“अगर जज के साथ ही हो अन्याय, तो वह कहां जाए?”: मुजफ्फरनगर में एडीजे रवि कुमार दिवाकर की तीखी टिप्पणी, न्याय व्यवस्था पर खड़े किए बड़े सवाल
10 साल पुराने मामले में आरोपी को बरी करते हुए 35 पेज के आदेश में उठाया प्रशासनिक नियंत्रण का मुद्दा; बोले- कोई भी लोक सेवक राजाओं की तरह नहीं कर सकता आचरण मुजफ्फरनगर -जनपद की न्यायपालिका में इन दिनों फैसलों और टिप्पणियों को लेकर एक बारफिर जबरदस्त चर्चा छिड़ गई है।
अपर जिला एवं सत्र न्यायालय संख्या-3/फास्ट ट्रैक को के पीठासीन अधिकारी जज रवि कुमार दिवाकर ने एनडीपीएस (NDPS) एक्ट के 10 साल पुराने एक मामले में फैसला सुनाते हुए न्याय व्यवस्था और प्रशासनिक नियंत्रण पर बड़े सवालखड़े किए हैं। साक्ष्य और गवाहों के अभाव में आरोपी अशोक भारत को दोषमुक्त करार देते हुए जज ने अपने 35 पेज के विस्तृत आदेश में लिखा कि एक न्यायाधीश का काम न्याय करना होता है, लेकिन यदि उसी के साथ अन्याय हो तो वह न्याय की गुहार लगाने कहां जाए?
क्या जिला जज के आदेश मानने के लिए बाध्य है मातहत कोर्ट?
फैसले के दौरान जज रवि कुमार दिवाकर ने यह गंभीर सवाल भी उठाया कि क्या जिला जज के प्रशासनिक नियंत्रण में काम कर रहा कोई न्यायाधीश उनके ऐसे आदेशों को मानने के लिए पूरी तरह बाध्य है, जो विधि के विपरीत (कानून के खिलाफ) हों?
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में टिप्पणी की कि भारत में कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर.नहीं है और देश सविधान तथा विधि के शासन से चलेगा ,किसी लोकसेवक के मनमाने व्यवहार या राजाओ की तरह आचरण से नहीं |हर लोकसेवक को अपने प्रशासनिक आदेश का क़ानूनी कारण बताना ही होगा |
97 पत्रावलियो के रिकॉल पर उठाया सवाल
अपने चर्चित फैसले में जज ने अपनी अदालत से 97 मुकदमो की पत्रावलियो को वापस लेकर दूसरी अदालतों में ट्रांसफर करने के तत्कालीन जिला जज के फैसले पर गहरी नाराजगी जताई |उन्होंने कहा कि तत्कालीन जनपथ नयायाधीश ने अपने रिटायरमेंट से ठीक 13 दिन पहले ,यानि 18 अगस्त को एक ही तरह के नौ आदेश पारित कर इन मामलों को अपनी अदालत में रिकॉल कर लिया था |
जद ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 409 का हवाला देते हुए बताया कि हालांकि सेशन जज के पास मामले वापस मांगने का प्रशासनिक अधिकार होता है,लेकिन इसकी धारा 409(2) के तहत यदि किसी मुकदमे का ट्रायल (गवाही या जिरह) शुरू हो चुका है और मामला ‘पार्ट हर्ड’ (Part-heard) की श्रेणी में है, तो बिना किसी असाधारण विधिक कारण के उसे बीच में वापस नहीं लिया जा सकता। इन
आदेशों में केवल ‘रिकॉल’ शब्द का इस्तेमाल किया गया और कोई ठोस कारण नहीं बताया गया, जिसे विधिवत ‘स्पीकिंग ऑर्डर’ नहीं कहा जा सकता।
‘तारीख पर तारीख’ और 10 साल की लंबी कानूनी लड़ाई का दर्द
एनडीपीएस एक्ट के इस मामले में मुजफ्फरनगर के पटेल नगर निवासी अशोक भारती को 21 अक्टूबर 2015 को भरतिया कॉलोनी के पास से 150 ग्राम चरस के साथ गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने 2016 में चार्जशीट दाखिल की, लेकिन लंबी सुनवाई के दौरान कोर्ट में आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत और गवाह पेश नहीं किए जा सके।
इस दौरान फैसला सुनाते हुए जज ने बॉलीवुड फिल्म ‘दामिनी’ के मशहूर डायलॉग ‘तारीख पर तारीख’ का जिक्र करते हुए व्यवस्था की सुस्ती पर कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि किसी बेकसूर व्यक्ति को अपनी बेगुनाही साबित करने और न्याय पाने में 10 साल का लंबा समय लग गया। लंबे समय तक कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटना अपने आप में एक बड़ी सजा की तरह है, जिससे निर्दोष व्यक्ति को भारी मानसिक आघात पहुंचता है।
सौजन्य :जस्टिस न्यूज़
माध्यम :समाचार पत्र









