा जाए
वरिष्ठ समाज शास्त्री और पूर्व कुलगुरु आशा शुक्ला ने कहा,” मेरी सोच है कि बायोलॉजिकल हो या प्रकृति प्रदत्त. हम सब स्त्री-पुरुष होने से पहले मनुष्य हैं. और पहली शर्त ये है कि हमारा कार्य मानवता पूर्ण होना चाहिए. कोई किसी को श्रेष्ठ न माने, कोई किसी को नेष्ठ ना माने. संविधान भी हमें इसकी इजाजत नहीं देता और मानवीय मूल्यों में भी ये गलत है कि हम जाति धर्म या लिंग भेद के आधार पर किसी को बांटे, लेकिन दलितों पर अत्याचार के जिस तरह के मामले आते हैं. इस पर उन्होंने कहा कि परिवार के जो बुजुर्ग हैं वो बदलाव ला सकते हैं. समाज के जो वरिष्ठ हैं, वो कुरीतियों को खत्म करें.
मध्य प्रदेश में दलित अत्याचार के बढ़ते मामले
सरकारी आंकड़ो के मुताबिक अनुसूचित जातियों के लिए कानून के दायरे में जो मामले दर्ज किए गए उनका आंकड़ा 51 हजार 656 के करीब है. उत्तर प्रदेश में दर्ज मामलों की संख्या 12 हजार के आसपास है. राजस्थान में ये मामले 8500 के लगभग हैं, लेकिन मध्यप्रदेश में इनकी तादात 7500 से ज्यादा है|
सौजन्य: इटीवी भारत








