पिछड़ी जाति जनगणना के आंकड़ों को सार्वजनिक करने की महाराष्ट्र की अपील SC ने ठुकराई!
सुप्रीम कोर्ट ने 2011 जनगणना में सामने आए सामाजिक आर्थिक पिछड़ेपन के आंकड़े सार्वजनिक करने का आदेश देने से इनकार कर दिया है, इस तरह महाराष्ट्र सरकार की मांग सुप्रीम कोर्ट ने ठुकरा दी है.
महाराष्ट्र सरकार ने 2011 की जनगणना के आधार पर पिछड़ी जातियों के आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग रखी थी. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की दलील स्वीकार की कि 2011 में OBC की संख्या जानने को जातिगत जनगणना नहीं हुई थी.
हालांकि, परिवारों का पिछड़ापन जानने का सर्वे तो हुआ था. लेकिन वह आंकड़ा त्रुटिपूर्ण है, जो इस्तेमाल करने लायक नहीं है. OBC पर केंद्र से 2011 की जनगणना के आंकड़े मांगने की महाराष्ट्र की याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘ जब केंद्र सरकार ने कहा है कि ये डाटा अनुपयोगी है, गलतियों से भरा है तो राज्य सरकार की इस याचिका पर विचार नहीं किया जा सकता है.’
चूंकि, OBC के आंकड़े एकत्र करने की कवायद थकाऊ है, इसलिए महाराष्ट्र शासन ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाकर महाराष्ट्र में OBC के बारे में जानकारी मांगी थी. सरकार की दलील थी कि 2011 की जनगणना के दौरान केंद्र के पास ये आंकड़े उपलब्ध थे.
दरअसल इस याचिका के जवाब में केंद्र के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने हलफनामा दाखिल कर सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि राज्य की इस याचिका पर विचार ही नहीं किया जाना चाहिए. क्योंकि, पिछड़े वर्गों की जनगणना “प्रशासनिक रूप से कठिन” है और “पूर्णता और सटीकता ” दोनों के कारण खामियाजा भुगतना पड़ सकता है.
केंद्र सरकार ने अपना हलफनामा दायर कर कहा कि उसने 7 जनवरी, 2020 को एक अधिसूचना जारी कर आगामी 2021 की जनगणना में जानकारी एकत्र करने का प्रावधान किया है. इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबंधित जानकारी शामिल हैं, लेकिन जाति की किसी अन्य श्रेणी का उल्लेख नहीं है.
सौजन्य : Aajtak
नोट : यह समाचार मूलरूप से aajtak.in में प्रकाशित हुआ है. मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशीलता व जागरूकता के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है|









