क्या शिमला का नाम बदलने से बचेगी हिमाचल की संस्कृति?
शिमला का नाम श्यामला होना चाहिए या नहीं ? इन दिनों ये सवाल सभी लागों के जहन में है और अब इस पर बहस छिड़ चुकी है. दरअसल, इन दिनों बड़े शहरों के नाम बदलने का दौर देश में चल रहा है.
कहा जा रहा है कि गुलामी से जुड़े तमाम नामों को बदल कर हिन्दू संस्कृति को बचाना है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या नाम बदलने से संस्कृति बच पाएगी? विश्व हिन्दू परिषद (वीएचपी) राजधानी का नाम बदल कर ‘श्यामला’ करने की बात कर रहा है. बीती कांग्रेस सरकार के दौरान भी वीएचपी ने ये मुद्दा उठाया था, लेकिन बात नहीं बन पाई थी. अब यह मुद्दा फिर चर्चा में है.
गुरुवार को शिमला में आरएसएस के एक कार्यक्रम में हिमाचल की भाजपा सरकार में स्वास्थ्य मंत्री ने इस मुद्दे को फिर हवा दे दी.
क्या शिमला का नाम बदलकर श्यामला कर देना चाहिए? इस सवाल पर हिमाचल प्रदेश सरकार के स्वास्थ्य मंत्री विपिन सिंह परमार ने अहम बयान दिया है. स्वास्थ्य मंत्री ने मीडिया के सवाल पर कहा कि यह चर्चा का विषय है, लेकिन अगर श्यामला से शहर का नाम शिमला हो सकता है तो फिर शिमला से श्यामला क्यों नहीं हो सकता?
हालांकि, यह चर्चा का विषय है. इसके लिए कोई हार्ड एंड फास्ट रूल नहीं है. दरअसल, यूपी की योगी सरकार ने हाल ही में इलाहाबाद का नाम प्रयागराज कर दिया है. इसके बाद शहर का नाम बदलने को लेकर सियासत हो रही है. हिमाचल की भाजपा सरकार में स्वास्थ्य मंत्री विपिन परमार ने कहा कि देश में लोग ऐसे मुद्दों को लेकर आगे आ रहे हैं.
विश्व हिन्दू परिषद के प्रांत अध्यक्ष अमन पूरी का कहना है कि जब श्यामला को शिमला किया गया, क्योंकि अंग्रेज श्यामला नहीं बोल पाते थे, इसलिए शिमला नाम पड़ा. शिमला नाम एक गुलामी की पहचान है, जिसे अगर बदल दिया जाएगा, तो इससे संस्कृति तो बचेगी, साथ ही श्यामला मां को पूरी दुनिया में जाना जाएगा. वहीं, विपक्ष इस बात को लेकर केवल मुद्दा बना रहा है. क्योंकि उनके पास बोलने के लिए कुछ नहीं बच गया है. क्योंकि शिमला ही नहीं, शिमला के अलावा भी उस हर चीज का नाम बदलने की जरूरत है, जो गुलामी से जुड़ी हुई है. हमारे बहुत से नेशनल हीरो बहुत हैं और जिनके नाम पर भी जगहों के नाम रखे जा सकते हैं.
सीपीआईएम नाम बदलने के विरोध में
सीपीआईएम के प्रदेश सचिव डॉ. ओमकार शाद विश्व हिन्दू परिषद की नाम बदलने की बात का बिल्कुल भी समर्थन नहीं करते हैं. क्योंकि शिमला का नाम इतिहास से तो जुड़ा ही है, साथ ही शिमला अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जाना जाता है. शिमला नाम कोई गुलामी का प्रतीक नहीं है, इसका अपना एतिहासिक महत्व है. अगर शिमला का नाम बदला जाता है तो पहले से ही कर्जे में डूबे हिमाचल पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा.
युवा ने भी जताया विरोध
शिमला के रहने वाले संजय शर्मा नाम बदलने के बिल्कुल भी पक्ष में नहीं हैं. संजय का कहना है कि शिमला नाम का अपना महत्व है. नाम बदनले से वह खत्म हो जाएगा. रघुवीर और सोहम कहना है कि अगर श्यामला माता के नाम से शिमला का नाम पड़ा है तो श्यामला मां को प्रोमोट करो, ना की शिमला का नाम बदलने की जरूरत है. अगर अब शिमला का नाम बदल दिया जाएगा तो उसे शिमला के स्तर पर पहुंचने में बहुत समय लग जाएगा.
वरिष्ठ नागरिकों की प्रतिक्रिया
शिमला के वरिष्ठ नागरिकों की प्रतिक्रिया इस मामले में मिली जुली रही. हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त चौधरी वरयाम सिंह बैंस नाम बदलने के बिल्कुल भी पक्षे में नहीं हैं. इनका कहना है कि श्यामला एक गांव का नाम था और शिमला बनने तक यहां की काफी तरक्की हो चुकी थी. अगर शिमला के नाम को फिर से बदल लिया जाएगा तो शिमला ब्रैंड को काफी नुकसान होगा. नाम बदलने के बाद फिर नए नाम को उस स्तर तक पहुंचाना मुश्किल होगा. शिमला में पिछले चार दशकों से रह रहे कपिल महाश्य शिमला का नाम ‘श्यामला’ रखने के पक्ष में दिखे. कपिल का कहना है कि वो चाहते हैं कि प्रदेश सरकार शिमला का नाम जल्द ‘श्यामला’ करे, ताकि आने वाली पीढ़ी शिमला की संस्कति के बारे में जान सके.
शिमला का पुराना नाम ‘श्यामला’
बता दें कि शिमला का पुराना नाम श्यामला था. शिमला के कालीबाड़ी मंदिर को पहले श्यामला माता के नाम से जाना जाता था. इसी पर इस शहर का नाम श्यामला हुआ करता था. बाद में मंदिर का नाम कालीबाड़ी और शहर का नाम शिमला कर दिया गया. दरअसल,जब अंग्रेज पहाड़ों की रानी शिमला आए तो उन्होंने इसका नाम ‘सिमला’ कर दिया. जो बाद में शिमला हो गया. अंग्रेजों ने साल 1864 में इस शहर को बसाया था. इसे लेकर कांग्रेस कार्यकाल में विहिप ने सरकार को शिमला का नाम बदलने को लेकर एक मेमोरेंडम भी सौंपा था.
साभार : न्यूज़ 18









