बाबू जगजीवन राम : गरीबों के मसीहा, जिन्हें देश कर रहा है याद
भारतीय राजनीति के इतिहास में दलित राजनीति का जिक्र जब कभी होता है तो उनका नाम जुबां पर सबसे पहले आता है। हमारे देश में ऐसे सैकड़ों क्रांतिकारी हुए हैं जिन्होंने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और राजनीतिक कौशल के दम पर देश की राजनीति में गहरी छाप छोड़ी है उन्हीं महान विभूतियों में से एक रहे हैं ‘बाबू जगजीवन राम’। इन्होंने अपनी कड़ी मेहनत और तपस्या के दम पर लाखों लोगों की जिंदगियां बदली, समाज के हर तबके के लोग को साथ लेकर चलने के लिए जीवन प्रयत्न काम किए। बाबू जगजीवन राम को सामाजिक न्याय और समाज में हाशिए पर पड़े लोगों के सबसे बड़े मसीहा के रूप में जाना जाता है उन्होंने दलित वंचित और शोषितों के लिए राजनीतिक गलियारों में आवाज उठाई उन्हें हक और न्याय दिलाने के लिए झंडे बुलंद किए। आज उन्हीं की पुण्यतिथि है जिस पर पूरा देश उन्हें याद कर रहा है।
बाबू जगजीवन ने समझाए थे लोकतंत्र के मायने
प्रसार भारती आर्काइव पर स्वतंत्रता सेनानी और राजनीतिज्ञ बाबू जगजीवन राम के कार्यों पर आधारित एक रेडियो कार्यक्रम की रिकॉर्डेड क्लिप है जिसमें बाबू जगजीवन राम ने कहा था कि ”कोई भी सरकार यहां आवे। चाहे सोशलिस्ट हो या कम्युनिस्ट हो कैपिटल लिस्ट हो अथॉरिटेरियन हो। एक काम कर दे सबसे पहले कि भारत में एक भी व्यक्ति ऐसा ना बचे जिसको दोनों शाम भर पेट खाने को न मिले। पहला काम ये होना चाहिए। और कोई भी व्यक्ति ऐसा न रहे जिसको एक कमीज न हो। और कोई भी व्यक्ति ऐसा न हो जिसको एक जोड़ी जूते न हो। इसके बाद और काम कीजिए। भरपेट हर व्यक्ति को खाना मिल जाए ये तो पहला लक्ष्य होना चाहिए जब कोई भी सरकार आवे तो। विवेकानंद का एक शब्द याद पड़ता है। भूखे का भगवान रोटी का रूप धारण करके आता है और पेट नहीं भरे तो स्वतंत्रता के कोई मायने नहीं होते हैं। पेट भरने के बाद ही स्वतंत्रता आप जाके किसान से पूछिए कि स्वतंत्रता क्या है वो तो कहेगा कि पहले भरपेट खाने को मिले। हां खाना मिलने के बाद क्या होना चाहिए। ये आप पूछिए तो उसके बाद स्वतंत्रता के लिए लड़ेगा, खाली पेट नहीं।”
इन बातों से आप समझ सकते हैं कि बाबू जगजीवन राम के दिल में गरीब वंचित दलित और पिछड़े लोगों के लिए किस तरह का भाव था। नीचे दिए इस लिंक पर क्लिक कर आप उनके इन बातों को सुन सकते हैं।
करीब 50 साल लंबा रहा राजनीतिक जीवन
करीब 50 साल लंबा उनका राजनीतिक जीवन देश को बहुत कुछ देकर गया और बदले में देश ने जो उन्हें दिया वो भी अनोखा है और वो है उन्हें प्यार से ”बाबू जी” कहकर पुकारा जाना। जी हां, जगजीवन राम को बाबू जी के तौर पर जाना जाता है। वे देश के पहले दलित उप-प्रधानमंत्री बने थे। बाबू जगजीवन राम संविधान सभा के सदस्य भी रहे। उन्होंने भारत सरकार में कृषि मंत्रालय, रेल मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय एवं संचार मंत्रालय का दायित्व संभाला। अपने राजनीतिक जीवन में वे उप प्रधानमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद तक पहुंचे। जीवन में विभिन्न भेदभाव को झेलते हुए भी उन्होंने अपने धर्म अपने राष्ट्र से कोई असहमति नहीं जताई और वह आजीवन हिंदुत्व एवं राष्ट्र की बात करते रहे।
कांग्रेस में रहकर भी आपातकाल को ठहराया गलत
बाबू जगजीवन राम लंबे समय तक कांग्रेस से जुड़े रहे। वे एक अच्छे प्रशासक थे। केंद्र सरकार में उन्होंने बड़ी जिम्मेदारियां संभाली। उनके रक्षा मंत्री रहते ही भारत ने 1971 का युद्ध जीता था। केवल इतना ही नहीं देश के कृषि मंत्री रहते हुए उन्होंने हरित क्रांति लाने का मार्ग प्रशस्त किया। लेकिन इंदिरा गांधी की सरकार ने जब आपातकाल का एलान किया तो वे कांग्रेस से अलग हो गए। उसके बाद जनता पार्टी ने मोरारजी देसाई के नेतृत्व में सरकार बनाई तो जगजीवन राम को उप प्रधानमंत्री बनाया गया।
हिंदू धर्म से गहराई तक जुड़ा था इनका परिवार
जगजीवन राम को पूरे जीवन अछूत बताकर कई जगह अपमानित किया गया। स्कूल से शुरू हुआ यह सिलसिला राजनेता बनने तक जारी रहा, लेकिन इससे उनके मन में अपने पंथ के प्रति कभी प्रतिक्रियावादी भाव पैदा नहीं हुआ। दरअसल, उनका पूरा परिवार ही उस सुधार के लिए संकल्पित रहा। जगजीवन राम की संस्कृत पर खूब पकड़ थी।
बहुत लंबा रहा राजनीतिक सफर
एक सामान्य परिवार में जन्में बाबू जगजीवन राम ने राजनीतिक बारीकियों को बेहद कम उम्र से ही परखना शुरू कर दिया था। उन्होंने संघर्ष के रास्ते कैसे शीर्ष पायदान पर पहुंचा जा सकता है यह अपने राजनीतिक सफर में करके दिखाया है। 1930 के दशक में वो सामाजिक कार्यों से बखूबी जुड़े हुए थे उन्होंने 1934 में बिहार में आए भूकंप की वजह से हुई भारी तबाही के बाद लोगों को राहत पहुंचाने के लिए शिद्दत से काम किया। लोगों से गहरा लगाव होने की वजह से ही वह पहली बार 1936 में बिहार विधान परिषद के रूप में चुने गए और यहीं से उनका राजनीतिक सफर शुरू हुआ।
कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा
बाबू जगजीवन राम ने 1936 में अपनी राजनीतिक सफर की शुरुआत के बाद जीवन में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। लोगों में अपार लोकप्रियता होने की वजह से और लगातार चुनावी मैदान में विपक्षियों को मात देते गए। उन्होंने 1946 से 1952 तक श्रम, 1952-56 तक कम्युनिकेशन बाद में रेलवे, कृषि, सिंचाई, रक्षा जैसे कई मंत्रालयों का पदभार संभाला। भले ही 4 दशक के राजनीतिक करियर में उन्होंने कई मुकाम हासिल किए लेकिन उनका ध्यान हमेशा समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति पर रहता था और शायद इसी वजह से अपने कालखंड में हो दबे कुचले और शोषित लोगों के लिए कई महत्वपूर्ण काम कर पाए।
सौजन्य : Newsonair
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