सोहराबुद्दीन मामला: ‘फ़र्ज़ी’ एनकाउंटर केस में बरी 22 पुलिसकर्मियों से सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब
सोहराबुद्दीन ‘फ़र्ज़ी’ एनकाउंटर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बरी किए गए सभी 22 लोगों को नोटिस जारी किया जाना चाहिए. पीठ ने यह भी कहा कि मामले ने उसका ध्यान इसलिए खींचा क्योंकि मुक़दमे के दौरान अभियोजन पक्ष के 92 गवाह अपने बयानों से मुकर गए थे|
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (28 सितंबर) को सोहराबुद्दीन शेख-कौसर बी ‘फर्जी’ एनकाउंटर मामले में 22 लोगों को बरी करने वाले हाईकोर्ट के फैसले के कुछ पहलुओं की जांच करने पर सहमति जताई है. बरी किए गए 22 लोगों में गुजरात और राजस्थान पुलिस के 21 पुलिसकर्मी शामिल हैं. इन सभी को पहले 21 दिसंबर 2018 को ट्रायल कोर्ट ने बरी किया था. हाईकोर्ट ने 7 मई 2026 को इस फैसले को बरकरार रखा था.
सोमवार को मामले की सुनवाई करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने कहा, ‘हम कुछ गवाहों के बयानों को देखना चाहते हैं. हम रिकॉर्ड नहीं मंगा रहे हैं… आप हमें वे 3-4 बयान दे दीजिए, जो आपको महत्वपूर्ण लगते हैं. हम बरी किए जाने के फैसले की जांच करेंगे.’
कारोबारी सोहराबुद्दीन शेख और उनकी पत्नी कौसर बी के कथित अपहरण और हत्या के मामले में तुलसीराम प्रजापति एकमात्र जीवित गवाह थे. प्रजापति, शेख के सहयोगी थे. पुलिस हिरासत में रहने के दौरान एक अन्य ‘एनकाउंटर’ में उनकी भी हत्या कर दी गई थी. तीनों मामलों की सुनवाई एक साथ हो रही है.
सीजेआई सूर्यकांत के साथ जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि बरी किए गए सभी 22 लोगों को नोटिस जारी किया जाना चाहिए. पीठ ने यह भी कहा कि मामले ने उसका ध्यान इसलिए खींचा क्योंकि मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष के 92 गवाह अपने बयानों से मुकर गए थे.
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा, ‘92 गवाहों का अपने बयानों से मुकर जाना गंभीर चिंता का विषय है. हालांकि यह निचली अदालत और हाईकोर्ट, दोनों द्वारा एक जैसे निष्कर्ष निकालने का मामला है, लेकिन क्या मुकदमा निष्पक्ष और न्यायपूर्ण तरीके से चला था, इस पर विचार किया जाना चाहिए.’ लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सीजेआई सूर्यकांत भी इससे सहमत थे.
गवाहों के मुकरने का मतलब है कि उन्होंने अदालत में उन तथ्यों का समर्थन नहीं किया, जो उनके बयानों में दर्ज थीं. ट्रायल के दौरान ही गवाहों के मुकरने का सिलसिला शुरू हो गया था और मामलों के कमजोर पड़ने की यह एक प्रमुख वजह थी. आपराधिक मामलों में अभियोजन पक्ष की पैरवी राज्य की ओर से की जाती है.
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सोमवार को सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, ‘पैरा 43, हम इसकी जांच नहीं करेंगे. हम इस तरह की …. की अनुमति नहीं देंगे.’
हाईकोर्ट के फैसले का पैरा 43 केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से संबंधित है. तीनों हत्याओं के समय शाह गुजरात के गृह मंत्री थे. हाईकोर्ट के फैसले में कहा गया है कि 2014 में शाह को मामले से डिस्चार्ज किए जाने के फैसले को पलटने की मांग करते हुए दिसंबर 2026 में एक आवेदन दायर किया गया था.
हाईकोर्ट ने इस आवेदन को ‘छिपे हुए उद्देश्य से प्रेरित’ और ‘शाह के किसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के कहने पर दायर’ किया गया बताया था. सीबीआई ने भी इस आवेदन का विरोध किया था.
इस वर्ष मई में फैसला सुनाते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था, ‘ट्रायल कोर्ट ने कानून में स्थापित और सही कानूनी सिद्धांतों का पालन किया था. उसके निष्कर्ष रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों और दस्तावेजों के विपरीत नहीं हैं.’
हाईकोर्ट ने कहा था, ‘कुल 92 गवाह अपने बयानों से मुकर गए और उन्होंने सोहराबुद्दीन शेख, उनकी पत्नी कौसर बी और तुलसीराम प्रजापति की फर्जी एनकाउंटर में हत्या की अभियोजन पक्ष की कहानी का समर्थन नहीं किया. अभियोजन पक्ष का आरोप था कि पुलिस अधिकारियों, राजनेताओं आदि के बीच आपराधिक साजिश के तहत ये हत्याएं की गईं थी.’
सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में 26 नवंबर 2005 को गुजरात पुलिस की आतंकवाद विरोधी शाखा के एक कांस्टेबल द्वारा मामला दर्ज किए जाने के बाद से कई उतार-चढ़ाव आए हैं. 2006 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मामले की जांच राज्य की क्राइम इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (सीआईडी) को सौंप दी गई थी.
साल 2010 में सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन की अपील पर सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सीबीआई को मामले की आगे की जांच करने का निर्देश दिया गया. 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले को महाराष्ट्र की एक विशेष अदालत में ट्रांसफर कर दिया.
2013 से तीनों हत्याओं से जुड़े मामलों की सुनवाई एक साथ हो रही है.
मामले की सुनवाई बार-बार ट्रांसफर किए जाने, गवाहों के अपने बयानों से मुकरने और पुलिस-राजनीति के गठजोड़ के कारण एनकाउंटर में हत्याएं किए जाने के आरोपों की वजह से इन मामलों ने देशभर का ध्यान खींचा.
सीबीआई के जांच में शामिल होने के बाद इस मामले में 38 लोगों को आरोपी बनाया गया था. इनमें वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, राजस्थान के पूर्व गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया और उस समय गुजरात के गृह मंत्री रहे अमित शाह भी शामिल थे.
द वायर ने पहले रिपोर्ट किया था कि सीबीआई की चार्जशीट में शाह पर एक आपराधिक वसूली गिरोह चलाने का आरोप लगाया गया था, जिसके लिए सोहराबुद्दीन राजस्थान में काम करते थे. सीबीआई द्वारा पेश किए गए कॉल डेटा रिकॉर्ड के मुताबिक, शाह ने प्रजापति के एनकाउंटर के समय आसपास डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल डी.जी. वंजारा और अधिकारी दिनेश एम.एन. समेत आरोपी पुलिस अधिकारियों को कई फोन कॉल किए थे. मामले में जब भी कोई घटनाक्रम सामने आता था, इन कॉल्स की संख्या बढ़ जाती थी.
ट्रायल जज ने कहा था कि इस बात का ‘रत्ती भर भी सबूत’ नहीं है कि किसी राजनेता की साजिश में कोई भूमिका थी या कोई ऐसा राजनीतिक-पुलिस गठजोड़ था, जिसके कारण इन तीनों का फर्जी एनकाउंटर किया गया.
सीबीआई ने भी 2018 में मामले की सुनवाई करने वाली विशेष अदालत के फैसले के खिलाफ अपील नहीं करने का फैसला किया था|
अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह यह देखेगा कि ट्रायल निष्पक्ष और न्यायपूर्ण तरीके से चला था या नहीं. अदालत यह भी विस्तार से देखना चाहती है कि गवाहों ने किस तरह गवाही दी और 92 गवाह अपने बयानों से कैसे मुकर गए|
सौजन्य :जस्टिस न्यूज़
माध्यम :समाचार पत्र









